बुद्धं शरणम गच्छामि ! धम्मं शरणम गच्छामि ! संघम शरणम गच्छामि !
जय भीम ! जय बुद्ध ! जय भारत !
Leberty, Equality and Fraternity !
Educate, Agitate and Organize !
Loading

Monday 14 June 2010

आर्यों से युद्ध करने वाले अनार्य कौन थे?


आर्यों से युद्ध करने वाले अनार्य कौन थे?
के. नाथ 

हिन्दू साहित्य में पुराणों को अप्रामाणिक इतिहास का दर्जा प्राप्त है। इन पुराणों में आर्य अनार्य, देव दैत्य या सुर असुर के युद्धों का वर्णन है। यह प्रश्न मेरे मन को बार बार भ्रमित करता है कि आखिर जब आर्य भारत में आये, और आर्यों का युद्ध दैत्यों से हुआ तो ये दैत्य या असुर कौन थे? दलित या अस्पृश्य जातियों का पूर्वज कौन था? भारत में सैकड़ों दलित कहलाने वाली जातियों की सामाजिक आर्थिक दशा हीन कैसे हुई? इन्हें शिक्षा से वंचित और सामाजिक तिरस्कार का दुःख कैसे सहन करना पड़ा?
मेरे इन प्रश्नों का हल भी, भारतीय पौराणिक कथाओं में ही ढूंढा जा सकता है। मैंने भागवत देवी पुराण और भागवत सुधा सागर या शुक सागर नामक ग्रंथों से ही, इस मन की भ्रम दशा को मिटाने का प्रयास किया।
व्यास नाम के शूद्र, ऋषि पारासर के पुत्रा थे। उनकी मां का नाम सत्यवती था। व्यास ने वेदों की रचना की और उसे पढ़ कर अपने शिष्यों को सुनाया था। व्यास नीच कुल के थे। संस्कारहीन एवं नीच कुल में उत्पन्न, वेद पढ़ने के अनाधिकारी एवं स्त्रिायों तथा आर्यजनों को धर्मों का ज्ञान कैसे हो इसलिए धर्म ज्ञानार्थ इन पुराण संहिताओं का सम्पादन किया था। सतयुग, त्रोता युग व द्वापर युग में अनेक धर्म थे, किन्तुु कलयुग में पुराण श्रवण ही धर्म रह गया। क्योंकि इस युग में मनुष्य बर्बर नहीं रह गया था।
जब आयर्ोें ने भारत पर आक्रमण किया उस समय भारत की तीन दिशाओं में समुद्र था। कैटभ और मधु नाम के दो प्रतापी राजाओं का आधिपत्य था। उनमें असीम अभिमान था। ब्रह्मा जब आक्रमण करने आये, इन प्रतापी राजाओं के सामने टिक नहीं पाये और वापस चले गये। वे विष्णु के पास गये और विस्तार से भारत की भौगोलिक एवं सामरिक स्थिति का वर्णन किया तब विष्णु ने भगवती नाम की देवी द्वारा छल से मधु और कैटभ नाम के दैत्य राजाओं का विनाश किया और भारत में आयर्ोें का प्रवेश कराया। उस समय अनार्य राजा छोटे छोटे राजाओं में बंटे हुए थे। अफगानिस्तान से लेकर श्रीलंका, आस्ट्रेलिया, भारत के प्रायद्वीप तथा दक्षिणी अफ्रीका आदि, भारत की सीमाएं थीं। प्राकृतिक दृष्टि से पानी का कटाव ज्यादा नहीं था। बड़ी बड़ी नावों द्वारा इन भूखंडों में आना जाना था और व्यापार होता था।
विष्णु ने जिस भूखंड में पहले प्रवेश किया था, सम्भवतः वह महाराष्ट्र और गुजरात प्रांत था। क्योंकि अमरावती को उन्होंने अपना पहला उपनिवेश बनाया था और इंद्र को वहां सैन्य शक्ति संगठित करने के लिए नियुक्त किया था। इंद्र एक व्यक्ति का नाम नहीं था। सेनापति को इंद्र कहा जाता था।
छल से कैटभ व मधु की हत्या करने के बाद दूसरे अनार्य राज्य के राजा ह्यग्र्रीव से विष्णु का युद्ध हुआ। विष्णु परास्त होकर पुनः अपने देश लौट गये। इंद्र, ब्रह्मा और शंकर आदि ने यज्ञ किया और इस यज्ञ में विष्णु को लाने का प्रयास किया। लेकिन विष्णु इतने अचेत हो गये थे कि यज्ञ में शामिल होने का होश ही खो बैठे। ब्रह्मा ब्रमी नामक कीड़ा पकड़ कर लाये। ब्रमी कीड़े ने विष्णु के धनुष की डोरी काट ली। धनुष की प्रत्यंचा से विष्णु का धड़ उड़ गया। ऐसा भगवत पुराण में उल्लेख है।
विष्णु का सिर समुद्र में गिर जाने से उनकी पत्नी लक्ष्मी को दुःख हुआ। देवताओं ने उनके दुःख को देख कर कहा कि आप परेशान मत हों ह्यग्रीव नाम का एक दैत्य राजा सरयू नदी के तट पर बिना कुछ खाये, घोर तप कर रहा है। उसकी इंद्रियां वश में हो चुकी हैं। वह एक हजार वर्ष से भी अधिक कठिन तप कर रहा है। तुम वहां जाओ और उसे पथभ्रष्ट कर दो। उनकी पत्नी लक्ष्मी, तामसी शक्ति के रूप में, सज कर उसकी तपस्या भंग करने गयीं। लेकिन उसकी तपस्या को भंग नहीं कर सकीं। ब्रह्मा ने एक घोड़े का सिर काट कर विष्णु के धड़ से जोड़ दिया और छल से उस घोड़े रूपी विष्णु ने महान तपस्वी अनार्य सम्राट अयोध्या के राजा ह्यग्रीव का वध कर दिया। इस प्रकार आयोर्ं का कब्जा अयोध्या तक हो गया।
अवतार कथा
सृष्टि के आदि में नारायण ने लोकों के निर्माण की इच्छा की। विष्णु के इस स्वरूप को नारायण कहते हैं। नारायण अब तक इक्कीस अवतार ले चुके हैं। बुद्धावतार नारायण का इक्कीसवां अवतार है। मगध देश (बिहार) में देवताओं के द्वैषी दैत्यों को मोहित करने के लिए अजन (महामाया) के पुत्रा के रूप में बुद्धावतार हुआ। नारायण का पहला अवतार सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार, दूसरा सूकर (सुअर), तीसरा नारद, चौथा नर नारायण, पांचवां कपिल मुनि, छठा दत्तात्रोय, सातवां यज्ञ, आठवां ऋषभ देव, नवां प्रथु, दसवां मत्स्य, ग्यारहवां कच्छप (कछुआ), बारहवां धनवंतरि, तेरहवां मोहनी, चौदहवां नरसिंह, पंद्रहवां वामन जिसने दैत्यराज बलि से छल करके राज्य लिया, सोलहवां परश्षुराम (क्षत्रिायों का विनाश किया), सत्राहवां व्यास (वेदों की रचना की), अठारहवां रामचंद्र, उन्नीसवां यदुवंशी बलराम, बीसवां यदुवंशी कृष्ण इसके बाद कलयुग आ जाने पर मगध देश में बुुद्धावतार हुआ। अंत में जब राजा लुटेरे हो जायेंगे तब कल्कि अर्थात्‌ कलंकित परिवार में नारायण का जन्म होगा, जो राजाओं से सम्पत्ति छीन कर गरीबों को देंगे।
अंत में मगध देश में जरासंध के पिता वृहद्रथ के वंश में रिपुंजय अंतिम राजा होगा। उसके मंत्राी का नाम शुनक होगा। वह अपने स्वामी को मार डालेगा और अपने पुत्रा प्रद्योत को राज सिंहासन पर अभिषिक्त करेगा। प्रद्योत का पालक, पालक का विशारवयूप, विशारवयूप का राजक, राजक का पुत्रा नंदिवर्द्धन होगा। यह वंश 148 वर्ष राज्य करेगा।
इसके पश्चात्‌ शिशुनाग राजा होगा। शिशुनाग का काकवर्ण, उसका क्षेमधर्मा और क्षेमधर्मा का क्षेत्राज्ञ। क्षेत्राज्ञ का विधिसार (बिम्बसार) उसका अजातशत्राु, फिर दर्भक और दर्भक का पुत्रा अजय होगा। अजय से नंदिवर्द्धन और उससे महानंदि का जन्म होगा, जो तीन सौ साठ वर्ष तक राज्य करेंगे। महानंदि की शूद्रा पत्नी से नंद (घनानंद) जो बलवान राजा होगा। महानंदि से महापदम्‌ जो क्षत्रिाय राजाओं के विनाश का कारण बनेगा। तभी से राजा लोग प्रायः शूद्र और अधार्मिक हो जायेंगे। उसके सुभाल्य आदि आठ पुत्रा होंगे। सौ वर्ष तक पृथ्वी का राज्य करेंगे। कौटिल्य, वात्सायन और चाणक्य नाम से प्रसिद्ध एक ब्राह्मण होगा, जो नंद वंश का विनाश करेगा। उसका नाश हो जाने पर कलयुग में मौर्य वंश का उदय होगा। चाणक्य मौर्य वंश के चंद्रगुप्त को राजा के पद पर अभिषिक्त करेगा। चंद्रगुप्त का पुत्रा वारिसार (बिन्दुसार) और वारिसार का अशोक वर्धन। अशोक वर्धन का सुयश(कुणाल), सुयश का संगत (दशरथ) संगत का शालिशूल (सम्प्रति) शालिशूल का सोम शर्मा, सोम शर्मा का धन्वा और शत धन्वा का पुत्रा वृहद्रथ होगा। वृहद्रथ का सेनापति पुष्पमित्रा शुंग जो स्वामी को मार कर स्वयं राजा बन बैठेगा। पुष्पमित्रा का अग्निमित्रा, अग्निमित्रा का सुत्येष्ठ होगा। सुत्येष्ठ का बसुमित्रा, बसुमित्रा का भद्रक, भद्रक का पुलिन्द। इन राजाओं के बाद वंश का अंतिम शासक देवभूति होगा।
शुंग वंश के बाद कण्व वंश का वसुदेव, वसुदेव का भूमित्रा, भूमित्रा का नारायण, नारायण का सुशर्मा राजा होगा। सुशर्मा का शूद्र सेवक होगा। वह आंध जाति का होगा। इतिहास में 28 ई. पूर्व आंध अथवा सालवाहन वंश के सिन्धुक नाम व्यक्ति ने सुशर्मा का वध कर दिया। (इतिहास में सिन्धुक को अनार्य जाति का बताया गया है। कुछ ने ब्राह्मण माना है लेकिन उसके अंदर नाग वंश का रक्त था। इसलिए उसे पुराणों में शूद्र सेवक लिखा गया) सिन्धुक का भाई कृष्ण, कृष्ण का शांतिकर्ण आदि राजाओं का राज्य होगा। इसके बाद यवन और चौदह तुर्क राज्य करेंगे।
इसके बाद मगध देश का राजा पुररंजय होगा। वह ब्राह्मणों को पुलिन्द, यदु और मद्र आदि म्लेच्छ जातियों के रूप में परिणित कर देगा। इसकी बुद्धि इतनी दुष्ट होगी कि ब्राह्मण, क्षत्रिाय और वैश्यों का नाश करके शूद्र जनता की रक्षा करेगा। अपने बल वीर्य से क्षत्रिायों को उजाड़ देगा। ज्यों ज्यों कलयुग करीब आता जायेगा, ब्राह्मण संस्कार शून्य हो जायेंगे। नाम मात्रा द्विजों और म्लेच्छों का राज्य होगा। वे प्रजा का खून चूसेंगे।
उपरोक्त बात, भागवत पुराण में शुकदेव ने पांडु वंश के अंतिम राजा परीक्षित को पहले ही बता दिया। वह युग, द्वापर का युग कहा जाता था। बुद्धावतार के समय ही कलयुग प्रारम्भ होना माना गया है। लेकिन भागवत पुराण में बुद्धावतार का वर्णन नहीं किया गया है और न ही उनके दर्शन का वर्णन किया गया है। तथागत बुद्ध को अवतारों में शामिल करके उनके जीवन और दर्शन पर चर्चा न करना मात्रा उनके अनात्म एवं अनीश्वरवादी दर्शन को छिपाने की साजिश है।
भागवत पुराण में कृष्ण के जन्म से और नंद वंश के जन्म तक के बीच की अवधि, एक हजार एक सौ पंद्रह वर्ष में लिखी गयी है। इस प्रकार कृष्ण का जन्म ईसा पूर्व 1500 वर्ष का काल आता है। भागवत पुराण को वेद व्यास ने कृष्ण के समय ही लिखा है। ऐसा दृष्टांत भागवत पुराण में है। इस प्रकार तथागत बुद्ध और कृश्ष्ण के काल की अवधि का अंतर केवल 934 वर्ष का है। यहां यह लिखना इसलिए अवश्य समझा गया क्योंकि कृष्ण ने जिस दर्शन का प्रचार किया वह सांख्य दर्शन या कर्मयोग दर्शन के नाम से जाना गया। कृष्ण के बाद ही बुद्ध का अवतार माना गया है। जहां कृष्ण ने अपने को ईश्वर कह कर अपनी बात प्रमाणित करने की कोशिश की; वहीं बुद्ध ने अवतारवाद और ईश्वरवाद का खंडन कर दिया। इसके अतिरिक्त बुद्ध के द्वारा दैत्यों को मोहित करने की बात लिखी गयी है। बुद्ध ने दासों पर अत्याचार का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने अपने भिक्षु संघ में चांडाल तक को स्थान दिया था। दैत्यों को मोहित करने का अर्थ दासों को अपनी ओर आकर्षित करने से है। दैत्य का अपभ्रंश दास है, दास का शाब्दिक अर्थ दलित हो सकता है। यही दलित, अस्पृश्य, अंत्यज और बहिष्कृत, दस्यु आदि शोषित किये गये।
सृष्टि की रचना के नाम पर आर्यों का आक्रमण
भागवत देवी पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा सृष्टि की रचना के लिए पृथ्वी पर आये, उस समय दो दैत्य राजाओं का पृथ्वी पर राज्य था। कैटभ और मधु नाम के दो सगे भाइयों के असीम बल से घबरा कर ब्रह्मा भाग खड़े हुए और उनके असीम बल की चर्चा विष्णु से की। जिस बात को सनातन धर्म के लोग सृष्टि रचना मानते हैं। यह सृष्टि रचना नहीं है बल्कि सनातन धर्म का प्रचार है। या यों कहा जाय वह देव संस्कृति का प्रचार करने आये थे। विष्णु आर्यों का नेतृत्व कर रहे थे। इतिहासकारों ने आर्यों का स्थान आस्ट्रिया व हंगरी माना है। यह दानों ही छोटे देश यूरोप महाद्वीप में है। ईरान का अवेस्ता और आर्यों का वैदिक धर्म एक दूसरे से मिलता जुलता है। यूरोपीय देशों की साम्राज्यवादी नीति प्राचीन है। इस तरह भारत के पश्चिमी देशों के लोग कबीले के रूप में लूटने आये। विष्णु भी आर्य कबीले के सरदार थे। ब्र्रह्मा, विष्णु के औरस पुत्रा थे। विष्णु छल कपट करने में दक्ष थे। पूरे पुराण में विष्णु की कपट नीति कही गयी है। ब्रह्मा के भाग जाने पर विष्णु स्वतः युद्ध के लिए आये। लेकिन वह भी परास्त हो गये। कैटभ और मधु ने वाग्बीज नामक जाप से मन और इंद्रियों को वश में कर लिया था।
प्रसंग इस प्रकार हैᄉ परम आराध्य शक्ति क्या हैᄉ इसका रहस्य जानने के लिए दोनों दैत्य भाई वाग्बीज का अभ्यास करने लगे। अन्न और जल का त्याग कर दिया। मन और इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली। विष्णु विषयभोगी व्यक्ति थे जो उनके तेज के सामने टिक नहीं सके। उन्होंने भगवती देवी से उनको मारने का यत्न पूछा। और कहा कि इन दोनों को छल से मारना है। भगवती देवी को लेकर पुनः युद्ध के लिये गये। दैत्य राजाओं ने इन्हें देखते ही दौड़ा लिया। लेकिन रास्ते में भगवती देवी ने अपनी चितवन से दोनों प्रतापी राजाओं को अपनी ओर आकर्षित किया। इसी बीच विष्णु ने दोनों की गर्दन काट दी। इन दोनों ने आराध्य शक्ति के रहस्य को जान कर विष्णु को युद्ध स्थल से भगा दिया था। क्योंकि यह लोग पराशक्ति का प्रचार कर रहे थे। इस समय भारत अर्थात्‌ जम्बू द्वीप में दलितों अर्थात्‌ दैत्य पूर्वजों का ही आधिपत्य था।
प्रह्लाद
च्यवन नाम के एक ऋषि नर्मदा के तट पर स्नान कर रहे थे, नर्मदा नदी में स्नान करके नागों के नगर में प्रवेश कर गये। वहां राजा नागराज ने उन्हें पकड़ लिया। वह घबरा कर विष्णु को याद करने लगे। वहीं पर दैत्यराज प्रह्लाद तपस्या कर रहे थे। उन्होंने उसे देख कर पूछा कि तुम दैत्यों से शत्राुता रखने वाले इंद्र आदि आर्यों के गुप्तचर तो नहीं हो। उसने कहा कि मैं भृगु ऋषि का पुत्रा च्यवन हूं। मुझे इंद्र ने नहीं भेजा है। मैं नर्मदा में स्नान करने आया था। मुझे नागों से मुक्ति दिलाइये। प्र्रह्लाद दयालु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने उसे बंधन मुक्त कराया। तब उसने नैमिषारण्य नामक तीर्थ का वर्णन किया और बताया कि वहां निषादों, धीवरों, हूणों, बंगों एवं खस आदि म्लेच्छों की बस्ती है। उनमें से किसी एक का भी अंतःकरण पवित्रा नहीं है। प्रह्लाद नैमिषारण्य जाने को तैयार हो गये। प्र्रह्लाद ने कहा कि महाभाग दैत्यो उठो हम नैमिषारण्य चलेंगे। दानशील दैत्य उनके साथ नैमिषारण्य गये। वहां उन्हें सरस्वती नदी दिखाई दी। महात्मा प्र्रह्लाद को एक वट वृक्ष दिखाई दिया। दानेश्वर ने वहां बहुत से बाण देखे। बाण भिन्न भिन्न प्रकार से बने थे। उनमें गीध के पंखे लगे थे। प्र्रह्लाद को उन बाणों को लेने की इच्छा हुई। वहीं पर नर और नारायण नाम के ऋषियों के आश्रम थे। उनके पास दो चमकीले धनुष पड़े थे। वे शांग और आजगव नाम से प्रसिद्ध थे, उन ऋषियों को देख प्र्रह्लाद की आंखें क्रोध से लाल हो गयीं। उन्होंने ऋषियों से कहा कि तुम लोग क्या ढकोसला कर रहे हो। जब तुम लोग ऋषि हो तो तुम्हें धनुष की क्या आवश्यकता है। एक तरफ जटा धारण करके तपस्या करना और दूसरी तरफ धनुष धारण करना यह व्यर्थ का आडम्बर है। दोनों ऋषियों ने कहा कि युद्ध और तपस्या दोनों में ही मेरी गति है। ब्राह्मणों को ब्रह्म तेज बड़ी मुश्किल से मिलता है। आप व्यर्थ में ब्राह्मणों को न छेडं+े।
प्र्रह्लाद ने कहा कि मैं दैत्यों का राजा हूं। मेरे शासन में इस पवित्रा तीर्थ में इस प्रकार का अधर्मपूर्ण आचरण करना सर्वथा अनुचित है। तुम्हारे पास ऐसी कौन सी शक्ति है, मुझे समरांगण में दिखाओ। ऐसी बात सुन कर दोनों ब्राह्मण क्रोध से तमतमा उठे। प्र्रह्लाद अप्रतिम बलशाली वीर थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली कि मैं इन ऋषियों को अवश्य पराजित करूंगा। ऋषियों ने प्र्रह्लाद पर बाणों की बौछार कर दी। लेकिन धनुर्विद्या में निपुण दैत्यराज धर्मज्ञ प्र्रह्लाद ने भी उनके सभी बाण नष्ट कर दिये। प्रह्लाद ने पैने बाण इस प्रकार बरसाये जैसे मेघ की जलधारा गिर रही हो। इस प्रकार घोर युद्ध हुआ। उन दोनों ने गदा उठा ली। प्र्रह्लाद ने सुदृढ़ गदा के खंड खंड कर दिये और शक्ति नामक अस्त्रा का प्रहार कर दिया। विष्णु को पता चला कि ब्राह्मण हार रहे हैं। वह तुरंत वहां आ गये, और उनके जीवन की प्रार्थना की तथा प्र्रह्लाद को पुनः अपने देश जाने का अनुरोध किया तथा कहा कि धर्मज्ञ योद्धा निरीह तपस्या में लीन ऋषियों की हत्या करना पाप है। यह मेरे अंशावतार हैं। उनके समझाने पर प्र्रह्लाद असुरों के साथ वापस चले गये।
प्र्रह्लाद हिरण्यकश्यप के पुत्रा थे। हिरण्यकश्यप, दैत्यराज कश्यप के पुत्रा थे। हिरण्यकश्यप का देव संस्कृति के प्रचार में हमेशा विष्णु आदि आर्य काबीलाई सरदारों से युद्ध होता रहता था। दैत्य राजाओं के भय से देव जातियों ने अपना कोई स्थान नहीं बनाया था। वे घने जंगलों, सरोवर या पहाड़ की कंदराओं में छिप कर गुप्त मंत्राणा करते थे तथा समूह में एकत्रा होकर होम यज्ञ करते थे। इंंद्र इस देव कबीले का सरदार था जो विष्णु के कहने पर दैत्यों से युद्ध करता था। भोग विलासी होने के कारण कभी भी युद्ध में जीत नहीं सकता था। वह प्र्रह्लाद से युद्ध कर चुका था। प्र्रह्लाद अपने पुत्रा विरोचन कुमार बलि को राज्य सिंहासन पर बिठा कर गंधमादन नामक पर्वत पर सत्य की खोज में चले गये थे। देवताओं की यह चाल भी सफल न हो सकी। वे चाहते थे कि दैत्यराज प्रहलाद को संन्यास की शिक्षा देकर उनका राजपाट छीन लेंगे। लेकिन जब उसने बलि को राज्य अभिषिक्त कर दिया तो देवताओं ने भयंकर देवासुर संग्राम की घोषणा कर दी। विष्णु ने छल से बलि के राज्य पर विजय प्राप्त कर ली। सभी दैत्य, गुरु शुक्राचार्य के पास गये। शुक्राचार्य ने उनकी सहायता का आश्वासन दिया। गुप्तचरों ने इसकी सूचना देवताओं के पास पहुंचा दी। इंद्र आदि शुक्राचार्य के इस आश्वासन से घबरा गये। क्योंकि शुक्राचार्य शास्त्रा विद्या में अधिक निपुण थे।
इधर गुरु शुक्राचार्य दैत्यों को संगठित करके शस्त्रा विद्या का अभ्यास कराने लगे उधर देवताओं ने उन पर चढ़ाई कर दी। शुक्राचार्य ने कहा कि देव आदि जातियों के लोग हमेशा दैत्यों का वध करने के लिए तत्पर रहते हैं, प्र्रह्लाद के प्रतापी एवं दानशील पिता हिरण्यकश्यप का वध भी विष्णु ने नरसिंह का रूप धारण करके धोखे से कर दिया था। यह छल करने में पारंगत हैं। सामने से युद्ध में देव जाति के लोग दैत्यों से कभी जीत नहीं पाये हैं। जिस समय दानशील दैत्यराज युद्ध विद्या सीख रहे थे, शुक्राचार्य के आश्रम को घेर कर देवताओं ने आक्रमण कर दिया। शुक्राचार्य की माता ने उन्हें ऐसा करने से मना किया, जब नहीं माने तो खुद युद्ध में कूद पड़ीं और उन्हें परास्त कर दिया। शुक्राचार्य की माता योग विद्या की पूर्ण जानकार थीं। उनकी उस शक्ति से इंद्र और विष्णु भी भयभीत रहते थे।
विष्णु का सहायक सुदर्शन था। उसने छल से शुक्राचार्य की माता की गर्दन काट दी। उसकी गर्दन कटने से शुक्राचार्य के पिता भृगु ने नाराज होकर विष्णुु और इंद्र को शाप दिया। विष्णु ने शाप से बचने के लिए भृगु को एक दूसरी ब्राह्मणी भेंट कर दी। इधर इंद्र ने अपनी पुत्राी जयंती को शुक्राचार्य के पास भेज दिया। क्योंकि शुक्राचार्य के ब्र्रह्मचर्य से देव भयभीत रहते थे। शुक्राचार्य ने पूछाᄉ तुम कौन हो। उसने बताया कि मैं इंद्र की पुत्राी हूं मेरा नाम जयंती है। जयंत की छोटी बहन हूं। मुझे तुम्हारी सेवा के लिये भेजा गया है। आप मेरी मनोरथ पूर्ण कीजिये। शुक्राचार्य ने उस अविवाहित इंद्र कन्या जयंती को आश्रम में रख लिया और दस वर्षों तक भोग विलास में मस्त हो गये। जब दैत्यों को पता चला तो वे लोग उनसे मिलने गये। शुक्राचार्य को भोग विलास में मस्त देख कर निराश लौट आये।
इधर इंद्र ने गुरु वृहस्पति से कहा कि अब इसके बाद क्या करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दानवों के पास जाइये और उन्हें माया में फंसा लीजिये। वृहस्पति स्वयं शुक्राचार्य का रूप धारण करके दानवों के पास गये। उन्हें गुरु शुक्राचार्य समझ कर प्रणाम किया। उसने कहा कि मैं तुम्हारा कल्याण करने आया हूं। उसने ऐसी धारणा पैदा कर दी कि निश्चित गुरुदेव शुक्राचार्य हैं। इधर जयंती से क्रीड़ा करते दस वर्ष बीत गये थे। उन्हें अपने दैत्य शिष्यों की याद आयी। इधर जयंती का भी काम पूरा हो गया था। शुक्राचार्य जैसे ब्र्रह्मचारी के वीर्य से तृप्त जयंती ने शुक्राचार्य को दैत्यों के पास जाने की सलाह दी।
जब शुक्राचार्य दैत्यों के बीच आये तो वहां कपट रूप वृहस्पति को देखा। उन्हें आश्चर्य हुआ और सोचा इसने तो दैत्य शिष्यों को ठग लिया। उन्होंने दैत्यों से कहा कि यह धूर्त वृहस्पति है, जो मेरे रूप में आपको उल्टी और गलत शिक्षा दे रहा है। लेकिन दैत्यों ने उल्टे शुक्राचार्य को डांटा। शुक्राचार्य समझ गये कि इन दस वर्षों में इसने इन्हें पक्का कर लिया है। शुक्राचार्य कुपित होकर चले गये। वृहस्पति भी वहां से जाकर इंद्र से मिले और कहा कि दैत्यों ने मेरे ऊपर विश्वास कर लिया है। इंद्र ठहाका मार कर हंसे और वृहस्पति को अप्सराएं आदि भेंट कर उनका खूब स्वागत किया। इधर दैत्यों ने समझ लिया कि वेषधारी वृहस्पति ठग था। उन्हें चिन्ता हुई। पुनः शुक्राचार्य के पास क्षमा के लिए गये। उन्होंने दैत्यों से कहा कि मैं तो सम्यक मार्ग बताने आया था लेकिन तुम लोग मेरी बात नहीं माने।
अनायोर्ं दैत्यों के साथ उनके पूर्वज धर्मज्ञ प्र्रह्लाद भी थे। उन्होंने कहा कि दुरात्मा वृहस्पति ने छल करके हमें ठग लिया है। शुक्राचार्य ने प्र्र्रह्लाद पर विश्वास किया और अनार्यों के गुरु बने रहना स्वीकार कर लिया। अनार्यों ने पुनः आयोर्ंं पर आक्रमण करने का निश्चय किया। प्र्रह्लाद असुरों के सेनापति बने और समर भूमि में पहुंच कर देवताओं को ललकारा। इस समय तक आर्यों ने पूरी तैयारी कर ली थी। वे युद्धभूमि में आ गये।
प्र्र्रह्लाद और इंद्र का घमासान युद्ध हुआ। पूरे सौ वर्षों तक युद्ध चला। युद्ध विद्या के प्राचार्य शुक्राचार्य के नियोजित युद्ध में दानवों की विजय हुई। आर्य हताश हो गये। वृहस्पति ने इंद्र को सलाह दी कि कैटभ और मधु दैत्य (दलित) राजाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवती देवी का सहारा लिया गया था, उन्ही के पास जाकर मदद लो, और कहो कि हम अत्यंत निर्बल हो गये हैं। हमें दैत्यों ने परास्त कर दिया है। अतः इस संकट में हमें बचाओ। उस समय भगवती भुवनेश्वरी ने लाल वस्त्रा पहन रखा था। उन्होंने इंद्र से कहा कि तुम्हारा कल्याण करूंगी। वह अनायोर्ं के पास गयीं और उन्हें समझा बुझा कर युद्ध संधि करा दी।
लीलावतारों की कथा

जैसा कि पहले ही वर्णन किया जा चुका है कि देव जातियां जो गौर वर्ण की थीं, यह भारत में आयीं और किस तरह यहां के मूल निवासियों के साथ छल करके उनके राज्य और सम्पत्ति छीना। किस तरह से पुराणों में दैत्यों को दानशील, महात्मा तपस्वी लिखने के बाद भी अपनी ही कलम से दुरात्मा लिख कर विष्णु, शंकर, ब्रह्मा और इंद्र द्वारा छल से इनकी हत्याएं हुइर्ं। आज भी दलित समाज इनके कुचक्र से मुक्त नहीं है। भागवत पुराण के द्वितीय स्कंध में एक सातवां अध्याय है जिसका शीर्षक है, भगवान के लीलावतारों की कथा। इसका वर्णन ब्रह्मा द्वारा कराया गया है। जो इस प्रकार हैᄉ
अनंत भगवान ने प्रलय के जल में डूबी हुई पृथ्वी का उद्धार करने के लिए समस्त यज्ञमय वाराह शरीर ग्रहण किया था। आदि दैत्य हिरण्याक्ष जल के अंदर ही लड़ने के लिए उनके सामने आया। (यहां यह बताना आवश्यक है कि हिरण्य का अर्थ सोना है। सोना हड़पने के लिए विष्णु ने उससे युद्ध किया।) विष्णु ने सुअर का रूप धारण करके उसकी हत्या की। क्रमवार अवतारों की कथा इस प्रकार हैᄉ
वाराह अवतार
सनकादिक आदि प्रथम अवतार हैं। दूसरा सुअर अवतार इस प्रकार है। पृथ्वी को अथाह जल में डूबी देख कर ब्रह्मा बहुत देर तक सोचते रहे कि मैं कैसे इसे निकालूं। उसी समय उन्हें छींक आयी और उनके नाक से एक सुअर का बच्चा निकला जो देखते ही देखते हाथी के बराबर हो गया। वे उस सुअर को दिव्य प्राणी मान कर उसकी स्तुति करने लगे। उसकी घुरघुराहट (घू घू की सुअर की बोली) को देवताओं ने वेदों का उच्चारण माना। सुअर ने पूंछ उठा कर आकाश की तरफ उछाली और गर्दन के बालों को फटकार कर खुरों के आघात से बादलों को छितराने लगा। उसका शरीर कठोर था। बाल कड़े थे। दाढं+े सफेद थीं, नेत्राों से तेज निकल रहा था। वे भगवान स्वयं यज्ञ पुरुष थे। सुअर का रूप धारण करके नाक से सूंघ सूंघ कर पृथ्वी का पता लगा रहे थे। वे बड़े क्रूर जान पड़ते थे। मारीच आदि मुनि बड़ी सौम्य दृष्टि से उन्हें निहार रहे थे। उस समय उनका बज्रमय कठोर कलेवर जल में गिरा, मानो समुद्र का पेट फट गया हो। (अर्थात्‌ सुअर पानी में कूदा) देवता पुकार रहे थेᄉ हे यज्ञेश्वर मेरी रक्षा करो। यज्ञमूर्ति सुअर अपार जलराशि को चीरते हुए उस पार पहुंचा। वहां उसने पृथ्वी को देखा, और अपनी दाढ़ों से पृथ्वी को उठा कर ऊपर लाने लगा। महापराक्रमी हिरण्याक्ष ने जल के भीतर ही उस पर गदा प्रहार कर दिया। सुअर ने हिरण्याक्ष को मार डाला। सुअर की थुथनी में लगा रक्त जैसे गजराज लाल टीले में टक्कर मार कर आ रहा है। ऐसा उल्लेख पुराणों में है।
नील वर्ण वाराह को देख कर ब्रह्मा व मारीच आदि ऋषियों को निश्चय हो गया कि ये भगवान ही हैं। उन्होंने इस सुअर को प्रणाम किया। वेद आदि मंत्राों से उस सुअर की स्तुति की, तथा उसके शरीर का वर्णन इस प्रकार कियाᄉ हे ईश ! आपकी थुथुन स्रुक है। नासिका छिद्रों से स्रुवां है। उदर में इडा (यज्ञीय भक्षण पात्रा) कानों में चमस्‌ है। मुख में प्रशित्रा (ब्र्र्रह्म भाग पात्रा) कंठ छिद्र में ग्रह (सोमपात्रा) है। आपका चबाना, वही अग्निहोत्रा है। गर्दन, उपसद (तीन इष्टियां) दोनों दाढ़ें प्रायणीय (दीक्षा के बाद की इष्च्च्िट) और उदयनीय (यज्ञ समाप्त की इष्टि) जिह्वा (जीभ), महावीर नाम का कर्म, सिर सम्य (होमरहित अग्नि) है। आपका वीर्य सोम है। आप सम्पूर्ण यज्ञ हैं। जो पुरुष आपके कार्यों से पार पाना चाहता है। उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। आपकी मोह माया से सारा जगत मोहित है, इस प्रकार वाराह अवतार भगवान ने पृथ्वी को जल के ऊपर स्थापित किया। विस्तृत कहानी इस प्रकार हैᄉ
हिरण्याक्ष व हिरण्यकश्यप के पूर्वजन्म की काल्पनिक कथा
दक्ष प्रजापति नामक एक अनार्य राजा थे। उनकी पुत्राी दिति ने पुत्रा प्राप्ति की इच्छा से कामातुर होकर सांयकाल अपने पति कश्यप से प्रार्थना की। कश्यप वर्तमान में कहार धीमर आदि जातियों के पूर्वज माने जाते हैं। उस समय कश्यप ध्यानमग्न थे। दिति ने कहाᄉ ''विद्वन्‌ ! मतवाला हाथी केले के पेड़ को मसल डालता है, वैसे ही कामदेव के बाण से मैं कामातुर हो रही हूं।''
कश्यप ने समझाते हुए कहाᄉ ''यह अत्यंत घोर समय राक्षसादि घोर जीवों का है। इस समय भगवान्‌ भूतनाथ (शंकर) के गण भूत आदि प्रेतों को लेकर बैल पर चढ़ कर घूमते रहते हैं, जिनके जटाजूट श्मशानभूमि से उठे हुए बवंडर की धूलि से धूसरति होकर देदीप्यमान हो रहे हैं। वे अस्त्रा लगाये घूम रहे हैं। वे सत्पुरुष होकर भी पिसाचों का आचरण करते हैं। यह नर शरीर कुत्तों का भोजन है। तुम धैर्य रखो।''
पति के समझाने के बाद भी दिति ने वेश्या के समान निर्लज्ज होकर कश्यप को नंगा कर दिया। कश्यप ने उसके साथ वेश्या की तरह सम्भोग किया। दिति को बाद में कश्यप के इस तरह के सम्भोग से निर्लज्ज होना पड़ा।
कश्यप ने अपनी पत्नी दिति के इस प्रायश्चित पर समझाया और कहाᄉ ''अमंगलमयी चंडी। तुम्हारे कोख से दो अधम पुत्रा पैदा होंगे, जो ब्राह्मण व देवताओं को परेशान करेंगे। तब विष्णु उनका वध करेंगे।''
दिति ने कहाᄉ ''तभी मेरे प्रायश्चित को मुक्ति मिलेगी। जब स्वयं विष्णु उनका वध करेंगे।''
पाठको! क्या कोई मां अपने पुत्राों की हत्या पर प्रसन्न हो सकती है? ऐसी झूठी कथाएं लिख कर दैत्य राजाओं की हत्या के प्रसंग पर सनातन हिन्दू प्रसन्न होता है। एक और असत्य इस प्रकार है। दिति ने अपने जन्म लेने वाले पुत्राों से देवताओं को कष्ट पहुंचाने की आशंका से कश्यप के वीर्य को 100 वर्षों तक अपने उदर में रखा। लेकिन इस गर्भस्थ तेज से ही लोकों में सूर्यादि का प्रकाश क्षीण होने लगा। इंद्र तेजस्वहीन हो गये। चारों दिशाओं में अंधकार हो गया।
देवता घबरा कर ब्रह्मा के पास गये और कहाᄉ ''कश्यप के वीर्य से स्थापित हुए दिति का गर्भ सारी दिशाओं को अंधकारमय कर रहा है।''
ब्रह्मा ने कहाᄉ ''देवताओ तुम्हारे पूर्वज एक बार विष्णुपुरी गये। वहां पर सभी देवता विष्णु बन गये। वहां बड़े बड़े नितम्बों वाली सुमुखी सुंदरियां घूम रही थीं। वे विष्णु के दर्शन के लिए छः ड्योढियां पार करके सातवीं पर पहुंचे। वहां गदा लिए पहरे पर दो लोग खड़े थे। उनकी भुजाएं बड़ी थीं। उनका रंग श्यामल था, आंखें लाल थीं। वे चारों देवता सातवें द्वार पहुंचने पर पांच साल के बालक बन गये। वे नंग धड़ंग बच्चों की तरह घूम रहे थे। द्वारपालों ने उन्हे नंगा जाने से मना किया। कहा कि कौन हो।
चारों नंगे मुनि नाराज हो गये और शाप दे दिया कि बैकुंठ से निकल कर पाप योनियों में जाओ। वे चारों नंगे ब्राह्मण सनकादि थे।
जब विष्णु को पता चला। उन्होंने चारों ब्राह्मणों को बुलाया और कहा यह दोनों मेरे पार्षद हैं। इनका नाम जय विजय है। लेकिन बिना मेरी आज्ञा के आप लोगों को रोका है इसलिए जो दंड आपने दिया है वह मुझे स्वीकार है। ब्राह्मण मेरे आराध्य हैं। इसलिए इनकी तरफ से मैं क्षमा मांगता हूं। यदि ब्राह्मणों का कोई अपमान करेगा तो चाहे मेरी भुजा ही क्यों न हो मैं इसे काट डालूंगा। ब्राह्मण जब घी से तरह तरह के पकवान खाते हैं, तब मैं जैसा तृप्त होता हूं, वैसा यज्ञ में अग्निरूप मुख से यजमान की दी हुई आहुतियों को ग्रहण करके नहीं होता। ब्राह्मण व दूध देने वाली गौएंᄉ ये ही मेरे शरीर हैं।
सनकादि ब्राह्मण का क्रोध शांत हुआ और दान दक्षिणा लेकर वापस चले आये। विष्णु ने दोनों पार्षदों से कहा तुमने एक बार मुझे भी लक्ष्मी के पास जाने से रोका था। तुम दोनों दैत्य योनि में जन्म लेकर प्रायश्चित करो।
पाठको! क्या विष्णु साक्षात्‌ ईश्वर कहलाने वाले व्यक्ति की ऐसी धारणा हो सकती है। ब्राह्मणों द्वारा लिखा गया यह ग्रंथ केवल ब्राह्मणों को सम्मान दिलाने के सिवा कुछ नहीं है। सनकादि ब्राह्मणों के शाप एवं विष्णु द्वारा द्वारपालों को पदच्युत करने के बाद वही जय विजय द्वारपालों ने दिति के गर्भ से जन्म लिया। उनके जन्म होते ही पृथ्वी में उत्पात शुरू हो गया। स्वर्ग और अंतरिक्ष में कोलाहल मच गया। बिजलियां गिरने लगीं। पृथ्वी और पर्वत कांपने लगे। अनिष्टकारक पुच्छल तारे दिखाई देने लगे। आंधी और तूफान चलने लगा। पेड़ उखड़ने लगे। सूर्य और चंद्रमा व अन्य ग्रह लुप्त हो गये। समुद्र में ज्वार भाटे उठने लगे। कमल सूख गये। गांवों में गीदड़ और उल्लुओं के भयानक शब्द उठने ले। तथा सियारियां आग उगलने लगीं।
कुत्ते ऊपर को मुंह उठा कर गीत गाते या रोने के अशुभ लक्षण देने लगे। झुंड के झुंड गधे अपने खुरों से पृथ्वी खरोंचने लगे तथा मस्त होकर रेकने लगे। गाय, बैल मल मूत्रा त्यागने लगे। गायों के थनों से खून बहने लगा। बादल पीब बरसाने लगा। देव मूर्तियां आंसू बहाने लगीं।
प्रजापति कश्यप ने उनका नामकरण किया। हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप नाम के दोनों बलवान बालक दिन प्रतिदिन बढ़ने लगे। उच्च शिक्षा ग्रहण की। दोनों भाइयों की लम्बाई अधिक थी। लम्बी लम्बी भुजाऐं तथा शरीर विशाल था। उनकी शारीरिक सुंदरता को देख कर चंद्रमा और सूर्य भी मात खा जाते थे।
यहां यह बताना आवश्यक है कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप दोनों ही शूद्र सम्राट थे। ब्राह्मणों ने तथागत बुद्ध की तरह इन्हें पूर्व जन्म में आर्यों की संतान बताया है। जब कि इन लोगों ने आयोर्ं से घनघोर युद्ध किया है। जलमग्न पृथ्वी को बाहर निकाल लाने की कल्पना झूठी है। लेकिन पानी से घिरे किसी महाद्वीप की खोज और उस पर आक्रमण की घटना सत्य है। क्योंकि वास्कोडिगामा और कोलम्बस की तरह आर्य भी अन्वेषण में निकले थे। सिकंदर व मोहम्मद गजनवी की तरह यह लोग आक्रमण करते थे और बहुत सी सम्पत्ति लूट कर गुफाओं छिप जाते थे।
इस प्रकार दैत्य या शूद्र राजाओं का जय विजय नामक बैकुंठ के पार्षदों का शापयुक्त जन्म हुआ।
नरसिंह अवतार (आधा आदमी आधा सिंह)
हिरण्यकश्यप ने अपनी भुजाओं के बल से जहां कहीं आर्यों की बस्तियां थीं सब खाली करा लीं। क्योंकि कश्यप धर्मात्मा राजा थे, उनके कारण आयोर्ं का प्रवेश काफी हो गया था। उन्होंने उनके बड़े पुत्रा हिरण्याक्ष का वध कर दिया था। हिरण्याक्ष के बाद हिरण्यकश्यप ने राजपाट संभाला और विशाल सेना के साथ स्वर्ग अर्थात्‌ अरावली सतपुड़ा की पहाड़ियों पर बसे बैकुंठ शहर पहुंच गये। उसके भय से देवता कायरों की तरह भाग खड़े हुए। इंद्र आदि राजाओं पर विजय प्राप्त करके छोटे छोटे प्रायद्वीपों में छिपे देवताओं को मारने के लिए तलाश करता रहा। उसने बीन बीन कर आर्य जातियों को नष्ट करने का संकल्प लिया। आयोर्ं की खोज में वह वरुण की राजधानी विभावरी पहुंच गया। वरुण सिंधी जाति के राजा थे। विभावरी सिंध प्रांत की राजधानी थी। वरुण घोड़े का व्यापार करते थे। आयोर्ं को घोड़े सप्लाई भी करते थे। सिंधी प्रारम्भ से ही आयोर्ं के साथ रहे हैं। उसने वरुण के दरबार में पहुंच कर आयोर्ं का साथ देने के लिए मना किया। न मानने पर युद्ध करने के लिए कहा। वरुण ने कहा कि मैं युद्ध करने योग्य नहीं हूं। आप विष्णु के पास जाओ उन्हीं से युद्ध करो। हमने आपकी अधीनता स्वीकार कर ली है।
हिरण्यकश्यप ने अपने अधीनस्थ राजा शकुनि, शम्बर, वृष्ट भतसंतापन, वृक्ष कालनाम, हिरश्मश्रु, महानाम को अपने दरबार में बुलाया और कहा कि आप लोग राज्य का प्रबंध देखें। मैं सत्य की खोज करूंगा। साथ ही आयोर्ं से विजय पाने की युक्ति सोचूंगा। वह मंदराचल की एक घाटी में जाकर अत्यंत दारुण तपस्या करने लगा। वह हाथ उठा कर एक पैर के अंगूठे के बल खड़ा हो गया। उसकी जटाएं सूर्य के समान चमकने लगीं। उसकी घोर तपस्या से जटाओं से धुआं निकलने लगा। उसकी तपस्या से देवता भयभीत हो गये।
देवता भाग कर ब्रह्मा के पास गये और कहा कि उसकी घोर तपस्या से ब्राह्मण और गौएं तड़पने लगी हैं। ब्रह्मा उनकी बात सुन कर भृगु और दक्ष को लेकर उसके आश्रम गये। वहां जाने पर देखा कि उसका शरीर घास व दीमक की मिट्टी से ढंक गया है, उसकी तपस्या के तेज से सभी आर्य देवता घबरा गये।
ब्रह्मा ने कमंडल से उसके ऊपर पानी छिड़क दिया। वह समस्त इंद्रियों पर विजय पा चुका था। उसका वज्र के समान कठोर एवं तपे हुए सोने की तरह शरीर चमक उठा। वह नवयुवक उठ खड़ा हुआ। उसके तेजस्व को देख कर ब्रह्मा आदि कांपने लगे। ब्रह्मा ने कहा कि तुम वरदान चाहते हो मांग लो। सभी देवता तुम्हारी शरणागत में हैं।
हिरण्यकश्यप ने कहा यदि मुझे वरदान देना चाहते हैं तो दे दीजिये। ऐसा वर दीजिये कि किसी भी प्राणी देवता नामादि से मेरी मृत्यु न हो।
ब्रह्मा ने तथास्तु कहा। ऐसा ही होगाᄉ ऐसा कह कर देवता वापस चले गये। वह पुनः अपने राज्य में वापस आ गया और स्वतन्त्रा राज्य करने लगा। देव आदि सभी उसके अधीन हो गये। वह इंद्र पद पर बैठ गया। गंधर्व, सिद्ध, ऋषि, गण, विद्याधर और अप्सराएं उसकी स्तुति करने लगे। वह इतना तेजस्वी था कि वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वालों की उसने यज्ञों में आहुति बंद कर दी। पशुओं की यज्ञ में बलि पर रोक लगा दी। इससे घबरा कर देवता विष्णु के पास गये। विष्णु ने कहा कि मैं उसका वध कर दूंगा। तुम लोग घबराओ नहीं।
दैत्यराज हिरण्यकश्यप के चार पुत्रा थे, जिसमें प्रह्लाद सबसे छोटा था। वह ब्राह्मणों का बड़ा आदर करता था। स्कूल में उसके ब्राह्मण गुरु ने छल से विष्णु की भक्ति का उपदेश दिया। वह विष्णु का भक्त हो गया।
शुक्राचार्य उसके पुरोहित थे। उनके दो पुत्रा थे उनका नाम था शंड और अमर्क। वे प्रह्लाद को राजनीति, अर्थनीति पढ़ाते थे। लेकिन वह विष्णु के सिवा, किसी की बात नहीं करता था।
अपने शत्राु का गुणगान सुन कर हिरण्यकश्यप नाराज हो गया। उसे समझाने लगा। तभी खम्भे की आड़ में छिप कर सिंह का मुखौटा लगाये विष्णु ने उस पर प्रहार कर दिया और उसका वध कर दिया और प्रह्लाद का राज्याभिषेक कर दिया। इसी को विष्णु का नरसिंह अवतार कहा जाता है।
देवासुर संग्राम का कारण
असुर राजाओं द्वारा आहुति, बलि, यज्ञ, कमोर्ं का विरोध करने पर सभी ब्राह्मण देवता आदि परेशान हुए। इससे उनकी आर्थिक दशा कमजोर हो गयी। वह धनहीन हो गये। यहां तक कि यज्ञ पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। अपनी दुर्दशा से दुःखी ब्राह्मण आदि देवता इंद्र वरुण को लेकर सुमेरु पर्वत पर ब्रह्मा के पास गये। उनकी दशा देख कर ब्रह्मा दुःखी हुए। वह उन्हें लेकर शंकर के पास गये। शंकर को साथ लेकर बैकुंठ शहर गये। जहां विष्णु का घर था। उनकी स्तुति की, और सारा हाल बताया।
विष्णु ने कहाᄉ इस समय असुरों पर काल की कृपा है। तुम लोग उनसे संधि कर लो। कोई बड़ा कार्य करना हो तो शत्राुओं से भी मेलमिलाप कर लेना चाहिए। तुम लोग बिना विलम्ब के अमृत निकालने का प्रयत्न करो। क्षीरसागर में सब प्रकार की घास, तिनका, लताएं, औषधियां डाल दो और समुद्र मंथन करो। दैत्यों से कहो कि इसे मथो। इसमें अमृत निकलेगा। वे थक कर कमजोर हो जायेंगे।
उनकी बात मान कर सब देवता दानशील राजा बलि के पास गये। जो प्रह्लाद का पौत्रा था। देवताओं को बिना अस्त्रा शस्त्रा के आता देख दैत्य सेनापतियों में बड़ा क्षोभ हुआ। वे महाराज बलि के पास पहुंचे। दैत्यराज बलि उस समय सम्पूर्ण भारत का सम्राट था। वे राज सिंहासन पर विराजमान थे। इंद्र आदि देवताओं ने उस शूद्र सम्राट को झुक कर प्रणाम किया। उसने इन पराजित देवताओं को सम्मान से आसन दिया और आने का कारण पूछा।
इंद्र ने कहा किᄉ विष्णु ने अमृत संदेश भेजा है। हम सब लोग मिल मंथन खोज करेंगे।
दैत्यों को उलझाये रखने एवं अनावश्यक शक्ति क्षीण करने की चाल में विष्णु और इंद्र सफल हो गये। दैत्यराज बलि मंथन के लिए तैयार हो गये। इस प्रकार दैत्यों और देवताओं में समझौता हो गया। जिस प्रकार वर्तमान में बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी का समझौता हुआ था उस समय इसी प्रकार देव दैत्यों का समझौता हुआ। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाने का निर्णय लिया गया। दोनों ही मिल कर पहाड़ उखाड़ने लगे। देवता बड़े बड़े पहाड़ के टुकड़े असुरों पर गिरा कर उनका वध करने लगे।
जिस समुद्र को मंथन के लिए निश्चित किया गया था। वह नागों का देश था, नागराज वासुकी ने इसका विरोध किया था। देवताओं ने अमृत का कुछ हिस्सा देने का समझौता किया।
पुराणों में नागराज वासुकी को नेति (रस्सी) बनाने का उल्लेख है और देवताओं ने छल से मुंह की तरफ दैत्यों को और पूंछ की तरफ खुद पकड़ कर समुद्र मंथन किया।
कच्छप अवतार (कछुआ रूप) 11वां अवतार
समुद्र मंथन विष्णु की चालाकी थी। उसने दैत्यों की ताकत, अनावश्यक क्षीण करने की चाल से समुद्र मंथन का निर्णय लिया। विष्णु कछुआ का रूप धारण करके समुद्र में छिप गये।
पुराणों में मंदराचल पर्वत को मथानी की तरह घसीट रहे थे तो विष्णु कच्छप बन कर अपनी पीठ पर मंदराचल को रखे थे, जिससे देवता थक न जायें। यही विष्णु का कच्छप अवतार है।
इस प्रकार निरंतर अन्वेषण के बाद इन्हें विष की खोज हो पायी, जिसे शंकर को दे दिया गया कि इसे ठंडी जगहों पर रखो। शंकर कैलाश पर्वत पर रहते थे। यह भाग वर्तमान में चीन के कब्जे में है लेकिन तिब्बत का हिस्सा है। वहीं विष को रख दिया गया।
विष को सुरक्षित स्थान पर रख कर फिर खोज में लग गये। उन्हें सभी जानवरों में गाय उपयोगी जानवर लगा, जिसका दूध पौष्टिक एवं निरोग बनाता है। पुराणों में उसे कामधेनु गाय कहा है। इससे अग्निहोत्रा में घी, दूध, आदि के लिए ब्राह्मणों को गाय दे दी गयी।
दूसरे जानवरों में घोड़े को चुना गया, जो मनुष्य के काम आ सकता है। पुराणों में उच्छेश्रवः नाम का घोड़ा निकला। वह ऊंची नस्ल का घोड़ा था। बलि ने उसे लेना चाहा। लेकिन विष्णु ने इंद्र को दे दिया। तीसरा उपयोगी जानवर हाथी को खोजा। पुराणों में ऐरावत हाथी निकला था। यह भी इंद्र को दे दिया गया। इसके बाद कोस्तुभ नाम की मणि की खोज की। उसे विष्णु ने खुद ले लिया।
अप्सराएं इंद्र ने ले लीं अप्सराओं के साथ बहुत सुंदर स्त्राी जिसका नाम लक्ष्मी था, उसके सौन्दर्य, औदार्य, यौवन, रूप रंग और चितवन से सबका मन मोह गया। देवता और दैत्य उस स्त्राी को पाने के लिए लड़ने लगे।
लक्ष्मी के मुख की अवर्णनीय शोभा थी। उसके कपोल गुलाबी थे। कमर पतली थी। दोनों स्तन बिल्कुल सटे और उठे हुए सुंदर थे। उन स्तनों पर चंदन और केशर का लेप था। पायजेब पहन कर जब चलती थी मानों लताएं इठला रही हों। वह देव दैत्यों के सामने इधर उधर घूम रही थी, कि वह किसे पसंद करें। लेकिन छल से सुंदर स्त्राी को विष्णु ने ले लिया था और फिर खोज में लग गये। वारुणी (शराब) मिली, उसे दैत्यों को दे दिया। जिसे पीकर राजपाट करना भूल जायें और धनहीन हो जायें।
इसके बाद आयुर्वेद अर्थात्‌ औषधियों की खोज की। उसे ही यह लोग अमृत कहते हैं। धनवंतरि वैद्य स्वयं औषधि का कलश लेकर आये। उसकी छीनाझपटी शुरू हो गयी। क्योंकि औषधि दैत्यों को नहीं देना चाहते थे। लेकिन ताकत से दैत्यों ने छीन लिया।
इस प्रकार जितनी वस्तुएं थीᄉ सब देवताओं ने चालाकी से ले लीं। केवल शराब दैत्यों के हिस्से आयी। जिससे मदांध होकर इनका विनाश हो जाये।
इस अमृत कलश को छीनने में तू तू मैं मैं शुरू हो गयी। यहां तक कि बलवान दैत्यों ने अमृत अपने कब्जे में कर लिया। विष्णु परेशान हुए कि इस औषधि के पा जाने से दैत्य निरोग्य हो जायेंगे। अब वह एक स्त्राी का रूप बना कर दोनों के बीच खड़े हो गये। इसी को विष्णु का मोहिनी रूप कहते हैं। स्त्राी के रूप में विष्णु के श्रृंगार का वर्णन इस प्रकार हैᄉ कानों में कर्णफूल, सुंदर कपोल, ऊंची नासिका, उभरे जवान स्तन, स्तन के भार से पतली कमर, भौंहे मटकाते, बालों में गजरा, गले में कंठ माला, हाथों में बाजूबंद, पैरों में घुंघरू, साड़ी, कमर में करधनी शोभायमान हो रही थी। अपनी सलज्ज (लज्जायुक्त या शरमाती हुई) मुस्कान, नाचती हुई तिरछी भौंहें और विलास भरी चितवन से दैत्यों को कामोत्तेजित करने लगे।
दैत्यों के पूछने पर उस मोहिनी रूप विष्णु ने बताया कि मैं कुलटा हूं। मैं व्यभिचारिणी स्त्राी हूं। दैत्यों ने हास परिहास में कलश स्त्राी रूपी विष्णु को दे दिया। उसने कहा बंटवारा मैं करूंगी। इस प्रकार छल से विष्णु देवताओं को औषधि अर्थात्‌ अमृत पिलाने लगे।
दैत्य न्याय की राह पर थे। उन्होंने कहा था कि हम न्याय करेंगे। लेकिन विष्णु ने सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। कुल मिला कर सारी आवश्यक वस्तुएं देवताओं को दे दीं। उस स्त्राी रूप विष्णु ने खुद आश्वासन देकर भी दवाएं देवताओं को दे दीं।
ऐसा देख कर राहु नाम का एक दैत्य उस पंक्ति में बैठ गया। चंद्रमा और सूर्य देवताओं ने विरोध किया तो विष्णु ने इनकी गर्दन काट दी।
पुराणों में लिखा है कि उसके गले के नीचे तक अमृत जाने से उसका सिर अमर हो गया और धड़हीन सिर ने चंद्रमा और सूर्य पर आक्रमण कर दिया। इसे ही चंद्र और सूर्य ग्रहण कहते हैं।
देवासुर संग्राम
छल कपट से दुखी महान न्यायवान दैत्य राजाओं ने आक्रमण कर दिया। यह युद्ध क्षीरसागर के तट पर हुआ। इसे ही देवासुर संग्राम के नाम से जाना जाता है। उस रणभूमि में विरोचन पुत्रा बलि, बेहायस नामक विमान से युद्ध कर रहे थे। दैत्यों की बलवान सेनाएं अस्त्रा शस्त्राों एवं कुशल योद्धाओं से पूर्ण थीं। राजा बलि नेतृत्व कर रहे थे। उनके चारों ओर अपने अपने विमानों पर नमुचि शम्बर बाण, विप्रचिन्ति, अयोमुख, द्विमूर्घा, कालनाम, प्रहेति, हेति, इल्वल, शकुनि, भूतसंताप, बज्रदष्ट, हयग्रीव, शंकशिरा, कपिल, मेघ दुंदभि, तारक, चक्राक्ष, शुम्भ, निशुम्भ, जम्म, उत्कल, अरिष्ट, अरिष्टनेमि, त्रिापुराधिपति, मय, पोलोम, कालेय और निवात कवच आदि अपनी सेनाओं के साथ विमानों पर थे। यह सब समुद्र मंथन या अन्वेषण में थे। इंद्र इनकी वीर सेनाओं को देख कर रो रहे थे।
देवताओं की सेना में वायु, वरुण, अग्नि आदि लोकपाल थे और दो दो की जोड़ियां बना कर युद्ध लड़ने लगे। बलि इंद्र से, स्वामिकार्तिका तारकासुर से, वरुण हेति से, भिन्न प्रहेति से भिड़ गये। यमराज कालनाम से, विश्वकर्मा मय से, शम्बरासुर त्वष्टा से, सविता विरोचन से, नमुत्रिा अपराजित से, अश्विनीकुमार वृषपर्वा से, सूर्य कलि से, राहु चंद्रमा से, पुलामा वायु से, भद्रकाली शुम्भ और निशुम्भ से, जम्भासुर से महादेव, महिषासुर से अग्नि, वातापि तथा इल्वल से ब्रह्मा, मारीचि, दुर्मष से कामदेव, शुक्राचार्य से वृहस्पति, नरकासुर से शनीचर देव, आदि का युद्ध होने लगा।
भीषण युद्ध हुुआ। राजा बलि ने देवताओं के छक्के छुड़ा दिये। माली और सुमाली भी दो दैत्य बलवान राजा युद्ध में थे। विष्णु ने माल्यवान राजा की गर्दन छल से काट दी।
वीर बलि ने इंद्र को फटकारा और कहा कि तुम लोग छल कपट से दैत्यों पर विजय पाना चाहते हो। इंद्र झेंप गया। सत्यवादी देव शत्राु बलि ने उसका अत्यंत तिरस्कार किया। (पाठको! सत्यवादी शब्द का प्रयोग या अन्य सम्मानित शब्द दैत्यों के लिए मैंने नहीं प्रयोग किये हैं। मैं तो अक्षरशः पुराणों की नकल कर रहा हूं।) इंद्र ने बज्र नामक अस्त्रा से बलि पर प्रहार किया। बलि गिर गये। जम्भासुर बलि का हितैषी था। वह सिंह पर सवार होकर इंद्र के पास गया और इंद्र की हंसली गदा प्रहार कर दिया। और उस महाबली ने ऐरावत हाथी पर प्रहार कर दिया। ऐरावत गिर गया। इंद्र भाग कर रथ पर चढ़ गया। दानव श्रेष्ठ जम्भ ने उस पर त्रिाशूल से प्रहार कर दिया। इंद्र ने धोखे से मावलि नामक सारथी की आड़ से बज्र चला दिया। जम्भासुर की मृत्यु हो गयी।
उसकी मृत्यु का समाचार सुन कर नमुचि आदि अनार्य राजा देवताओं पर झपट पड़े। नमुचि ने इंद्र को बहुत गालियां दीं और कहा कि धोखे से वार करते हो। तुम वीर नहीं कायर हो। उसने कहा कि इंद्र तुम बच नहीं सकते हो। उसने इंद्र पर त्रिाशूल चला दिया। त्रिाशूल सोने के आभूषणों से विभूषित था उसमें घंटे लगे थे।
इंद्र ने बज्र फेंक दिया। लेकिन नमुचि इतना यशस्वी एवं युद्ध कुशल था कि उसको खरोंच तक नहीं आयी। इंद्र डर गया। उसने बज्र समुद्र के फेन में सान कर उस पर फेंक दिया। नमुचि समझ नहीं सका और वह मारा गया। उसके मरते ही ब्राह्मणों ने पुष्पवर्षा की। नारद ने समझा कि देवता युद्ध से दैत्य वीरों से जीत नहीं सकते हैं। अमृत पीने के बाद भी देवताओं में युद्ध की क्षमता नहीं है। अंततः उसने दैत्यराज बलि को जो नेतृत्व कर रहे थे के बीच में शुक्राचार्य को डाल कर संधि कर ली।
उधर शंकर ने सुना कि विष्णु ने मोहिनी बन कर छल से देवताओं को अमृत पिला दिया, तो वे अपनी पत्नी सहित उनसे मिलने गये और मोहिनी बनने का रहस्य जानना चाहा। विष्णु ने कहा उस समय अमृत कलश दैत्यों के हाथ चला गया था। अतः देवताओं का काम बनाने के लिए और दैत्यों का मन एक नये कौतूहल की ओर खींचने के लिए मैंने स्त्राी रूप धारण किया। तुम देखना चाहते हो, लेकिन मेरा वह रूप काम वासना को उत्तेजित करने वाला है।
शंकर ने वह रूप देखने का अनुरोध किया। विष्णु अंदर गये और वही विश्वमोहिनी रूप धारण करके बाहर आये और सामने उपवन में वह मोहिनी गेंद खेलने लगी। वर्णन इस प्रकार हैᄉ
मोहिनी गेंद उछाल कर खेल रही थीं उसके स्तन उछल रहे थे। शंकर का मन मचल गया। एक बार मोहिनी के हाथ से उछल कर गेंद थोड़ी दूर चली गयी। वह उसके पीछे दौड़ी। उसकी साड़ी हवा में कमर से खुल गयी। शंकर कामातुर हो गये। वह उसके स्तन को पकड़ने के लिए लपके। मोहिनी ने स्तन साड़ी से ढंक लिया। वह भाग खड़ी हुई। शंकर ने उसके साथ सम्भोग के लिए उसका पीछा किया, और दौड़ते ही शंकर का वीर्य स्खलित हो गया। भागते हुए जहां जहां वीर्य की बूंदें गिरीं वहां वहां सोने चांदी की खानें बन गयीं। लेकिन शंकर पीछा करते ही रहे। तब विष्णु ने कपड़े उतार फेंका और कहा कि इसी मोहिनी रूप को देख कर दैत्य अपना धैर्य खो बैठे। तब मैंने दैत्यों से संधि करा कर देवताओं के प्राणों की रक्षा की।
इस प्रकार का विष्णु का घिनौना चरित्रा भला कौन स्वीकार करेगा। लेकिन हिन्दू समाज शिक्षित होकर भी इस रूपमान स्वरूप को मोहिनी कह प्रशंसा करते हैं।
राजा बलि की स्वर्ग पर विजय
बलि के पास सोने से मढ़ा हुआ रथ था। दिव्य धनुष और अक्षय तरकश थे। अक्षय अर्थात्‌ जिनका क्षय या नाश न हो। उनके पास प्रह्लाद की दी हुई माला थी। जिसके फूल कभी कुम्हलाते नहीं थे। शुक्राचार्य का दिया हुआ शंख था। वे दिव्य रथ पर सवार हुए। कवच धारण कर धनुष, तरकश व तलवार ली। उनकी भुजाओं में सोने के बाजूबंद और कानों में मरकत (माणिक) के कुंडल थे। वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे अग्निकुंड से ज्वाला निकल रही हो। उनकी आंखें क्रोध से लाल थीं। युद्ध का ढंग से संचालन करके इंद्र की अमरावती पर चढ़ाई कर दी।
अमरावती में सुंदर नंदन कानन (बागीचा) थे। आसपास खाइर्ं थी। चारों ओर परकोटा था। ऊंची ऊंची इमारतें थीं। बड़े बड़े राजमार्ग थे। खेल के मैदान थे। चौराहे और यज्ञ की वेदियां थीं। घरों में पटिकाएं, पताकाएं व झंडिया लहरा रही थीं। जगह जगह अप्सराओं एवं गंधर्वों का नाच गाना होता रहता था।
असुरों की सेना के स्वामी बलि ने चारों ओर से अमरावती घेर ली और शंख ध्वलि कर दी। इंद्र भयभीत होकर वृहस्पति के पास गये। वृहस्पति ने कहाᄉ देवताओं के दुश्मन भृगुवंशी ब्राह्मणों ने ही उसे सलाह दी है कि अमरावती पर चढ़ाई कर दो। क्योंकि बलि ने देवशत्राु भृगुवंशी ब्राह्मणों को पनाह दी है। तुम सपरिवार कहीं जाकर छिप जाओ।
वृहस्पति की बात मान कर इंद्र अमरावती छोड़ कर भाग गये। अमरावती पर बलि का आधिपत्य हो गया। भृगुवंशी ब्राह्मणों ने सौ अश्वमेघ यज्ञ कराये।
देवताओं के छिप जाने से देवताओं की मां अदिति दुःखी हो गयी। जब उनका पति कश्यप तपस्या से घर लौटा तो देखा कि अदिति एक पर्णकुटी में उदास बैठी थी। उसने उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया कि बलवान राक्षसों ने हमारी सम्पत्ति व पद छीन लिए हैं। हमें घर से निकाल दिया है।
कश्यप ने व्रत रहने को कहा। 12 दिन तक उसने व्रत रखा। छिप कर विष्णु उससे मिलने आये। उसने अपने व्रत का प्रयोजन बताया। विष्णु ने कहा कि मैं छिप कर तुम्हारे पति के वेश में रहूंगा। अपने वीर्य से एक पुत्रा उत्पन्न करूंगा जो बलि की सम्पूर्ण सम्पत्ति दान में ले लेगा।
विष्णु का वामन अवतार (पंद्रहवां अवतार)
इस प्रकार वरदान देकर कश्यप के वेश में विष्णु अदिति के घर में रहने लगे। अदिति गर्भवती हुई। भाद्रपद (ंभादों) मास के शुक्ल पक्ष द्वादशी को अदिति ने बच्चे को जन्म दिया। उसी को विजया द्वादशी भी कहते हैं। उसका शरीर नाटा था। लोग उसे बौना या वामन कह कर पुकारते थे। बड़ा होने पर लगोंटी लगा कर कमंडल हाथ में ले इधर उधर घूमने लगा।
घूमते घूमते राजा बलि की यज्ञशाला में आया। वह कमर में मूंज और मेखला धारण किये था। वामन रूप ब्राह्मण को देख अश्वमेघ यज्ञ में उसका सम्मान किया गया। और कहा कि आज्ञा कीजिये क्या सेवा करूं ? गाय, सोना, गांव, घोड़े, हाथी, रथ वह सब मुझसे मांग लीजिये।
वामन ने कहा कि आप यशस्वी सम्राट हैं। आपके कुल में कभी कोई वचनों एवं युद्ध से प्राण बचा कर भागने वाला कायर नहीं हुआ है। आपके कुल में प्रह्लाद जैसे निर्मल यश वाले और हिरण्याक्ष जैसे वीर का जन्म हुआ। जो अकेले ही गदा लेकर दिग्विजय पर निकले थे। आपके कुल में हिरण्यकश्यप ने विष्णु से युद्ध किया और वे भय से सूक्ष्म रूप बना कर छिप गये थे। आपके कुल में धर्माचार है। आप मुंहमांगी वस्तु देने में श्रेष्ठ हैं। आप तीनों लोक के स्वामी हैं, मैं अपनी आवश्यकता अनुसार ही दान लूंगा।
बलि ने कहाᄉ ब्राह्मण ! मैं तुझे जीविका चलाने के लिए भूमि दे सकता हूं आवश्यकता अनुसार मांग लो।
ब्राह्मण ने कहाᄉ राजन्‌ ! जो तीन पग भूमि से संतोष नहीं कर लेता वह विश्व का स्वामी होने पर भी संतुष्ट नहीं हो सकता। बलि ने हंस कर कहाᄉ अच्छा जो इच्छा हो मांग लो।
इतना सुन कर ब्राह्मण ने कमंडल उठाया और तीन पग भूमि संकल्प करने को कहा। बलि देने को तैयार हो गये। शुक्राचार्य उस ब्राह्मण की चाल समझ गये और कहा कि यह वामन रूप में विष्णु है। यह छल से तुम्हारा राज्य चाहता है।
बलि भी ब्राह्मण की चाल समझ गये। लेकिन कहा कि मैं प्रह्लाद जी का पौत्रा हूं। एक बार देने की प्रतिज्ञा कर चुका हूं। प्रतिज्ञा वापस नहीं ले सकता हूं। शुक्राचार्य ने देखा कि यह नहीं मानेंगे। तो उन्होंने कहा कि तू मूर्ख है, यह छल करके सारी सम्पत्ति ले लेगा।
राजा बलि बड़े महात्मा थे। वे सत्य से नहीं डिगे और विधिपूर्वक संकल्प कर दिया। विष्णु अपने असली रूप में आ गये और उन्होंने उसकी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया। उस मायावी विष्णु की चाल समझ कर दैत्यों ने हथियार उठा लिए और शूल लेकर वामन पर झपट पड़े। इधर देवता सभी पार्षदों को लेकर युद्ध को तैयार हो गये। बलि ने युद्ध करने से मना कर दिया और अमरावती इंद्र को वापस देकर पुनः आपने राज्य लौट गये।
इस प्रकार छल से दैत्य राजाओं की सम्पत्ति विष्णु ने छीनी। इसी को पुराणों में विष्णु का वामन अवतार कहते हैं।
मत्स्यावतार कथा
विष्णु के अवतारों में कितनी सत्यता है और कैसे उनके कारनामे रहे हैं, किस तरह से इस भारतीय समाज के पूर्वजों की हत्याएं उसने की हैं ऊपर के अवतारों में कहा जा चुका है। विष्णु का एक अवतार मछली का है।
ब्रह्मा के सो जाने के कारण ब्राह्म नामक नैमंतिक प्रलय हुआ था। इस समय भूलोक आदि के कई लोक समुद्र में डूब गये थे। नींद आ जाने के कारण ब्रह्मा के मुख से वेद निकल पड़े और उन्हीं के पास ही रहने वाले ह्यग्रीव नामक बली दैत्य ने उन्हें योगबल से चुरा लिया। अब कहानी इस प्रकार हैैैै। विष्णु को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने मत्स्यावतार धारण किया।
उस समय सत्यव्रत नाम के राजा केवल जल पीकर तपस्या कर रहे थे। वही सत्यव्रत वर्तमान में महाकल्प में विवस्वान (सूर्य) के पुत्रा श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए। वही वैवस्वत मनु के नाम से जाने गये। एक दिन कृतमाला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे। उस समय उनकी अंजुलि में एक छोटी सी मछली आ गयी।
द्रविड़ देश के राजा सत्यव्रत ने मछली को नदी में डाल दिया। मछली ने कहा कि इस जल में बड़े जीव जंतु मुझे खा जायेंगे। आप फिर मुझे जल में छोड़ रहे हैं। राजा ने मछली को फिर निकाल लिया और अपने कमंडल में रख लिया और आश्रम ले आये। रात भर में वह मछली बढ़ गयी। उसने उसे बड़े मटके में डाल दिया। मटके में भी बढ़ गयी तो उसे तालाब में डाल दिया अंत में उसे समुद्र में डाल दिया समुद्र में डालते समय उसने कहा कि समुद्र में मगर रहते हैं वहां मत छोड़िये।
बोलती मछली से राजा ने पूछा तुम कौन हो और आभास हुआ कि मछली रूप में विष्णु हैं। तब मछली रूप विष्णु ने कहा किᄉ आज से सातवें दिन प्रलय (अधिक वर्षा से) के कारण पृथ्वी समुद्र में डूब जायेगी। तब मेरी पे्ररणा से बहुत बड़ी नौका आयेगी। तब तुम सप्त ऋषियों सहित सभी प्राणियों को लेकर उस नाव में बैठ जाना तथा सभी अनाज उसी में रख लेना। अन्य छोटे बड़े बीज भी रख लेना। नाव पर बैठ कर लहराते महासागर में विचरण करना। प्रचंड आंधी के कारण नाव डगमगा जायेगी। तब मैं इसी रूप में आ जाऊंगा। तब वासुकि नाग द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध लेना। जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय जो तुम प्रश्न करोगे मैं उत्तर दूंगा। इतना कह मछली गायब हो गयी।
राजा पुनः फिर तपस्या करने लगे। मछली का बताया हुआ समय आ गया। वर्षा होने लगी। समुद्र उमड़ने लगा। तभी नाव आ गयी। वह ऋषियों, अन्न, बीजों को लेकर नाव में बैठ गये। तब भगवान रूपी वही मछली दिखाई दी। उसके सींग में नाव बांध दी गयी और मछली से पृथ्वी और जीवों को बचाने की स्तुति करने लगे।
मछली रूपी विष्णु ने उसे आत्मतत्व का उपदेश दिया। उसे हो मत्स्य पुराण कहते हैं। नाव में ही बैठे बैठे प्रलय का अंत हो गया। ब्रह्मा की नींद खुल गयी। विष्णु ने ह्यग्रीव राक्षस से वेद छीन कर पुनः ब्रह्मा को दे दिया और ह्यग्रीव की हत्या कर दी। क्योंकि ह्यग्रीव भी जल में तपस्या कर रहा था। उसने वेदों को सुन लिया था। इसलिए उसकी हत्या करना आवश्यक था।
उपरोक्त कहानी में कितनी सत्यता हो सकती है, यह तो विद्वान पाठक जान गये होंगे। लेकिन ह्यग्रीव नामक सत्यवादी दैत्य राजा की हत्या करने के लिए विष्णु ने इतना बड़ा नाटक किया। क्योंकि तपस्या करके वह पूर्ण वेदांती हो गया था। वेद का अर्थ विज्ञान से है। विज्ञान ही समय का विकास होता है। इसलिए उसकी हत्या करना आवश्यक था।
मनु वंश
प्रलय समाप्त हुआ। ब्रह्मा का आर्विभाव हुआ। वास्तविकता यह है कि आर्य किसी बड़े जहाजी बेड़े से भारत में आये जैसा कि इतिहासकारों ने यूरोपियन देशों से आने का मत दिया है। कैसपियन सागर से होते हुए अरब सागर को पार करते हुए हिन्द महासागर में आये और गोवा, बम्बई आदि समुद्री बंदरगाह में अपना जहाजी बेड़ा रोका। क्योंकि ब्रह्मा कई बार अपने धर्म का प्रचार करने भारत आ चुके थे। उन्हें यहां के मूल निवासियों ने ठहरने नहीं दिया। जो मत्स्य अवतार की कथा है। आर्य मछली के व्यापारी बन कर आये थे और मछुआरों के वेष में द्रविड़ राजा ह्यग्रीव की हत्या कर दी और यहीं से फिर प्रारम्भ होती है, आर्यों की राजवंश विस्तार की कहानी। इसी को इक्ष्वाकु नर पतियों की कहानी कहा जाता है।
ब्रह्मा के पुत्रा मरीचि और मरीचि से कश्यप हुए। कैसपियन सागर इसी के नाम से हुआ। कश्यप की पत्नी अदिति से विवस्वान का जन्म हुआ जिसे सूर्य कहते हैैं। इसीलिए इसे सूर्यवंश कहा गया। इक्ष्वाकुवंश को सूर्य कुल कहा जाता है। सूर्य की पत्नी संज्ञा से मनु का जन्म हुआ। उसकी पत्नी श्रद्धा से दस पुत्रा हुए। उनके नाम हैंᄉ इक्ष्वाकु, नृग, शयार्ति, दिप्ट, धुप्ट, करुप नरिप्यंत, पृपध और कवि। सूर्य को ही वैवस्वत मनु कहते हैं इसीलिए आर्य या सनातन धर्म में सूर्य को जल देते हैं।
मनु पहले संतानहीन थे। वशिष्ठ ने संतान प्राप्ति के लिए मित्रा वरुण से यज्ञ कराया। उसकी पत्नी ने पुत्राी प्राप्त होने की कामना की। मित्रा वरुण के वीर्य से श्रद्धा ने इला नाम की कन्या को जन्म दिया। यही बाद में आयोर्ं का दूसरा वंश इला कुल बना। सूर्य और चंद्र वंश आर्यों के दो मुख्य कुल थे। पुत्राी की संतानों को चंद्र वंश कहा गया।
मनु ने ब्राह्मणों से पुत्रा की कामना की। वशिष्ठ ने कहा मैं तुम्हें पुत्रा दूंगा। और उस इला नाम की कन्या को पुरुष बना दिया। उसका नामकरण सुधुम्न रखा।
एक बार सुधुम्न, सिंध देश में शिकार खेलने गया। एक हिरन का पीछा करते करते उत्तर दिशा में चला गया। वह मेरु पर्वत की तराई में पहुंच गया। वहां पर शंकर पार्वती के साथ विहार कर रहे थे। उस वन में घुसते ही सुधुम्न स्त्राी हो गया, उसका रूप घोड़ा घोड़ी हो गयी।
पुराणों में ऐसा होने का कारण इस प्रकार है
एक बार एक व्रतधारी ऋषि, शंकर के दर्शन करने के लिए इस घने वन में गये। उस समय पार्वती नग्न थीं। शंकर उन्हें गोद में उठाये थे। ऋषियों को देख लज्जित हो, शंकर की गोद से हट कर कपड़े पहन लिये। ऋषियों ने शंकर पार्वती को भोग विलास में मस्त देखा तो नर नारायण के आश्रम चले गये। इसी को आज कल बद्रीनाथ धाम कहते हैं, जो चमोली जिले में है।
पार्वती दुःखी हो गयीं। शंकर ने पार्वती को खुश करते हुए कहा कि अब जो भी पुरुष इस वन में प्रवेश करेगा, वह स्त्राी हो जायेगा। असलियत यह थी कि वह इला, नाम की स्त्राी थी। केवल पुरुषों के वेश में रहती थी।
उसकी सेना में भी स्त्रिायां थीं। वह स्त्रिायों के साथ वन में विचरने लगी। उसी वन में बुध का आश्रम था। वह उस आश्रम में गयी। बुध से पुरुरवा नाम का पुत्रा उत्पन्न हुआ।
बाद में वशिष्ठ ने पुनः उसे सद्युम्न बना दिया। उसके तीन पुत्रा हुए। उत्कल, गय और विमल। जो दक्षिणापथ अर्थात्‌ दक्षिणी भारत के राजा हुए। सुद्युम्न बूढ़ा हो गया। अपने पुत्रा पुरुरवा को राजपाट देकर जंगल में तपस्या के लिए चला गया।

पृषध्र शूद्र बना
सुद्युम्न के वन चले जाने के बाद मनु ने पुनः पुत्राों की कामना से यमुना नदी के तट पर तपस्या की। उनके दस पुत्रा पैदा हुए। इक्ष्वाकु सबसे बड़ा था। पृषध्र नाम के पुत्रा को गाय चराने का काम दिया। एक रात वर्षा हो रही थी। गायों के झुंड में एक बाघ घुस आया। उससे डर कर गायें उठ खड़ी हुईं। उसने एक गाय को पकड़ लिया। गाय चिल्लाने लगी। अंधेरा होने के कारण उसने तलवार चला दी। गाय का सिर कट गया। तलवार की नोक से बाघ का कान कट गया। सवेरे उसने देखा कि गाय मर गयी है। उसने जान बूझ कर नहीं मारी थी। लेकिन वशिष्ठ ने उसे शाप दे दियाᄉ जाओ तुम शूद्र हो जाओ। वह जंगल चला गया। काफी दिन इधर उधर भटकने के बाद आग में जल कर आत्महत्या कर ली। दूसरे पुत्रा कवि ने भी भाई के वियोग में आत्महत्या कर ली।
शेष मनु पुत्राों में करुष से कारुष क्षत्रिाय हुए। धृष्ट से धार्ष्ट क्षत्रिाय हुए। लेकिन बाद में वह ब्राह्मण हो गये। मनु के पुत्रा नृग से सुमति, सुमति से भूत ज्योति और उसका पुत्रा वसु हुआ, वसु का पुत्रा प्रतीक, प्रतीक का पुत्रा ओधवान्‌। ओधवान्‌ की पुत्राी ओधवती हुई, जिसका विवाह सुदर्शन से हुआ।
मनु पुत्रा नरिष्यंत से चित्रासेन, उससे ऋक्ष, ऋक्ष से मीढ़वान, मीढ़वान से कूर्च, और कूर्च से इंद्रसेन। इंद्रसेन से वीतिहोत्रा, वीतिहोत्रा से सत्यश्रवा, सत्यश्रवा से ऊरुश्रवा, ऊरुश्रवा से देवदंत हुआ। देवदंत से अग्निवेश वही आगे चल कर कानीन या जग्तूकर्ण्य नाम से विख्यात हुआ। इसी से ब्राह्मणों का अग्निवेश न्यायन गोत्रा चला।
मनु पुत्रा दिष्ट से नाभाग, नाभाग ही से आगे चल कर वैश्य वंश चला। उसका पुत्रा भलंदन और उसका वत्सप्रीति, उसका प्राशु, प्राशु का प्रमति, प्रमति के खनित्रा, खनित्रा का चाक्षुब, उसका विविशंति, विविशंति का रम्भ, रम्भ का खनिनेत्रा, खनिनेत्रा का करंधम, करंधम का अवीक्षित हुआ अवीक्षित का मरुंत, उससे अंगिरा, अंगिरा से सवंत हुआ।
मनु पुत्रा मऊंत से दम। दम से राज्यवर्धन, उससे सुधृति, सुधृति से नर, नर से केवल, केवल के बंधुमान, उससें वेगवान, वेगवान से बंधु, बंधु से तृणा, तृणा से बिन्दु ने अलम्बुषा अप्सरा से विवाह किया। उससे कई पुत्रा और इडबिडा नाम की एक पुत्राी उत्पन्न हुई। रावण के परदादा पुलस्त का पुत्रा विश्रवा जो रावण के पिता थे, उसने इडबिडा से विवाह किया। उससे लोकपाल कुबेर का जन्म हुआ।
तृण बिन्दु से विशाल, शून्य बंधु और धूम्रकेतु तीन पुत्रा हुए। विशाल से वंशधर जिसने वैशाली नाम की नगरी बसायी, जो बिहार के मुजफ्फरनगर से 18 किमी. की दूरी पर है। बौद्धकालीन समय में बज्जीगण राज्य समुप्रसिद्ध गण था। वैशाली की नगरवधू आम्रपाली इस नगर की थी।
मनु का शर्याति वंश
मनु का एक पुत्रा शर्याति था। उसकी सुकन्या नाम की पुत्राी थी। एक दिन वह अपनी कन्या के साथ च्यवन ऋषि के आश्रम जा पहुंचा। सुकन्या ने दीमक की बांबी देखी। उसने कांटों से उनकी आंखों को बेध दिया। खून बह चला। उसी समय शर्याति के सैनिकों का मल मूत्रा बंद हो गया। शर्याति ने समझ लिया कि च्यवन ऋषि को तंग करने के कारण ऐसा हुआ है। उसने उनके क्रोध को शांत करने के लिए सुकन्या उन्हें सौंप दी।
वह र्ऋषि बिल्कुल वृद्ध थे। उनके आश्रम में अश्विनीकुमार नामक वैद्य आये। उसने उनसे नवजवान होने की दवा मांगी। उसने शक्ति देने वाली औषिधियां दीं। बूढ़े च्यवन सम्भोग के योग्य हो गये।
कुछ दिन बाद उनके पिता वहां आये और शक्ति का रहस्य पूछा। च्यवन ने बताया कि अश्विनीकुमार ने इन्हें सोमपान करने के लिए कहा है। सोमपान से ही स्त्राी के योग्य हो गये हैं। सोम एक प्रकार के नशीले अलकोहल का नाम था।
आर्य लोग सोमयज्ञ करते थे। सोमयज्ञ का अधिकार केवल इंद्र को था। लेकिन महर्षि च्यवन ने शर्याति से सोमयज्ञ का अनुष्ठान कराया। इंद्र को पता चला तो शर्याति को मारने के लिए बज्र उठा लिया। शर्याति ने उसका हाथ पकड़ लिया और सभी देवताओं को बुला कर वैद्य अश्विनी कुमारों को सोम (शराब) का भाग देना स्वीकार करा लिया। क्योंकि पहले वैद्य होने के कारण सोमपान से बहिष्कार कर रखा था।
शर्याति के तीन पुत्रा थे। उत्तान बर्हि, आनर्त और भूरिषेण। आनर्त से रेवत हुआ। उसने समुद्र के भीतर कुशस्थली नाम की एक नगरी बसायी थी। (आज कल कुशस्थली को ही जावा प्रायद्वीप कहते हैं) उसके सौ पुत्रा थे। सबसे बड़ा ककुदमी था। रेवती नामक उसकी कन्या थी। उसकी शादी के लिए ब्रह्मा के पास गये। ब्रह्मलोक में गाना बजाना हो रहा था। वह वहीं ठहर गया।
जब ब्रह्मा को नाच गाने से फुर्सत मिली तो ककुदमी ने ब्रह्मा से अपनी पुत्राी की शादी की बात बतायी तथा जिनसे विवाह करना था, उनके नाम बताये।
ब्रह्मा ने कहा कि जिनका तुम नाम बता रहे हो वे सब मर चुके हैं। उनका गोत्रा भी समाप्त हो गया है। तुम नारायण के अंशावतार बल्देव से अपनी पुत्राी का विवाह कर दो। (बल्देव जी श्रीकृष्ण के भाई, जिसे लोग बलराम या बलदाऊ के नाम से भी जानते हैं।) वह मथुरा आया और उसने बल्देव से अपनी पुत्राी का विवाह करके बदरीवन (बद्री का आश्रम चमौली) में तपस्या के लिए चला गया।

कृत्या नाम की टोना टुटका वाली स्त्राी का जन्म व मनु वंश के नभग का वंश विस्तार

मनु पुत्रा नभग से नाभाग पैदा हुआ। जब वह ब्रह्मचर्य का पालन करके लौटा, तब तक मनु की सारी सम्पत्ति बंट चुकी थी। उसके भाइयों ने कहा कि तुम्हारे हिस्से में पिता हैं। उसने यह बात नभग अपने पिता को बतायी। उसने कहा कि आंगिरस नाम के ब्राह्मण इस समय यज्ञ कर रहे हैं। पर छः दिन बाद, वे कर्म भूल जाते हैं। तुम उन्हें वैश्रदेव सम्बंधी दो सूत्रा बता दो। वे यज्ञ का बचा धन तुम्हें दे देंगे।
उसने वैसे ही किया। जब यज्ञ का धन लेने लगा तो एक काले रंग का व्यक्ति आया और उसने यज्ञ भाग लेने से उसे मना किया। कहा ये मेरा हिस्सा है। मैं रुद्र हूं। यज्ञ का बचा हुआ हिस्सा छोड़ कर वह पुनः पिता के पास आया। पिता ने कहा कि यह पहले ही तय हो चुका है कि यज्ञ का बचा हुआ भाग महादेव का है। इसलिए रुद्र उसे बटोरने आया होगा। नाभाग ने पिता की बात स्वीकार ली।
नाभाग के पुत्रा का नाम अम्बरीष था। उसका भारत के प्रायद्वीपों पर राज्य हो गया था। वह श्रीकृष्ण का भक्त था। उसने बड़े बड़े यज्ञ कराये तथा असित,वशिष्ठ और गौतम आदि आचायोर्ं को उस यज्ञ में आमंत्रिात किया करता था। असित सिद्धार्थ के समय में थे। तथागत बुद्ध उनसे शास्त्राार्थ करना चाहते थे। लेकिन वे मर चुके थे। अम्बरीष का भी ईसा पूर्व 700 ई. का काल बनता है। वही काल कृष्ण का भी है। वह धार्मिक व्यक्ति था। अध्यात्म के प्रति उसकी रुचि थी। सारा संसार नाशवान लगता था। श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र नामक व्यक्ति को उसके पास भेज कर उसके राज्य की रक्षा कराते थे। क्योंकि वह कृष्ण अधीन हो गया था।
एक बार उसने यमुना के किनारे मधुवन (मथुरा) में कार्तिक के महीने में पत्नी सहित तीन दिन तक उपवास किया। महाभिषेक विधि से कृष्ण को अपनी सभी सम्पत्ति का अभिषेक कर दिया। शेष गायें आदि ब्राह्मणों को दान कर दीं। वहीं पर क्रोधी ऋषि दुर्वासा आ गये। उसने उन्हें भोजन के लिए राजी कर लिया। लेकिन दुर्वासा यमुना में स्नान करके ब्रह्मलीन हो गये। इधर द्वादशी समाप्त होने वाली थी। उसने ब्राह्मणों से परामर्श किया कि बिना ब्राह्मणों को खिलाये मैं कैसे जल व भोजन ग्रहण कर सकता हूं क्योंकि दुर्वासा ब्रह्मलीन हो गये हैं।
ब्राह्मणों ने सलाह दी कि तुम जल या भोजन ले सकते हो, नहीं भी ले सकते हो। उसने ब्राह्मणों की सलाह मान कर पानी पी लिया। इधर दुर्वासा पूजा पाठ से निवृत्त हो, भोजन के लिए तैयार हुए थे। लेकिन उसे पता चला कि राजा ने पानी पी लिया है तो दुर्वासा को क्रोध आ गया। बिना ब्राह्मण को खिलाये, इसने पानी कैसे पी लिया। उसने अपनी जटा उखाड़ी और कृत्या नाम की स्त्राी उत्पन्न की। वह काली थी। वह तलवार लेकर राजा अम्बरीष पर टूट पड़ी। लेकिन अम्बरीष हटा नहीं। वह वहीं खड़ा रहा। इधर उसके रक्षक सुदर्शन ने कृत्या की हत्या कर दी और दुर्वासा को दौड़ा लिया। वह भागता हुआ ब्रह्मा के पास गया। ब्रह्मा ने उसकी रक्षा करने से इनकार कर दिया। वह शंकर के पास गया। शंकर ने भी उसकी रक्षा करने से इनकार कर दिया। अंत में वह विष्णु के पास गया।
विष्णु ने कहाᄉ मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूं। मुझमें तनिक भी स्वतंत्राता नहीं है। तुम अम्बरीष से क्षमा मांगो।
दुर्वासा भाग कर फिर अम्बरीष के चरणों में गिर गये। इस प्रकार इसकी जान बची।
मैंने इस प्रकरण को इसलिए लिखा कि ब्राह्मण को कितने अधिकार प्राप्त थे कि राजा के पानी पी लेने से हत्या पर उतारू हो गये।
मनु द्वारा उत्पन्न इक्ष्वाकु वंश
मनुवाद कहने के पहले मनु की वंशावली जान लेना आवश्यक है। वेदव्यास निषाद जाति के थे। उन्होंने मनु वंश की कथा का संकलन किया। मनु का अर्थ मानव से है। मानव वंश भी कहा जा सकता है। मनु एक राजा का नाम था। वेदव्यास जो खुद भी शूद्र थे, संकलन करते समय उन्होंने दैत्य अर्थात्‌ शूद्र, राजाओं को महात्मा, दानशील, तपस्वी, विद्वान, धर्मज्ञ आदि शब्दों का प्रयोग किया है। पर दबाव में आकर दानशील, तपस्वी के साथ ही जब वह आयोर्ं से लड़ते हैं तो उन्हें वह दुरात्मा भी लिखते हैं। मैं मनु वंश के समस्त राजाओं एवं उनके पुत्राों द्वारा बने वंशों, गोत्राों की विस्तृत जानकारी देना उचित समझता हूं। क्योंकि किसी इतिहास को जान लेना परम आवश्यक है।
गोत्राों का बनना और नष्ट होना यह भी जानना आवश्यक है।
अम्बरीष जिसका वर्णन पहले कर चुके हैं। उसके तीन पुत्रा थे। विरूप, केतुमान और सम्भु। विरूप से पृषदश्रव। पृषदश्रव से रथीरत हुआ।
वह संतानहीन था। उसने अंगिरा ऋषि को बुला कर उनके द्वारा कई पुत्रा उत्पन्न कराये। इस लिए रथीरथ का गोत्रा यहीं से समाप्त हो गया। और उसकी क्षत्रिाय पत्नी और ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन्न पुत्रा अंगिरस गोत्रा कहलाया, जिसका ब्राह्मण क्षत्रिाय दोनों से सम्बंध था।
अब मैं मनु के दूसरे गोत्रा इक्ष्वाकु का वर्णन करना चाहूंगा। क्योंकि इक्ष्वाकु वंश में कई प्रतापी राजा हुए हैं। इनका इतिहास भी बड़ा है।
मनु का एक पुत्रा इक्ष्वाकु था। उसके सौ पुत्रा थे। उनमें तीन बड़े थे। विकुक्ष, निमि और दंडक। उनमें पच्चीस पुत्रा आर्यावर्त के पूर्व भाग के अधिपत, पच्चीस पश्चिम भाग के तथा उपर्युक्त तीन मध्य भाग के अधिपत हुए।
एक बार इक्ष्वाकु ने अष्टका श्राद्ध के समय अपने बड़े पुत्रा को आज्ञा दी कि शीघ्र ही श्राद्ध के योग्य पवित्रा पशुओं का मांस लाओ। बहुत अच्छा, कह कर वह वन चला गया और श्राद्ध योग्य बहुत से पशुओं का शिकार किया। भूख के कारण उसमें से खरगोश भून कर खा गया। बचा हुआ मांस लाकर पिता को दिया। इक्ष्वाकु ने गुरु से प्रोक्षण करने को कहा। गुरु ने कहा यह तो दूषित एवं अयोग्य मांस है। राजा ने क्रोध में आकर उसे देश से निकाल दिया और खुद गुरु वशिष्ठ के कहने पर शरीर का परित्याग कर दिया। विकुक्षि को जब पता चला कि पिता ने आत्महत्या कर ली है, तो अपनी राजधानी लौट आया और शासन करने लगा। बड़े बड़े यज्ञ किये तथा शशाद नाम से प्र्रसिद्ध हुआ। उसका पुत्रा पुरंजय हुआ जिसे इंद्रवाह भी कहा जाता है। उसके गोत्रा को ककुत्स्थ, कहा जाता है। आज भी ककुत्स्थ गोत्रा के क्षत्रिाय हैं। उन्होंने ककुत्स्थ क्षत्रिाय महासभा बना ली है।
जब सतयुग के अंत में देवताओं का दानवों के साथ घोर युद्ध हुआᄉ देवता हार गये तब पुरंजय की सहायता ली, और उसे अपना मित्रा बनाया। कहानी इस प्रकार हैᄉ
देवताओं दानवों का घोर संग्राम हुआ। देवता हार गये। तब देवताओं ने पुरंजय से सहायता मांगी। उसने कहा कि इंद्र मेरे रथ में घोड़े या बैल की तरह जोते जायें तो मैं दैत्यों से युद्ध के लिए तैयार हूं। पहले तो इंद्र ने अस्वीकार कर दिया लेकिन विष्णु के कहने पर इंद्र बैल की तरह रथ में जुत गये। विष्णु स्वयं उसके रथ के ककुद (डील) में बैठ गये। उसने दैत्यों से युद्ध किया और दैत्यों का पुर अर्थात्‌ नगर जीत लिया। इसीलिए उसे पुरंजय, और इंद्र को वाहन बनाने से इंद्रवाह और बैल के ककुद पर बैठने से ककुत्स्थ कहलाया।
पुरंजय का पुत्रा अनेना। अनेना का पुत्रा पृथु। पृथु के विश्ववरंधि, उसके चंद्र, चंद्र के युवनाश्रव, युवनाश्रव के शावस्त जिसने शावस्तीपुरी बसायी। शावस्त के बृहदश्रव्‌ और कुवलयाश्रव्‌। कुवलयाश्रव्‌ ने उतंग ऋषि को प्रसन्न करने के लिए धुंधु नामक महापराक्रमी दैत्य राजा से युद्ध किया और छल से उसकी हत्या कर दी। इसीलिए उसको धुंधमार कहा जाने लगा। उस युद्ध में उसके कई पुत्रा मारे गये। केवल तीन पुत्रा बचे थे। दृढ़ाशव्‌, कपिलाशव्‌ तथा भद्राश्रव्‌। दृढ़ाशव से हर्यश्रवा और उसमें निकुम्भ का जन्म हुआ। यही क्षत्रिायों का निकुम्भ वंश बना। भूमिहार आदि जातियां अपने को निकुम्भ गोत्रा का क्षत्रिाय मानती हैं। निकुम्भ से बर्हषाश्रव उससे कृशाश्रव, कृशाश्रव से सेनजित, सेनजित से युवनाश्रव।
युवनाश्रव्‌ संतानहीन था। उसने सौ स्त्रिायों से विवाह किया, फिर भी संतान नहीं हुई तो ऋषियों के आश्रम में अपनी सभी पत्नियां ले गया। ऋषियों ने इंद्र को बुला कर संतान उत्पन्न करने के लिए कहा। इंद्र के द्वारा उसकी पत्नी से त्रासद्दस्यु उत्पन्न हुआ। उसका रावण से युद्ध हुआ था। उसे मंधाता भी कहते हैं।
मंधाता की पत्नी शशिबिन्दु से बिन्दुमती नाम की लड़की हुई। उससे पुरुकुत्स, अम्बरीष (द्वितीय) तथा मुचुकुंद हुए। तथा इनके पचास बहनें थीं। पचासों बहनों के साथ सौभरि ब्राह्मण ने विवाह कर लिया। कहानी इस प्रकार हैᄉ एक बार एक मल्लाह यमुना नदी के पास अपनी पत्नियों के साथ विहार कर रहा था। वहीं सौभरि ब्राह्मण जल में खड़े तपस्या कर रहे थे। निषाद को जलक्रीड़ा करते देख वह कामांध हो गया। वहां से राजा मंधाता के पास गया और मंधाता से एक कन्या का विवाह अपने साथ करने को कहा।
राजा ने कहा कि इनमें से कोई पसंद कर लें और विवाह कर लीजिए। ब्राह्मण बूढ़ा और कमजोर था। नसें दिखाई पड़ रही थीं। आंखें कमजोर, बाल सफेद हो गये थे। उसने कहा मुझे पचासों पसंद हैं। उसने पचासों उस बूढ़े ब्राह्मण सौभरि को दे दीं।
उस समय क्षत्रिायों के यहां लड़कियां मार दी जाती थीं। ब्राह्मणों को बिना ब्याहे ही दान दे दिया करते थे। पचासों लड़कियां उस बूढ़े ब्राह्मण के साथ जंगल चली गयीं। घुट घुट कर मर गयीं।
मंधाता के पुत्राों में अम्बरीष था। मंधाता के वंश तीन अवांतर गोत्राों के प्रवर्तक हुए। पुरुकुत्स का विवाह नर्मदा नाम की कन्या जो, नागवंश की थी, के साथ हुआ। वह दक्षिणी भारत का राजा था। उससे त्रासदस्यु, त्रासदस्यु से अनरण्य, अनरण्य से हर्यश्रव उसके अरुण और त्रिाबंधन हुए। त्रिाबंधन से सत्यव्रत हुआ। वही पिता व गुरु की आज्ञा न मानने पर चांडाल हो गया। यहीं से चांडाल वंश चला। उसे देवताओं ने स्वर्ग से ढकेल दिया। वह बीच में लटक गया। अर्थात्‌ न शूद्र रहा न आर्य। वह चांडाल हो गया तो शव जलाने का काम करता था। उसे ही त्रिाशंकु कहते हैं।
हरिश्चंद्रᄉ त्रिाशंकु का पुत्रा हरिश्चंद्र था। वरुण देव की कृपा से उसके रोहित नाम का पुत्रा हुआ। यह वही हरिश्चंद्र हैं जिन्हें सत्यवादी कहा जाता है। वास्तविकता यह है कि वे काशी में चांडाल के यहां बेचे नहीं गये थे। बल्कि विश्वामित्रा द्वारा छल से राजपाट छीन लिए जाने के बाद अपने रिश्तेदार काशी के कालू डोम के यहां पत्नी सहित रहने लगे थे और श्मशान घाट में मुर्दे जलाते थे।
वरुण ने पुत्रा उत्पन्न करने के पूर्व हरिश्चंद्र से उसके पुत्रा को यज्ञ में यजन करने का वादा कराया था। यजन का अर्थ बलि से है। रोहित को यज्ञ पशु मान कर जन्म के दस दिन बाद उसे यज्ञ में बलि के लिए कहा।
हरिश्चंद्र ने कहा यज्ञ पशु के जब दांत निकल आयेंगे, तब यज्ञ योग्य होगा।
जब दांत आ गये तब वरुण ने कहा अब बलि के लिए दो। हरिश्चंद्र ने कहा जब दांत गिर जायेंगे, तब यज्ञ योग्य होगा। दूध के दांत गिर गये। वरुण ने फिर वही बात दोहरायी। हरिश्चंद्र ने कहा पुनः दांत उग आने पर बलि के योग्य होगा।
दांत आने पर हरिश्चंद्र ने कहा कि क्षत्रिाय पशु तब यज्ञ के योग्य होता है जब कवच धारण करने लगे। इस तरह वरुण चांडाल वंश को नष्ट करना चाहता था।
रोहित को पता चला कि वरुण मुझे बलि दिलाना चाहता है तो वह अपने प्राणों की रक्षा में धनुष लेकर जंगल चला गया। वरुण ने नाराज होकर हरिश्चंद्र पर आक्रमण कर दिया। रोहित ने अपने पिता की सहायता के लिए वन से लौटना चाहा तो इंद्र ने रास्ते में मना कर दिया। जितनी बार रोहित घर लौटने की सोचता, इंद्र बूढ़ा ब्राह्मण बन कर उसको रोक देता।
इधर वरुण को मझले पुत्रा शुनशेय को देकर यज्ञ पुत्रा बना कर उसकी बलि दी। उस यज्ञ में विश्वामित्रा होता थे। जमदग्नि, वशिष्ठ, ब्रह्मा आदि यज्ञ में शामिल थे। उसके मझले पुत्रा की बलि से इंद्र आदि प्रसन्न थे।
इतनी निर्दयी कथाओं को सुन कर हिन्दू समाज प्रसन्न होता है। एक भी हिन्दू ऐसा नहीं है जो इनके घृणित कार्यों की निन्दा करे। इतनी कठोर यातनाएं देने के बाद हरिश्चंद्र को राज्य का अवसर दिया।
---------------------------
साभार: तद्भव पत्रिकाhttp://www.tadbhav.com/dalit_issue/arya_se_yudha_karnea.html#arya )  

1 comment:

Please write your comment in the box:
(for typing in Hindi you can use Hindi transliteration box given below to comment box)

Do you like this post ?

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails

लिखिए अपनी भाषा में

Type in Hindi (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi)

Search in Labels Crowd

22 vows in hindi (1) achhut kaun the (1) adivasi sahitya (1) ADMINISTRATION AND FINANCE OF THE EAST INDIA COMPANYby Dr B R Ambedkar (1) ambedar (1) ambedkar (34) ambedkar 119th birth anniversary (2) ambedkar 22 vows (1) ambedkar and gandhi conversation (1) ambedkar and hinduism (1) ambedkar anniversary (2) ambedkar birth anniversary (2) ambedkar books (18) ambedkar chair (1) ambedkar death anniversary (1) Ambedkar in News (1) ambedkar inspiration (1) ambedkar jayanti (3) ambedkar jayanti 2011 (1) ambedkar life (3) ambedkar literature (11) ambedkar movie (3) ambedkar photographs (2) ambedkar pics (3) ambedkar sahitya (10) ambedkar statue (1) ambedkar vs gandhi (2) ambedkar writings (1) ambedkar's book on buddhism (2) ambedkarism (8) ambedkarism books (1) ambedkarism video (1) ambedkarite dalits (2) anand shrikrishna (1) arising light (1) arya vs anarya true history (1) beginners yoga (1) books about ambedkar (1) books from ambedkar.org (10) brahmnism (1) buddha (32) buddha and his dhamma (14) buddha and his dhamma in hindi (2) buddha jayanti (1) buddha or karl marx (1) buddha purnima (1) Buddha vs avatar (1) Buddha vs incarnation (1) buddha's first teaching day (1) Buddham Sharanam Gacchami (1) Buddham Sharanam Gachchhami (1) buddhanet books (6) buddhism (43) buddhism books (18) buddhism conversion (1) buddhism for children (1) buddhism fundamentals (1) buddhism in india (4) buddhism meditation (1) buddhism movies (1) buddhism video (7) buddhist marriage (1) caste annhilation (1) castes in india (1) castism in india (1) chamcha yug (1) Chatrapati Shahu Bhonsle (1) chinese buddhism (1) dalit (2) dalit and buddhism (1) dalit andolan (1) dalit antarvirodh (1) dalit books (1) dalit great persons (1) dalit history (1) dalit issues (2) dalit leaders (1) dalit literature (1) dalit masiha (1) dalit movement (2) dalit movement in Jammu (1) dalit perspectives on Religion (1) dalit politics (1) dalit reformation (1) dalit revolution (1) dalit sahitya (2) dalit thinkers (1) dalits (2) dalits glorious history (1) dalits in India (1) dhamma (16) dhamma Deeksha (2) digital library of India (1) docs (1) Dr Babasaheb - untold truth (1) Dr Babasaheb movie (2) federation vs freedom (1) four sublime states (1) freedom for dalits (1) gandhi vs ambedkar (1) google docs (1) guru purnima (1) hindi posts (8) hindu riddles (1) hinduism (1) in hindi (1) inter-community relations (1) Jabbar Patel movie on Ambedkar (1) jati varna system (1) just be good (1) kanshiram (1) literature (4) lodr buddha tv (1) lord buddha (1) meditation (9) meditation books (1) meditation video (6) mindfilness (1) navayan (1) Nyanaponika (1) omprakash valmiki (1) online books about ambedkar (1) pali tripitik (2) parinirvana (1) pics (3) Poona Pact (1) poona pact agreement (1) prakash ambedkar (1) Prof Tulsi Ram (1) quintessence of buddhism (1) ranade gandhi and jinnah (2) sahitya (1) sampradayikta (1) savita ambedkar (1) Sayaji Rao Gaekwar (1) secret buddhism (1) secularism (1) self-realization (1) Suttasaar (1) swastika (1) teesri azadi movie (1) tipitaka (1) torrent (1) tribute to ambedkar (1) Tripitik (2) untouchables (2) vaisakh purnima (1) video (7) video about ambedkar (1) Vipassana (5) vipassana books (1) vipassana video (3) vipasyana (3) vivek kumar interview (1) well-being (1) what buddha said (13) why buddhism (1) Writings and Speeches (1) Writings and Speeches by Dr B R Ambedkar (11) yoga (5) yoga books (1) yoga DVD (2) yoga meditation (2) yoga video (4) yoga-meditation (9) अम्बेडकर जीवन (1) बुद्ध और उसका धम्म (2) स्वास्तिक (1) हिंदी पोस्ट (24)

Visitors' Map


Visitor Map
Create your own visitor map!

web page counter