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Tuesday 5 March 2013

भगवान बुद्ध और उनका धर्म ( Hindi Translation of "The Buddha and His Dhamma")

Bhagwan Buddha aur Unka Dharma

Hindi Translation of "The Buddha and His Dhamma" by Dr B R Ambedkar Translator: Bhadant Anand Kaushalyayan The Buddha and His Dhamma, a treatise on Lord Buddha's life and Buddhism, was the last work of Indian statesman and scholar Dr B R Ambedkar. The book is treated as a holy text by Indian Buddhists. It was first published in 1957 after Ambedkar's death. It was again Published in 1979 by the Education Department of the Government of Maharashtra as the eleventh volume of Ambedkar's collected writings and speeches, with a list of sources and an index.


भगवान बुद्ध और उनका धर्म



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Sunday 14 October 2012

14 अक्तूबर: दीक्षा दिवस पर विशेष - एस आर दारापुरी

आज दीक्षा दिवस है। इस दिन डॉ आंबेडकर ने 5 लाख अनुयायियों के साथ नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी और धम्म चक्र को पुनः प्रचालित किया था। यह महान अशोक के बाद दुनिया में पहली ऐतिहासिक घटना थी जब किसी एक व्यक्ति के आह्वान पर इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने धर्म परिवर्तन किया हो।
वास्तव में यह धर्म परिवर्तन नहीं था क्योंकि यह तो अछूतों की बौद्ध धम्म में वापसी थी। डॉ आंबेडकर ने अपनी खोज पूर्ण पुस्तक " अछूत कौन और कैसे" में तथ्यों सहित यह सिद्ध किया है कि अछूतों के पूर्वज बौद्ध धम्म के अनुयायी थे और बाद में उन्हें बौद्ध धम्म और गोमाँस भक्षण न छोड़ने के अछूत बना कर दण्डित किया गया था। डॉ आंबेडकर द्वारा धम्म परिवर्तन से पहले और बाद में भी हिन्दुओं और कुछ दलित नेताओं द्वारा इस का यह कह कर विरोध किया गया था कि इस से दलितों का कोई भला होने वाला नहीं है। इस सम्बन्ध में बी एस पी के नेता कांशी राम की भी यही धारणा थी। बाबा साहेब के धम्म परिवर्तन आन्दोलन के फलस्वरूप 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में बौद्धों (नव बौद्धों ) की आबादी लगभग 80 लाख थी जो भारत की कुल आबादी का 0.8 प्रतिशत थी। अब 2011 की जनगणना में इसके काफी बढ जाने की उम्मीद है। जो लोग बाबा साहेब के बौद्ध धम्म में दलितों की वापसी आन्दोलन का विरोध करते थे उस के उतर में निम्नलिखित लेख से स्पष्ट है कि जिन दलितों ने बौद्ध धम्म अपनाया है उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा बहुत तरक्की की है जो कि बाबा साहेब के आन्दोलन की सार्थकता को सिद्ध करता है


नव बौद्ध हिन्दू दलितों से बहुत आगे
डॉ.  एस आर दारापुरी

डॉ. बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर ने ३१ मई , १९३६ को दादर (बम्बई ) में "धर्म परिवर्तन क्यों? " विषय पर बोलते हुए अपने विस्तृत भाषण में कहा था , " मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहता हूँ कि मनुष्य धर्म के लिए नहीं बल्कि धर्म मनुष्य के लिए है. अगर मनुष्यता की प्राप्ति करनी है तो धर्म परिवर्तन करो. समानता और सम्मान चाहिए तो धर्म परिवर्तन करो. स्वतंत्रता से जीविका उपार्जन करना चाहते हो धर्म परिवर्तन करो . अपने परिवार और कौम को सुखी बनाना चाहते हो तो धर्म परिवर्तन करो." इसी तरह १४ अक्टूबर, १९५६ को धर्म परिवर्तन करने के बाद बाबा साहेब ने कहा था, " आज मेरा नया जन्म हुआ है."

आईए अब देखा जाये कि बाबा साहेब ने धर्म परिवर्तन के जिन उद्देश्यों और संभावनाओं का ज़िकर किया था, उन की पूर्ती किस हद तक हुयी है और हो रही है. सब से पहले यह देखना उचित होगा कि बौद्ध धर्म परिवर्तन कि गति कैसी है. सन २००१ की जन गणना के अनुसार भारत में बौद्धों की जनसँख्या लगभग ८० लाख है जो कि कुल जन संख्या का लगभग ०.८ प्रतिशत है. इस में परम्परागत बौद्धों की जन संख्या बहुत ही कम है और यह हिन्दू दलितों में से धर्म परिवर्तन करके बने नव बौद्ध ही हैं. इस में सब से अधिक बौद्ध महाराष्ट्र में ५८.३८ लाख, कर्नाटक में ४.०० लाख और उत्तर प्रदेश में ३.०२ लाख हैं. सन १९९१ से सन २००१ की अवधि में बौद्धों की जनसँख्या में २४.५४% की वृद्धि हुयी है. जो कि बाकी सभी धर्मों में हुयी वृद्धि से अधिक है. इस से स्पष्ट है कि बौद्धों की जन संख्या में भारी मात्रा में वृद्धि हुयी है.

अब अगर नव बौद्धों में आये गुणात्मक परिवर्तन की तुलना हिदू दलितों से की जाये तो यह सिद्ध होता है कि नवबौद्ध हिन्दू दलितों से बहुत क्षेत्रों में बहुत आगे बढ़ गए हैं जिस से बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन के उद्धेश्यों की पूर्ती होने की पुष्टि होती है. अगर सन २००१ की जन गणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर नव बौद्धों की तुलना हिन्दू दलितों से की जाये तो नव बौद्ध निम्नलिखित क्षेत्रो में हिन्दू दलितों से बहुत आगे पाए जाते हैं:-

१. लिंग अनुपात :- नव बौद्धों में स्त्रियों और पुरुषों का अनुपात ९५३ प्रति हज़ार है जबकि हिन्दू दलितों में यह अनुपात केवल ९३६ ही है. इस से यह सिद्ध होता है कि नव बौद्धों में महिलायों की स्थिति हिन्दू दलितों से बहुत अच्छी है. नव बौद्धों में महिलायों का उच्च अनुपात बौद्ध धर्म में महिलायों के समानता के दर्जे के अनुसार ही है जबकि हिन्दू दलितों में महिलायों का अनुपात हिन्दू धर्म में महिलायों के निम्न दर्जे के अनुसार है. नव बौद्धों में महिलायों का यह अनुपात हिन्दुओं के ९३१, मुसलमानों के ९३६, सिक्खों के ८९३ और जैनियों के ९४० से भी अधिक है.

२. बच्चों (०-६ वर्ष तक ) का लिंग अनुपात:- उपरोक्त जन गणना के अनुसार नव बौद्धों में ०-६ वर्ष तक के बच्चों का लड़कियों और लड़कों का लिंग अनुपात ९४२ है जब कि हिन्दू दलितों में यह अनुपात ९३५ है. यहाँ भी लड़के और लड़कियों का लिंग अनुपात धर्म में उन के स्थान के अनुसार ही है. नव बौद्धों में यह अनुपात हिन्दुओं के ९३१, मुसलामानों के ९३६, सिक्खों के ८९३ और जैनियों के ९४० से भी ऊँचा है.

३. शिक्षा दर :- नव बौद्धों में शिक्षा दर ७२.७ % है जबकि हिन्दू दलितों में यह दर सिर्फ ५४.७ % है. नव बौद्धों का शिक्षा दर हिन्दुओं के ६५.१ % , मुसलमानों के ५९.१ % और सिक्खों के ६९.७ % से भी अधिक है. इस से स्पष्ट तौर से यह सिद्ध होता है कि बौद्ध धर्म में ज्ञान और शिक्षा को अधिक महत्त्व देने के कारण ही नव बौद्धों ने शिक्षा के क्षेत्र में काफी तरक्की की है जो कि हिन्दू दलितों कि अपेक्षा बहुत अधिक है.

४. महिलायों का शिक्षा दर:- नव बौद्धों में महिलायों का शिक्षा दर ६१.७ % है जब कि हिन्दू दलितों में यह दर केवल ५४.७ % ही है. नव बौद्धों में महिलायों का शिक्षा दर हिन्दू महिलायों के ५२.३ %, और मुसलमानों के ५०.१ % से भी अधिक है. इस से यह सिद्ध होता है कि नव बौद्धों में महिलायों की शिक्षा कि ओर अधिक ध्यान दिया जाता है.

५. कार्य सहभागिता दर:- नव बौद्धों में कार्य सहभागिता दर ४०.६ % है जब कि हिन्दू दलितों में यह दर ४०.४ % है. नव बौद्धों का कार्य सहभागिता दर हिन्दुओं के ४०.४, मुसलमानों के ३१.३, ईसाईयों के ३९.७, सिखों के ३७.७ और जैनियों के ३२.७ % से भी अधिक है. इस से यह सिद्ध होता है कि नव बौद्ध बाकी सभी वर्गों के मुकाबले में नियमित नौकरी करने वालों की श्रेणी में सब से आगे हैं जो कि उनकी उच्च शिक्षा दर के कारण ही संभव हो सका है. इस कारण वे हिन्दू दलितों से आर्थिक तौर पर भी अधिक संपन्न हैं.

उपरोक्त तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट है कि नव बौद्धों में लिंग अनुपात, शिक्षा दर, महिलायों का शिक्षा दर और कार्य सहभागिता की दर न केवल हिन्दू दलितों बल्कि हिन्दुओं, मुसलमानों, सिक्खों और जैनियों से भी आगे है. इस का मुख्य कारण उन का धर्म परिवर्तन करके मानसिक गुलामी से मुक्त हो कर प्रगतिशील होना ही है.
इस के अतिरिक्त अलग अलग शोध कर्ताओं द्वारा किये गए अध्ययनों में यह पाया आया है कि दलितों के जिन जिन परिवारों और उप जातियों ने डॉ. आंबेडकर और बौद्ध धर्म को अपनाया है उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा अधिक तरक्की की है. उन्होंने ने पुराने गंदे पेशे छोड़ कर नए साफ सुथरे पेशे अपनाये हैं. उन में पढाई की ओर अधिक झुकाव पैदा हुआ है. वे भाग्यवाद से मुक्त हो कर अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं. वे जातिगत हीन भावना से मुक्त हो कर अधिक स्वाभिमानी हो गए हैं. वे धर्म के नाम पर होने वाले आर्थिक शोषण से भी मुक्त हुए हैं और उन्होंने अपनी आर्थिक हालत सुधारी है. उनकी महिलायों और बच्चों की हालत हिन्दू दलितों से बहुत अच्छी है.

उपरोक्त संक्षिप्त विवेचन से यह सिद्ध होता है कि बौद्ध धर्म ही वास्तव में दलितों के कल्याण और मुक्ति का मार्ग है . नव बौद्धों ने थोड़े से समय में हिन्दू दलितों के मुकाबले में बहु तरक्की की है, उन की नव बौद्धों के रूप में एक नयी पहिचान बनी है. वे पहिले की अपेक्षा अधिक स्वाभिमानी और प्रगतिशील बने है. उन का दुनिया और धर्म के बारे नजरिया अधिक तार्किक और विज्ञानवादी बना है. नव बौद्धों में धर्म परिवर्तन के माध्यम से आये परिवर्तन और उन द्वारा की गयी प्रगति से हिन्दू दलितों को प्रेरणा लेनी चाहिए. उन को हिन्दू धर्म की मानसिक गुलामी से मुक्त हो कर नव बौद्धों की तरह आगे बढ़ना चाहिए. वे एक नयी पहिचान प्राप्त कर जातपात के नरक से बाहर निकल कर समानता और स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं. इस के साथ ही नव बौद्धों को भी अच्छे बौद्ध बन कर हिन्दू दलितों के सामने अच्छी उदाहरण पेश करनी चाहिए ताकि बाबा साहेब का भारत को बौद्धमय बनाने का सपना जल्दी से जल्दी साकार हो सके.

साभारः
एस आर दारापुरी
https://www.facebook.com/srdarapuri/posts/10151293277366554

Friday 24 August 2012

Lit-Again Paths

Ambedkar’s Buddhism is a radical, rational reading of the traditional for our times
                                                                                                                    -CHRISTOPHER QUEEN
Ambedkar at his Dhamma Deeksha, 1956


Young Bhim Ambedkar met the Buddha for the first time at a party in Bombay. As the only untouchable student at Elphinstone High School, Ambedkar caused a stir when he passed his matriculation exam in 1907. A graduation party was organised by Krishna Arjun ‘Dada’ Keluskar, author, activist and principal of nearby Wilson High School. Keluskar had seen Ambedkar reading alone in the Churni Road Garden and finally asked him who he was. The boy, born of Mahar parents in an army camp, explained that upper-caste students at Elphinstone bullied him and that he retreated to the park with a book. The teacher recognised the boy’s promise and began helping him with his studies.
CHRISTOPHER QUEEN
At the party, Keluskar gave him a copy of his Life of the Buddha, written in Marathi for the Baroda Sayajirao Oriental Series. Sayajirao provided Ambedkar financial aid, employment and finally full support to attend Columbia University, where Ambedkar earned his first doctorate and discovered that a society could be organised around the notions of liberty, equality and fraternity.
More than the influence of early mentors and institutions, it was the life and teachings of the Buddha, first presented in Keluskar’s slim volume, that made the most impact. After the party, he recalled years later, “I...was greatly impressed and moved by it.” In the following decades, as he launched the untouchable civil rights movement, represented his community in the negotiations with the British and the Congress, served as the first law minister and principal draftsman of the Constitution, Ambedkar never forgot the vision of personal striving and social transformation he first encountered in the person of the Buddha.
Who was the Buddha that impressed Ambedkar so much? Ambedkar reflected deeply on this, and declared in 1950 that Buddhism was the only religion that could meet the requirements of the modern world—wisdom, compassion, and social justice. And we know that in the last, illness-ridden five years of his life, he devoted his remaining energy to the study of Buddhism.
The fruit of Ambedkar’s final labours is The Buddha and His Dhamma, a daring interpretation of traditional teachings. Venerated by ex-untouchables and millions practising ‘Navayana’ Buddhism, it tells the story of the earthly Buddha and summarises his teachings. This manifesto brings out the social teachings that Ambedkar believed were suppressed by misunderstanding and distortion. Gautama’s welcoming all to his new religious community is there. But so is Ambedkar’s critique of four famous items in the traditional presentation of Buddhism.
Ambedkar doubted that a 29-year-old prince would have abandoned his duties after seeing a sick person, an old person, a corpse and a sadhu. The Four Noble Truths “are a great stumbling block”, attributing all human suffering to desire and craving. Are the poor to be blamed for craving food? Traditional notions of karma and rebirth clearly pose a contradiction of the core teaching of no-self (anatta) and another justification for the caste system, in which low-birth results from bad behaviour in a past life—again blaming victims of social exploitation. Finally, should not the clergy serve society, or should they only study and meditate? These questions “must be decided not so much in the interest of doctrinal consistency but in the interest of the future of Buddhism”.
Ambedkar’s Buddha is based on meticulous study of the Pali record as well as scores of modern commentaries he collected. And this Buddha is a path-giver (marga-data), not a rescuer (moksha-data); he is all-compassionate (maha-karunika); and he is opposed to superstition and speculation. He is awakened by definition—rational, practical, and rooted in present realities. But he is also engaged—committed to social change and justice, and, if necessary, non-violent social revolution. This is the Buddha that has inspired a new generation of socially engaged Buddhists across the world.
Was this the Buddha young Bhim met at his graduation party? Or has the Buddha of old found new voices in a dangerous new world?

(Christopher Queen teaches Buddhism and Social Change and World Religions at Harvard University.)


Source:
http://www.outlookindia.com/article.aspx?281946

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