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Tuesday 15 June 2010

खुलासा - चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु


खुलासा
चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु


इस पुस्तक के प्राक्कथन में गांधी आम्बेडकर विवाद का पूर्व वृत्तांत दिया गया है, अब पुस्तक के अंत में उसका खुलासा दिया जाता है। प्राक्कथन से पाठकों को महात्मा गांधी और बाबासाहेब आम्बेडकर के बीच हुए लेखनी संघर्ष के कारण का पता चल गया होगा। यह विवाद इस कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके पढ़ने से इन दोनों युग मानवों के विचारों का स्पष्टीकरण एवं इनके आंतरिक स्वरूप का दर्शन हो जाता है। तुलनात्मक दृष्टि से महात्मा गांधी पिछड़े विचारों के ÷कट्टर हिन्दू' मनमौजी बनिया संत और राजनीति के बड़े नेता नजर आते हैं, और बाबासाहेब गम्भीर विचारक, सच्चे राष्ट्रवादी, समाज तत्वदर्षी और महान्‌ अध्ययनशीन विद्वान्‌ दिखायी देते हैं।
अब यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गयी है कि महात्मा गांधी की सारी योजनाएं, अव्यावहारिक होने के कारण, फेल हो गयीं। न उनका चरखा चला ने देश खादी का सफेद समुद्र दिखाई दिया, न हिन्दू मुस्लिम एकता हुई, न अछूतोद्धार ही हो सका, न अहिंसा ही कायम रह सकी और न सम्पत्ति का विकेन्द्रीकरण हुआ। उन्होंने करांची कांग्रेस में स्वतंत्रा भारत में ÷जनता के अधिकार' नाम का जो लम्बा प्रस्ताव पास कराया था, वर्तमान कांग्रेसी हुकूमत न उसे भी दफना दिया। महात्मा गांधी ने देश को आजादी दिलायी, यह बात भी बिल्कुल सत्य नहीं है, अंग्रेज लोग खुद ही भारत को आजाद करना चाहते थे, क्योंकि द्वितीय महायुद्ध में, अपने विशाल साम्राज्य की रक्षा करने में, उन्हें अपार धन खर्च करना एवं अत्यंत कष्ट उठाना पड़ा था। अत्यधिक हानि उठा कर वे किसी तरह अपनी इज्जत कायम रख सके, अपनी हार कहीं नहीं होने दी। अतएव महायुद्ध के बाद वे अपने अधीन देशों को आजादी देने के लिए आतुर थे और उन्होंने भारत, बर्मा, लंका, मलाया, मैडागास्कर इत्यादि अनेक देशों को स्वतंत्राता देकर विश्व के इतिहास में अपनी कीर्ति को अमर बना लिया।
स्वाधीनता प्राप्त करते समय भारत अगर दो खंडों में बंट गया, तो इसमें भी अंग्रेजों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान तो हिन्दू और मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता के परिणाम हैं। दोनों धर्मों के अंधभक्त रहते हुए दोनों में मेल हो ही नहीं सकता और धर्म में कोई टस से मस होना नहीं चाहता।
कहा जाता है, महात्मा गांधी को ÷हिन्दू' शब्द बहुत प्यारा था। परन्तु यह उनका अंधा प्रेम था, इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है। क्योंकि कोई ज्ञाता पुरुष ÷हिन्दू' शब्द को ठीक नहीं समझता। मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिक्ख शब्द तो अपने अपने अथोर्ं में ठीक हैं, परंतु ÷हिन्दू' का अर्थ ठीक नहीं है। ÷हिन्दू' नाम का कोई धर्म नहीं है। ÷हिन्दू' नाम का न कोई अवतार या देवता है, न ÷हिन्दू' नाम का कोई पवित्रा धर्मग्रंथ है, न ÷हिन्दू' किसी ऋषि मुनि या महापुरुष का नाम है, और न हिन्दू किसी देश का ही नाम है। भारत के प्राचीन पाली प्राकृत, संस्कृत और वैदिक भाषाओं के प्राचीन साहित्य में कहीं भी ÷हिन्दू' शब्द नहीं पाया जाता। तब हिन्दू शब्द आ कहां से गया? अनुसंधान करने से पता चला कि भारतीयों का ÷हिन्दू' नाम विदेशी विजेताओं का दिया हुआ है। ÷हिन्दू' शब्द फारसी के ÷गयासुल लुगात' नामक शब्दकोष में मिलता है, जिसका अर्थ काला, काफिर, नास्तिक, सिद्धांतविहीन, असभ्य, वहशी आदि है। इस देश के समस्त निवासियों को किसी एक शब्द से पुकारने की जब मुस्लिम आक्रमणकारियों को जरूरत हुई तो उन्होंने यहां के निवासियों को ÷हिन्दू' नाम से सम्बोधित किया, और आश्चर्य तो यह है कि विदेशियों के दिये इस घृणित नाम को ब्राह्मणों ने अपने धर्म का नाम स्वीकार कर लिया तथा अपने धर्मग्रंथों को वे ÷हिन्दू शास्त्रा कहने लगे!
मजा यह है कि ब्राह्मणों के सिवा और किसी भारतीय धर्म ने अपने धर्म का नाम हिन्दू धर्म स्वीकार नहीं किया। जैन, बौद्ध, सिक्ख कोई भी अपने धर्म को हिन्दू धर्म नहीं कहते। महान्‌ सुधारक महर्षि दयानंद ने भी ÷हिन्दू' शब्द ग्रहण नहीं किया। महर्षि दयानंद आरम्भ में थियोसोफिकल सोसाइटी के आचार्य कर्नल अलकट साहेब के साथ प्रचार करते थे। थियोसोफिस्ट लोग प्रत्येक धर्म के आंतरिक तत्वों की खोज किया करते हैं। मैडम बेलवेस्टकी ने भारतीय योग विद्या का अनुसंधान किया, मिस एनीबेसेण्ट ने गीता और उपनिषदों पर टीकाएं लिखीं और महाभारत का सार लिखा, इत्यादि। एक दिन कर्नल अलकट महोदय ने महर्षि दयानंद से ÷हिन्दू' शब्द के बारे में पूछाᄉ ''आप अपने धर्म को ÷हिन्दू धर्म' किस आधार पर कहते हैं?'' तो महर्षि दयानंद को कोई उत्तर न सुझाई दिया। उन्होंने अपने गुरु विरजानंद स्वामी के परामर्श से अपने धर्म का नाम वैदिक धर्म तथा अपने अनुयायियों को ÷आर्य' कह कर ÷आर्य समाज' का प्रवर्तन किया। ÷हिन्दू' शब्द को घृणित समझ कर त्याग दिया। परंतु सनातनी ब्राह्मण पंडित आज भी ÷हिन्दू' शब्द से बुरी तरह चिपके हुए हैं। क्यों?
इस प्रश्न का उत्तर बाबासाहेब आम्बेडकर ने दे दिया है। बाबासाहेब ने साफ दिखा दिया है कि ब्राह्मण वस्तुतः ÷हिन्दू' शब्द के वाच्य हैं अर्थात्‌ नास्तिक, सिद्धांतविहीन, काफिर, लोभी और धर्म व्यवसायी हैं। अगर इनका कोई सिद्धांत है, तो बस स्वार्थ और भोगैश्वर्य परायणता। बाबासाहेब ने ब्राह्मणों की सिद्धांतहीनता और स्वार्थ परायणता का चित्रा खींचते हुए लिखा हैᄉ ''ब्राह्मण प्रेम और शांति के देवता विष्णु का पुजारी है, प्रलय और संहार के देवता रूद्र का भी पुजारी है, करुणा के उपदेशक परम कारुणिक भगवान बुद्ध का भी पुजारी हो जाता है, जीव दया प्रचारक तीर्थंकर महावीर का भी पुजारी बन जाता है, रक्त की प्यासी प्रतिदिन पशुबलि चाहने वाली काली देवी का भी पुजारी है, क्षत्रिाय अवतार राम का भी पुजारी है और क्षत्रिाय वंश संहारी परशुराम का भी पुजारी है। वह उस पीर का भी पुजारी बन जाता है जो ब्रह्मा विष्णु महेश को ईश्वर अल्लाह का साझीदार नहीं मानता, इत्यादि। इतने विपरीत गुण रखने वाले देव देवियों का पुजारी बनने वाले के लिए क्या कहा जा सकता है? सिवाय इसके कि वह एक स्वार्थनिष्ठ, धर्म व्यवसायी और भोगैश्वर्य प्रसक्त प्राणी है, इसके सिवा उसका न कोई सिद्धांत है और न किसी पर विश्वास।''
इन्हीं ब्राह्मणों द्वारा निर्मित बेसिर पैर के हिन्दू धर्म के महात्मा गांधी अंधभक्त थे। महात्मा जी की दलील थी कि ''अगर कोई व्यक्ति हिन्दू शास्त्राों को नहीं मानता, तो वह हिन्दू कैसे रह सकता है? जो कुरान नहीं मानता, वह मुसलमान नहीं रह सकता और जो बाइबिल नहीं मानता, ईसाई नहीं रह सकता।'' चूंकि महात्मा जी हिन्दू थे और हिन्दू ही रहना चाहते थे, अतः हिन्दू शास्त्राों पर भी उनकी अटूट श्रद्धा थी।
छुआछूत और उ+ंच नीच के सम्बंध में भी महात्मा गांधी की एक बड़ी विचित्रा मान्यता थी, जो ÷अगर मगर' पर आधारित थी। महात्मा जी छुुआछूत और उ+ंच नीच से परिपूर्ण हिन्दू शास्त्राों के सम्बंध में कहा करते थे कि मेरा यह निश्चित मत है कि ''अगर शास्त्रा वर्तमान छुआछूत का समर्थन करते हैं, तो मैं अपने को हिन्दू कहना छोड़ दूंगा। हिन्दू शास्त्रा अगर जाति का समर्थन करते हैं, तो मैं अपने आपको न हिन्दू कह सकता हूं और न ही हिन्दू रह सकता हूं।'' किन्तु जब बाबासाहेब आम्बेडकर ने पवित्रा हिन्दू शास्त्राों के ढेरों प्रमाण पेश किये, जिनमें छुआछूत, उ+ंच नीच, जाति भेद और वर्ण भेद का जबर्दस्त समर्थन और कठोर आदेश है, तो महात्मा जी तिलमिला गये, उन्हें बचने का कोई रास्ता न मिला, और वे उन शास्त्रा वचनों पर ही संदेह करने लगे, और सवर्ण हिन्दुओं से उत्तर मांगने लगे कि ''क्या जो धर्म ग्रंथ छपे हैं, उनका कोई अंश अप्रामाणिक क्षेपकों की भांति अस्वीकार किया जा सकता है?'' महात्मा जी की इस शंका का उत्तर आचार्य बिनोवा भावे भी, जिनसे उन्होंने गीता पढ़ी थी, न दे पाये, और न इनका अब तक कोई समाधान हो पाया।
किन्तु इस शंका से यह सिद्ध हो गया कि महात्मा जी स्वयं शास्त्राों का ज्ञान नहीं रखते थे, दूसरों के मुंह से सुनी सुनाई बातों के आधार पर शास्त्राों पर उनकी निष्ठा थी। जब शास्त्राों के भीतर भरा हुआ जहर माहुर सामने पेश हुआ, तो वे उन शास्त्रा वाक्यों के ही अप्रामाणिक और प्रक्षिप्त होने की शंका करने लगे, और संतों की शरण पकड़ने लगे कि शास्त्राों का जो अर्थ संतजन करते हैं, मैं उसे ठीक मानता हूं। लेकिन महात्मा जी ने ÷चैतन्य' आदि जितने संतों के नाम गिनाये, उनमें एक भी संत शास्त्राों का टीकाकार या भाष्यकार नहीं है। यह बात सभी जानते हैं कि संतों का ज्ञान आत्म अनुभवजन्य स्वतंत्रा होता है, संत जन शास्त्राों के मोहताज नहीं हैं। केवल अपने आत्म अनुभव ज्ञान की जहां कहीं किसी शास्त्रा वाक्य से पुष्टि होती है यदा कदा उसका हवाला दे दिया करते हैं। कबीर, नानक, दादू आदि जनों के साहित्य में भी वेद शास्त्रा के वचन उद्धृत मिलते हैं। ऐसी दशा में महात्मा जी की यह बात बिल्कुल भोले भाले बच्चों जैसी है कि शास्त्राों का वही अर्थ ठीक है जो साधु संत करते हैं। साधु संत तो अपने ज्ञान द्वारा जनता का हिन्दू शास्त्राों से पिण्ड छुड़ाते पाये जाते हैं, वे शास्त्राों के अथोर्ं के जिम्मेदार नहीं हैं। चतुर ब्राह्मणों ने शास्त्राादेशों के पालन करने कराने का जिम्मेदार क्षत्रिाय राजाओं को ठहराया है जिनका वे तिलक करते हैं, और विरुद्धाचरण करने पर जिन्हें वे राज्यच्युत भी कर देते हैं।
महात्मा जी की एक भारी विचित्राता ईश्वर सम्बंधी भी है। उन्होंने कई जगह लिखा है कि ''पहले मैं कहता था कि ईश्वर सत्य है किन्तु अब मैं कहता हूं, सत्य ही ईश्वर है।'' जब उनसे पूछा गया कि आप यदि ÷सत्य' को ईश्वर मानते हैं, तो फिर जन्म मरण के बंधन से ग्रसित रघुपति राघव राजाराम की धुन क्यों लगाते हैं, आपको तो लोग ÷राष्ट्रपिता' कहते हैं। राष्ट्र में हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, सिक्ख, जैन, बौद्ध, निर्गुणी सगुणी, सभी हैं, तो फिर आपके द्वारा यह संकीर्ण साम्प्रदायिक धुन कैसी? इस आपत्ति के उत्तर में उन्होंने कहाᄉ ''जब मैं मुसलमानों की सभा में जाता हूं , तो वहां ÷अल्लाह' कहता हूं और जब ईसाइयों की सभा में बोलता हूं, तो ÷गॉड' कहता हूं।'' इस उत्तर और पहले पिछले की मान्यता से साफ सिद्ध है कि महात्मा जी का ईश्वर सम्बंधी कोई स्थिर सिद्धांत नहीं था। जहां जैसा देखते, वहां वैसी बात कह देते। महज हिन्दुओं की नजरों में अपने को कट्टर हिन्दू साबित करने के लिए वह रघुपति राघव राजाराम की धुन लगाया करते थे। मन में कुछ, वाणी में कुछ और कमोर्ं में कुछ और ही उनका तरीका था। फारसी कोशकार ने ÷हिन्दू' शब्द का यही अर्थ किया भी है!
महात्मा जी की इस साम्प्रदायिक रामधुन के विरुद्ध जब उपर्युक्त आपत्तियां उठने लगीं, तो उन्होंने राम धुन के साथ एक मिसरा ÷ईश्वर अल्ला एको नाम, सबको सम्मति दे भगवान' और जोड़ा। लेकिन यह चला नहीं। क्योंकि साम्प्रदायिक रामधुन के साथ इसका कोई तुक न था। सब जानते हैं कि ईश्वर को कबीर, रैदास, नानक, दादू आदि महान्‌ संत निरंजन, निर्विकार, निर्लेप, निराकार, अयोनिज, अनादि इत्यादि मानते हैं। उपनिषदों में भी उसे अकाय, अब्रण, अवाड्. मनसगोचर आदि माना गया है, तथा मुसलमान लोग भी अल्लाह को वहदहू लाशरीक कहते हैं। उस ÷ला इलाहा इल अल्लाह' के नाम के साथ ईश्वर का नाम तो लिया जा सकता है, क्योंकि ईश्वर और अल्लाह की सिफत और लक्षण एक समान है, किन्तु जन्म मरण व नस नाड़ी बंधन में फंसे तथा राग द्वेष और नारी प्रेम विरह से क्लेशित सविकार राम को न तो निर्विकार ईश्वर के साथ जोड़ा जा सकता है और न वहदहू लाशरीक अल्लाह के साथ। अल्लाह के साथ किसी भी देवता ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र अथवा राम, कृष्णादि अवतारों को शरीक नहीं किया जा सकता। अल्लाह की जाते पाक के साथ किसी को शरीक करने वाला ÷मुशरिक' कहलाता है, और मुशरिक के लिए कुरान में लिखा हैᄉ ÷अल मुशरिको नजिस' अर्थात्‌ मुशरिक नजिस है, उसे छूना भी पाप है। इधर राम कृष्णादि को ब्राह्मण शास्त्राकार विष्णु के अवतार कहते हैं, विष्णु भी लक्ष्मी के पति होने के कारण निर्विकार नहीं हैं। इसलिए विष्णु और विष्णु के अवतार कोई भी निरंजन निर्विकार ईश्वर के साथ जोड़े नहीं जा सकते। अवतार केवल आदर्श महापुरुष कहे जा सकते हैं, और अवतारों की उपासना आदर्श पूजा, वीर पूजा या आइडियल वर्शिप ही है। जैसा कि जैनों के तीर्थंकर और बौद्धों के सम्यक्‌ सम्बुद्ध तथा मुसलमानों के हजरत इमाम हुसैन। प्रभु ईसा मसीह और हजरत मोहम्मद साहेब भी रसूल और पैगम्बर हैं, स्वयं ईश्वर नहीं। आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद सरस्वती की भी यही मान्यता है, इसे सभी आर्य सज्जन जानते हैं। इन सबको दृष्टि में रखते हुए महात्मा गांधी की रघुपति राघव राजाराम नामक साम्प्रदायिक रामधुन के साथ ईश्वर अल्लाह एकी नाम का मेल नहीं बैठता, इसलिए यह चला भी नहीं। न मुसलमान इस वैष्णवी मायाजाल में फंस कर गुमराह हुए और न हिन्दू वहदहू लाशरीक अल्लाह का भजन कर सके। अतः इस ईश्वरबाजी में भी महात्मा जी फेल ही रहे!
महात्मा जी यदि गम्भीर और निष्पक्ष विचारक होते, तो देखते कि भारत के जाति वर्ण विहीन धर्म, जैन और बौद्ध तथा आधुनिक वैज्ञानिक इत्यादि किसी कर्ता ईश्वर के अस्तित्व के कायल नहीं हैं, उनके लिए तो यह रामधुन उबा देने वाली चीज है। राष्ट्रपिता को उनका भी ख्याल रखना चाहिए था, क्योंकि ये सब भी राष्ट्र के विशाल अंग हैं। उन बुद्धिवादियों पर साम्प्रदायिक ÷रामधुन' लादना एक प्रकार का मानसिक बलात्कार, अनैतिकता, अन्याय और उनके स्वतंत्रा चिन्तन पर प्रतिबंध लगाने जैसा अवैध अपराध है, जो किसी राष्ट्रवादी के लिए नितांत अशोभनीय है। अपने विश्वास के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को चलने की स्वाधीनता है, किन्तु सार्वजनिक सभाओं, स्थानों, सड़कों पर लाउडस्पीकर लगा कर इस प्रकार रामधुन का हंगामा मचाना शांतिभंग करने वाले अवांछनीय हुरदंग के सिवा और कुछ नहीं है। क्योंकि यह दूसरे सम्प्रदाय वालों को भी ऐसा ही हुरदंग मचाने की चुनौती देता है। यदि एक रामधुन का ढोल पीटे, दूसरा हरहर महादेव का सिंगीनाद करे, तीसरा अल्लाहो अकबर की बांग बुलंद करे और चौथा सत श्री अकाल का नरसिंहा बजावे, तो बेचारी राष्ट्रीयता की अर्थी निकलने के सिवा और क्या होगा?
महात्मा जी अक्सर ÷रामराज्य' का नारा लगाया करते थे। उनके इस रामराज्य का खुलासा उनकी गोष्ठी के प्रमुख सदस्य ÷श्री पट्टाभि सीतारमैया' ने अपने कांगे्रस के अध्यक्षीय भाषण में ÷ईश्वरीय राज्य' किया था। पट्टाभि सीतारमैया का संकेत महाप्रभु ईसा मसीह के स्वर्गीय राज्य की ओर था, जिसे वे धरती पर लाना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष की यह व्याख्या निरी धोखाधड़ी रही, कांग्रेसी हुकूमत में ÷हैविन' तो ÷अर्थ' पर आया नहीं, हां कलियुग के महान्‌ ब्राह्मण नेता श्री श्रीकरपात्राी स्वामी ने संकेत पाकर रामराज्य के नाम से ÷रामराज्य परिषद्' नाम की संस्था खोल दी, जिसका उद्देश्य दाशरथी रघुपति राघव राजा राम का आदर्श राज्य स्थापित करना है। वही रामराज्य जिसमें राम जी ने ताड़का नामक एक अबला नारी की तीर मार कर हत्या की, रावण की विधवा बहन की नाक काटी, भाई के साथ मल्लयुद्ध करते हुए बालि को पेड़ की आड़ से बहेलिए की तरह तीर का निशाना बनाया, अपनी सहधर्मिणी पत्नी राजमहिर्षी गर्भिणी सीता को पदच्युत करके एकाकी असहाय जंगल में छुड़वा दिया और वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध शूद्र होकर तपस्या करने के कारण तपस्वी शम्बूक का सिर काट डाला। वर्तमान काल में लोकतंत्रा के नाम से जो कांग्रेसी रामराज्य चालू है, उसकी भी तुलना सारे इतिहास में किसी काल के किसी राज्य से नहीं की जा सकती जिसमें खाद्यान्न और खाद्य वस्तुओं की इतनी महर्घता, उपयोग में आने वाली चीजों की इतनी भयंकर मंहगाई, इतनी भयानक मुनाफाखोरी, चोरबाजारी, जखीरेबाजी, इतना अधिक भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, गबन, कुनबापरवरी, चोरी, डकैती, धोखादिही, हत्या, आगजनी और अपहरण होता हो। मानों कि महात्मा गांधी का रामराज्य, जिसकी तुलना श्री पट्टाभि सीतारमैया ने मसीह के स्वर्गीय राज्य से की थी, अब अपने उपर्युक्त यथार्थ स्वरूप में साकार होकर देश पर छा गया है।
खुलासा यह कि बाबासाहेब के पांडित्यपूर्ण भाषण की आलोचना अपनी संकुचित हिन्दू दृष्टि से करके महात्मा गांधी बुरी तरह बाबासाहेब के तर्कजाल में फंस गये। उनकी आलोचना के उत्तर में बाबासाहेब आम्बेडकर ने उनकी मिथ्या दृष्टि और मिथ्या विश्वास की धज्जियां उड़ा दीं। चूंकि बाबासाहेब ने महात्मा जी के जीवनकाल में उनके यथार्थ आंतरिक स्वरूप का अनावरण कर दिया था, इसलिए अविवेकी, अन्यायी और विद्वेषी हिन्दू आज भी बाबासाहेब के पवित्रा नाम पर सत्तर कोण का मुंह बना कर उनकी निन्दा किया करते हैं। लेकिन कहावत है, चंद्रमा पर थूकने से थूक थूकने वाले के ही मुंह पर पड़ता है!
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साभार: तद्भव दलित विशेषांक http://tadbhav.com/dalit_issue/khulasa_chandrika.html#khulasa 

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