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Tuesday, 15 June 2010

जातिवाद का विरोध नया नहीं है - चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु


जातिवाद का विरोध नया नहीं है
चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु

जाति तोड़ो : यह दलित समाज में बेहद लोकप्रिय पुस्तिका है जो सन्‌ 1964 में अखिल भारतीय जाति तोड़ो महासम्मेलन में दिये गये भाषण का संकलन है। इसमें श्री स्वामी देवानंद सरस्वती, महराज सिंह भारती, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, संत राम, बी.ए., सुश्री हबीबा जानू तहसीन, राजपुताना के व्याख्यान संग्रहीत हैं। जिज्ञासु जी ने पुस्तिका के प्रकाशन की परम्परा को आगे बढ़ाया, उनका मानना था कि वह समाज मरा हुआ है जिसका अपना साहित्य नहीं है, साहित्य ही समाज को जिन्दा रखता है, इस नाते उन्होंने अनुवाद करके भाषणों का संकलन प्रकाशित कर लोगों तक पहुंचाया, इस पुस्तिका का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है। जातिवाद संस्कारों के आधार पर चल रहा है, यह किसी तर्क पर टिका नहीं है, बिना इसे तोड़े विकास सम्भव नहीं है। उनकी कई पुस्तिकाएं अभी भी मूल रूप में छप रही हैं। यह पुस्तिका समाज सेवा प्रेस सआदतगंज, लखनऊ द्वारा सन्‌ 1965 में प्रकाशित हुई। इनकी अन्य पुस्तकें हैंᄉ रावण और उसकी लंका, भारत के आदि निवासियों की सभ्यता, संत रैदास का जीवन दर्शन। 

श्री सभापति महोदय, बहनो और भाइयो!
यह कहना कदापि ठीक नहीं है कि आज जो लोग ÷जाति तोड़ो' का नारा लगाते हैं, वे आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा से प्रभावित विकृत मस्तिष्क हैं, वे हजारों वषोर्ं से चली आयी भारत की पवित्रा सनातन संस्कृति को भंग करना चाहते हैं। प्राचीन संस्कृत और पाली साहित्य जो कि विशुद्ध भारतीय है, हमें बताता है कि जातिवाद का विरोध केवल आज के युग की बात नहीं है, यह संघर्ष बहुत पुराना है।
वर्णों और जातियों की शास्त्राीय उत्पत्ति
जातिवाद की उत्पत्ति कब और कैसे हुुई, यह प्रश्न यद्यपि विवादी है फिर भी खोजी और विचारक विद्वानों ने इस पर बहुत कुछ लिखा है। ऋग्वेद भाष्यकार सर रमेशचंद्र दत्त, महापंडित राहुल सांकृत्यायन एवं कई विदेशी मनीषियों ने, जिन्होंने भारतीय साहित्य का मंथन किया है, इस पर जो प्रकाश डाला है, वह काफी मनोरंजक, ज्ञानप्रद, और बुद्धिग्राही है। जातिवाद की बुनियाद वेदों में मिलती है। बेदों का प्रसिद्ध ÷पुरुष सूक्त' जातिवाद की जड़ है। यह सूक्त चारों वेदों में पाया जाता है। यजुर्वेद में 22, ऋग्वेद में 16, सामवेद में 7 और अथर्ववेद में 16 मंत्रा थोड़े उलटफेर के साथ हैं। विद्वानों का मत है कि पुरुष सूक्त उस समय वेदों में जोड़ा गया जब विजेता आर्य लोग समाज को चार रंगों में विभाजित कर समाज व्यवस्था बना रहे थे। इसे महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ÷जाली' मंत्रा की संज्ञा दी है। मंत्रा यह हैᄉ
ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहुः राजन्यः कृतः।
उरू तदस्य यद्वैश्यः पदभ्यां शूद्रो अजायत्‌॥
अर्थात्‌ उस पुरुष के मुख से ब्राह्मण, बाहों से क्षत्रिाय, उरु या जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र पैदा हुए।
मंत्रा में ÷अजायत्‌' क्रिया है, जिसका अर्थ ÷पैदा होना' होता है। आजकल कुछ लोग इस अर्थ में गड़बड़ी करने लगे हैं। पर उन्हें ध्यान नहीं रहता कि इसके आगे ही बारहवें मंत्रा में कहा गया है कि उस पुरुष के मन से चंद्रमा, आंखों से सूर्य, कानों से वायु तथा प्राण और मुंह से अग्नि उत्पन्न हुई। यथाᄉ
चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूयोर्ं अजायत्‌ ।
श्रोत्रााद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत्‌॥
सारे सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति का ही वर्णन है। और स्मृतियों में, जिसका काम वेदों के ज्ञान को व्यावहारिक रूप देना है, इसकी पुष्टि की गयी है। मनुस्मृति में साफ कहा गया हैᄉ
लोकानां तु विवृद्ध्यथर्यं मुखबाहूरूपादतः ।
ब्राह्मणं क्षत्रिायं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत्‌॥
अर्थात्‌ सृष्टि की अभिवृद्धि के लिए (ब्रह्मा ने स्वयं) अपने मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिाय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्रों को उत्पन्न किया (निरवर्तयत)। इस तरह पहले तो चार वर्ण पैदा हुए, फिर इन चारों वणोर्ं के परस्पर के व्यभिचार से अनुलोम प्रतिलोम क्रम से नाना जातियां बन गयीं और जीविका निर्वाह के लिए उन्हें यथायोग्य पेशे भी बांट दिये गये।
चारों वर्णों के व्यभिचार से जो संतान उत्पन्न हुई, उसमें उ+ंच नीच की भावना व्यभिचार भेद के अनुसार है। उ+ंचे वणोर्ं के पुरुष और नीचे वर्ण की स्त्राी में ÷अनुलोम वर्णसंकर' होता है और नीचे वर्ण के पुरुष से उ+ंचे वर्ण की स्त्राी में ÷प्रतिलोम वर्णसंकर' तथा वर्णसंकरों के परस्पर व्यभिचार से घोर संकर उत्पन्न होता है। वर्णसंकरों का दर्जा शूद्र के बराबर तथा शूद्र से ज्यादा अति शूद्र और अस्पृश्य महाशूद्र होता है। यथाᄉ
शूद्राधिकास्तुल्या व विलोमा अनुलोमिनौ।
शास्त्राों के अनुसार ब्राह्मण क्षत्रिाय वैश्य तीनों वर्ण ÷द्विजाति' हैं। इनके सिवा बाकी कृषक, शिल्पकार और सेवा तथा श्रम करने वाले लोग सब ÷एकजाति' शूद्र हैं। पाचवां कोई नहीं। यथाᄉ
ब्राह्मणः क्षत्रिायो वैश्यस्त्रायो वर्णः द्विजातयः।
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पंचमः॥
और व्यास जी तो साफ कहते हैंᄉ
ब्राह्मण क्षत्रिाय विशस्त्रायो वर्णः द्विजातयः।
श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त धर्म योग्यास्तु नेतरे॥
अर्थात्‌ ब्राह्मण, क्षत्रिाय और वैश्यᄉ ये तीन वर्ण द्विजाति हैं। वेद, शास्त्रा और पुराणों में कहे हुए धर्म के ये ही तीनों अधिकारी हैं। इनके सिवा अन्य कोई अधिकारी नहीं।
शास्त्राों की व्यवस्था के अनुसार पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, कराना, दान लेना और देना ब्राह्मणों के कर्म हैं। प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना और पढ़ना, क्षत्रिायों के कर्म हैं। पशुओं की रक्षा, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना, व्यापार करना, ब्याज लेना और खेती कराना वैश्यों के कर्म हैं। शूद्रों को प्रभु ने एक ही कर्म का आदेश किया है कि वे लोग तीनों वर्णों की असूया रहित भाव से अर्थात्‌ बिना चूं चरा किये सेवा करते रहें। यथाᄉ
एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्मसमादिशत्‌।
एतेषामेव वर्णानां शुश्र्‌षामनसूयया॥
वेद शास्त्रा पुराण के अनुसार चारों वणोर्ं और नाना जातियों की उत्पत्ति एवं उनके कमोर्ं की यही व्यवस्था है। किन्तु यह जन्मवादी व्यवस्था, जिसमें भोग और श्रम का बटवारा जन्ममूलक है और जिसमें परिश्रम करने वाले श्रमिकों को नीच तथा आराम से काम करने वालों को उ+ंचा कहा गया है, बहुजन समाज को कभी मान्य नहीं हुई। यह जन्मवादी व्यवस्था समाज पर सदा बलपूर्वक, तलवार की जोर से लादी गयी और बहुजन समाज हमेशा इसका विरोध करता रहा।
ब्राह्मण सर्वोपरि कैसे हुए ?
वैदिक आयोर्ं में शायद पहले जातिभेद नहीं था। सब आपस में विवाह और सहभोज करते थे। एक साथ चलते, एकसा बोलते और जो कुछ अर्जित करते, उसे आपस में ÷यथाभाग' बांट लिया करते थे। लेकिन प्रभुताई, आराम और भोग ये ऐसी चीजें हैं कि इनके लिए आपस में झगड़ा हो ही जाता है। अतएव ब्राह्मणों और क्षत्रिायों में भी इसी प्रभुत्व और श्रेष्ठता के लिए झगड़ा हो गया। ब्राह्मण चाहते थे, हम सर्वोपरि रहें, क्षत्रिाय चाहते थे हमारी प्रभुताई और हमारा शासन चले। इस संघर्ष में ब्राह्मणों की विजय हुई क्योंकि ब्राह्मणों के हाथ में शास्त्रा थे और क्षत्रिायों के हाथ में शस्त्रा। शास्त्रा का अर्थ है दिमाग और कलम की ताकत तथा शस्त्रा का अर्थ है तीर और तलवार की ताकत। क्षत्रिाय वीर थे, बलवान थे, हष्टपुष्ट थे, परंतु मस्तिष्कहीन थे। उनके मस्तिष्क पर ब्राह्मण सवार हो गये और जिस बल चाहा उस बल उन्हें, मदारी जैसे बंदर को नचाता है, नचाने लगे।
एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में तलवार पकड़े हुए लाहौर में लार्ड लारेंस का तेजस्वी पुतला खड़ा किया था। उस पुतले के द्वारा अंगे्रजों का भारतीयों से कहना थाᄉ ''ऐ भारत के रहने वालो! तुम हमारी कलम की ताकत से हमारे आज्ञानुवर्ती रहोगे या तलवार की ताकत से ? याद रखो, यदि हमारे मस्तिष्क और लेखनी के द्वारा बनाये कानूनों को तुम नहीं मानोगे, तो देखो हमारे दूसरे हाथ में तलवार है। इस तलवार की ताकत से हम तुम्हें अपने कानूनों को सिर झुका कर मानने के लिए मजबूर कर देंगे।'' हमारे देश के राजनीतिक नेताओं ने जब इस तत्व को समझा, तो लार्ड लारेंस की उस मूर्ति को ÷आपमानजनक' कह कर उसे हटाने के लिए सत्याप्रह किया। क्योंकि जिस लोकतांत्रिाक सभ्यता का झंडा लेकर अंगे्रज यहां शासन करते थे, उसका सिद्धांत हैᄉ ÷जनता के हित के लिए, जनता द्वारा बनाये हुए कानूनों के अनुसार, जनता के द्वारा ही प्रशासन होना।'
आराम और भोग के लिए लालायित ब्राह्मणों ने समाज पर अपने प्रभुत्व के स्थापन का उपाय किया। उसमें ऋषि थे, जो वेद मंत्राों के द्रष्टा माने जाते थे। वेदों को ईश्वरीय ज्ञान कहा जाता था। ईश्वरीय ज्ञान के द्रष्टा प्रायः ब्राह्मण ही थे, और वेदों का समाज पर आतंक छाया था। सारा धर्म, कर्म और ज्ञान वेदों में निहित था। ब्राह्मणों ने वेदों को अपनी स्वार्थ सिद्धि का अभेद्य दुर्ग बनाया, और अनंत ज्ञानमय अनंत वेदों (अनंतों वै वेदाः) के किले में बैठ कर नित नये सूक्त रूपी गोलों और आयटम बमों का समाज पर प्रहार करने लगे। क्षत्रिायों और वैश्यों सहित सारा समाज धराशायी हो गया!
ब्राह्मणों ने घोषणा कर दीᄉ ÷धर्म जिज्ञासुमानानां प्रमाणम्‌ परमं श्रृंतिः।' अर्थात्‌ धर्म के जो जिज्ञासु हैं, धर्म की जिनकी प्यास है, उनके लिए परम प्रमाण वेद हैं। और कहाᄉ ÷नास्तिको वेद निन्दकः' अर्थात्‌ जो वेदों की निन्दा करता है, वह नास्तिक है। ईश्वर की निन्दा करते रहो, ईश्वर को मानो या न मानो, तुम्हारी मर्जी। मगर खबरदार ! वेदों की निन्दा मत करना। वेदों के निन्दक और वेद विदूषक की भारी दुर्गति होती है। वह ÷नास्तिक' बना कर समाज में घृणा का पात्रा बना दिया जायगा या उसे समाज बहिष्कृत कर दिया जायगा।
यह स्वाभाविक है कि जो दबाया जाता है, वह अपने बचने का भी उपाय करता है। अतः जनता ने अपना रक्षक देवता बना कर कहाᄉ हम ऐसे देवता की पूजा करते हैं, जिसके आगे तुम्हारी कुछ न चलेगी। तो ब्राह्मणों ने कहाᄉ चुप रहो। बको मत। होश की दवा करो। याद रखोᄉ
देवाधीनं जगत्‌ सर्व, मंत्रााधीनं च देवताः।
ते मंत्रााः ब्राह्णाधीनं, तस्मात्‌ ब्राह्मण देवता॥
अर्थात्‌ सारा संसार देवताओं के अधीन है, देवता मंत्राों के अधीन हैं, वे मंत्रा ब्राह्मणों के अधीन हैं। इसलिए ब्राह्मण ही देवता (भूदेव) हैं। ब्राह्मणों को पूजो, ब्राह्मणों का आदेश मानो।
इसी भावना के मातहत समाज पर अपने प्रभ्ुात्व को, ईश्वरादेश बनाने की कामना से, नारायण ऋषि के हृदय में ÷पुरुष सूक्त' का प्रकाश हुआ। इसमें ईश्वर की विराट पुरुष (हाथ, पैर मुंह, आंख, कान, नाक आदि अंगों वाला पुरुष) कल्पना करके उसकी स्तुति की गयी है। पहले मंत्रा में उस पुरुष के रूप का वर्णन हुआ है। कहा गया हैᄉ ''उस पुरुष के हजार सिर, हजार आंखें और हजार पैर हैं, वह सब ओर से भूमि को छूता हुआ ÷दस अंगुल का' होकर ठहरा हुआ है।'' यथाᄉ
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपाद्।
स भूमि सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठाद्दशात्त्लम्‌॥
इस तरह उसके सावयव स्वरूप का वर्णन करते हुए अगले मंत्रा में बताया गया कि उस अद्भुत पुरुष से यह ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ और वही इस पर अधिष्ठित भी है तथा उत्पन्न जगत से, अलग भी। पहले भूमि बनाता है, फिर शरीरों को।
इस तरह स्तुति करते हुए अंत में कहा गया कि ब्राह्मण उसका मुंह है, क्षत्रिाय बाहें, वैश्य उरु और जांघ हैं तथा शूद्र उसके पैरों से उत्पन्न हुए। फिर बताया गया कि चंद्रमा उसके मन से, सूर्य उसकी आंखों से, वायु और प्राण उसके कानों से तथा अग्नि उसके मुंह से उत्पन्न हुई। (मुखादग्निरजायत्‌)
इस सूक्त के प्रकाश में आने से ब्राह्मण परमेश्वर की ओर से सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ हो गये। क्षत्रिाय बाहु होने से ब्राह्मणवाद के बलपूर्वक रक्षक सिपाही बन कर राज्य करने लगे। और सारी मजेदारी उरु या जांघों में होती है, जिससे कि वैश्य उत्पन्न हुए। इसीलिए सारी अर्थव्यवस्था और व्यापार वैश्यों की मुट्ठी में आया। वैश्य का अर्थ है धन या पूंजी। बचे बहुसंख्यक शूद्र, वे सब इस द्विजाति समाज के भोग, आराम और सुख के लिए सेवक एवं दास या गुलाम बनाये गये।
समाजवादी दृष्टि के लिए इतना वर्णन काफी है। परंतु हमारी आदत है कि नतीजा दूसरे बतावें । अच्छा सुनिए।
खोजी विद्वानों का मत
सर रमेशचंद्र दत्त के मतानुसार ब्राह्मण क्षत्रिाय वैश्य बाहर से आये आयोर्ं की संतान हैं, और जिन्हें आर्य शास्त्राों में शूद्र बताया गया है, वे सब भारत के मूल निवासी हैं। जिन मूल निवासियों ने विजेता आयोर्ं से युद्ध किया और आर्य प्रभुत्व जमने देने में बाधा पहुंचायी, वे सब दैत्य, असुर और राक्षस कहे गये। बाद में कुछ शक्तिशाली और मालदार मूल निवासियों को भी, जिन्होंने सिर झुका दिया, आर्य ब्राह्मणों ने अपने द्विजातीय संगठन में ले लिया।
इसी मत की पुष्टि विदेशी विद्वानों ने भी की है। श्री स्टैनले राइस एवं अमरीकी प्रेसिडेण्ट कैनेडी ने भी इसका सविस्तार वर्णन किया है और महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो अपने ÷ऋग्वेदिक आर्य' ग्रंथ में मूल वेद मंत्राों के द्वारा इसकी तस्वीर खींची है।
यह बात तो प्रायः सभी इतिहास ग्रंथों में लिखी हुई, प्रामाणिक तथा सर्वमान्य है कि भारत में आर्य लोग बाहर से आये। तब बाहर से आकर किसी देश पर शासन करने वाले के लिए यह स्वाभाविक होता है कि वह वहां की जनता का दमन करे और उसे दबोच कर अपने अनुशासन में रखे।

समाजवादी दृष्टि से इस व्यवस्था का स्वरूप
समाजवादी दृष्टि से इस व्यवस्था के सम्बंध में कहा जा सकता है कि यह तो सामंतवाद और पूंजीवाद के साथ ब्राह्मणवाद का गठबंधन हुआ। कहा भी है कि क्षात्रा शक्ति के बिना ब्राह्मण शक्ति मृतक हो जाती है। तात्पर्य यह कि ब्राह्मणवाद सदा तीर और तलवार के बल पर चलता है। यदि पीछे राजशक्ति न हो, तो नहीं चल पाता। इस व्यवस्था में चूंकि वैश्यों अर्थात्‌ पूंजीपतियों का, जिन्हें व्यापार करने और ब्याज लेने की छूट है, धन ब्राह्मणों और क्षत्रिायों की आवश्यकतानुसार खर्च होता है, इसलिए वे भी द्विजाति संगठन में रखे गये हैं। इस त्रिागुट से बाकी बचे ÷शूद्र' नामधारी कृषक, शिल्पकार, सेवक और मजदूर आदि श्रमजीवी, उन्हें अलग अलग पेशे देकर ÷जाति' नाम की नाना छोटी छोटी कोठरियों में कठोरता से कैद करके सदा के लिए भक्त, सेवक, दास व गुलाम बना लिया गया है।
इस तरकीब से ब्राह्मण वर्ग समाज का गुरु, पुरोहित, शास्ता, व्यवस्थापक, राजमंत्राी और न्यायाधीश बन गया; क्षत्रिाय वर्ग राजा, राज्यपाल, प्रशासक, योद्धा, सिपाही और रक्षक बना दिया गया और वैश्य वर्ग को व्यापार व महाजनी मिल गयी और वह पूंजीपति बन बैठा तथा शेष बहुसंख्यक जनता को वर्णसंकर, शूद्र, अछूत आदि कह कर समाज के लिए आवश्यक नाना कर्मों में नियुक्त करके नाना प्रकार के प्रपंचों का जाल रच कर उनका मनमाना शोषण, दोहन, दलन और उत्पीड़न किया गया। इस सारी समाज व्यवस्था का नाम है ÷हिन्दू धर्म' जो द्विजातियों को प्राणों से अधिक प्रिय है।
इस तरह जब यह हिन्दू समाज व्यवस्था निर्विरोध भाव से चलने लगती है, तो निश्चित भाव से ब्राह्मणों का काम केवल काव्यशास्त्रा का आनंद विनोद रह जाता है। यथाᄉ
काव्यशास्त्रा विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्‌।
इतरेषां तु मूर्खानां निद्रया कलहेन वा॥
अर्थात्‌ बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्राों के विनोद में व्यतीत होता है, और इतर मूर्ख (श्रमजीवी जब श्रम करते हुए थक जाते हैं, तो) सोते रहते है, और जब जागते हैं तो आपस में (रोटी के टुकड़ों के लिए कुत्तों की तरह) लड़ने लगते हैं।
और काव्यशास्त्रा का विनोद करने वाले गुरु लोग सवेरे शाम अपनी विजय का शंख बजाया करते हैं, तथा जो देवता और अवतार ब्राह्मणवाद की स्थापना में सहायता एवं ब्राह्मणी क्रियाकलाप के बाधक शत्राुओं का संहार करते हैं, उनके बड़े बड़े स्मारक मंदिर सामंतों और पूंजीपतियों द्वारा बनवा कर उनमें उनकी सुंदर कलापूर्ण मूर्तियां स्थापित कर नित्य उनकी आरती पूजा करते एवं उनकी विजय का नगाड़ा और घंटा बजाया करते हैं, तथा जिन बहुसंख्यक लोगों को वे अपने भोग सुख उपार्जन के लिए अपना सेवक और दास बना लेते हैं, उन्हें इन देवताओं या अवतारों की भक्ति करने का उपदेश दिया करते हैं।
यह है, भारतीय मौलिक समाजवाद की तस्वीर। मार्क्सवादियों से प्रार्थना है कि पश्चिमी देशों की मार्क्सवादी विचारधारा से जरा उ+पर उठ कर स्वदेशी समाज की गहराई में घुस कर भारतीय मौलिक समाजवाद की विचारधारा की दिशा में भी सोचें विचारें।
महापति और महान्‌ विचारक कार्ल मार्क्स का समाजवाद या साम्यवाद् केवल अर्थ और पूंजी पर आधारित है, जिसकी पुष्टि महात्मा डारविन के विकासवादी वैज्ञानिक शोध के इतिहास से होती है। किन्तु भारतीय जातिवादी समाज की रचना का आधार केवल पूंजी ही नहीं, ब्राह्मणों का बुद्धि कौशल है, जिसने धर्म, दर्शन, कर्मकांड, काव्य, कथा और ज्योतिष का आधार लेकर वर्ण भेद और जाति भेद से समन्वित समाज की रचना की है। इस रहस्य का उद्घाटन करने के लिए धरती के स्तरों का अध्ययन करने तथा जलचर, थलचर, नभचर जीवों की पड़ताल करने की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी समाजवादी दृष्टि से भारतीय साहित्य, भारतीय धर्म और भारतीय जातियों की सामाजिक दशा का तुलनात्मक अध्ययन करने की है।
सज्जनो! मैंने आपके सामने हिन्दू समाज और जातिवाद की रचना के सम्बंध में जो थोड़े से विचार व्यक्त किये हैं, यदि आपने इन्हें ध्यान से सुना है, तो आप इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि भारत में जातिवाद की जड़ ब्राह्मणवाद है। चूंकि ब्राह्मण जन्मना समाज का पूज्य रहना चाहता है, इसलिए वह औरों को भी जन्मना जाति की कोठरियों में कैद रखता है। जातिवाद और ब्राह्मणवाद का सम्बंध है। अतः यदि ब्राह्मणवाद को किसी तरह खत्म किया जा सके, तो जातिवाद अपने आप खत्म होकर मानवतावाद आ सकता है।
जातिवाद का प्रथम विरोधी चार्वाक
जातिवाद विरोधी संघर्ष के प्रथमाचार्य संस्कृत साहित्य में हमें महर्षि अंगिरा के पुत्रा एवं देवगुरु वृहस्पति के प्रधान शिष्य, धुरंधर दार्शनिक विद्वान्‌ चार्वाक मिलते हैं। इन्होंने ब्राह्मणवाद के उस मूल पर कुठाराघात किया जिस पर वह टिका हुआ और पनप रहा था। हम पहले बता आये हैं कि ब्राह्मणवाद का अभेद्य दुर्ग वेद और यज्ञादि वैदिक कर्मकांड हैं। महापंडित चार्वाक ने पहले इसी की जड़ को खोखला किया और अपना चार्वाक दर्शन रच कर इसका विप्लवकारी विरोध किया। चार्वाक दर्शन को पढ़ने वाला वैदिक कर्मकांड का सम्मुख विरोधी हो जाता था। यह दर्शन नष्ट कर दिया गया। इसका उल्लेख इसका खंडन करने वाले ग्रंथों में पूर्वपक्ष के रूप में मिलता है। सुना है, बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी एवं बड़ोदा की गायकवाड़ सिरीज में चार्वाक दर्शन प्रकाशित हो गया है। हमें मूल ग्रंथ पढ़ने का अब तक सौभाग्य नहीं हुआ। उसका छितरा हुआ खंडनात्मक वर्णन, जो संस्कृत ग्रंथों में मिलता है, वही हमने पढ़ा है और वह सार रूप में इस प्रकार हैᄉ ब्राह्मणों ने जनता को जिस स्वर्ग और परलोक का प्रलोभन दिया है, वह सब मिथ्या है। इस अनंत जगत्‌ का रचयिता कोई ईश्वर या कोई पुरुष नहीं है। यह स्वभाव से ही उत्पन्न हुआ है और स्वभाव से ही इसका विनाश व रूपांतर होता है। प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है (प्रत्यक्षमेकं चार्वाकः), अनुमान और शब्द या वेद आदि कोई प्रमाण नहीं हैं। वेद तो भंड, धूर्त और निशाचरों की रचना है (त्रायो वेदस्य कर्तारो भंड, धूर्त निशाचरः)। अश्वमेघादि यज्ञों में यजमान की पत्नी के लिए अश्यव सम्भोग की विधि अथवा ईश्वर के सहस्त्रा मुख, सहस्त्रा आंखें, सहस्त्रा पैर जैसे वर्णन नितांत ÷भंड़ैती' है। स्वर्ग का प्रलोभन अथवा पुत्राकामो यजेतᄉ धनकामो यजेत अर्थात्‌ पुत्रा की कामना है तो यज्ञ करो, धन की कामना है तो यज्ञ करो, इत्यादि प्रलोभन ÷धूर्तता' है। बलि पशु का मांस भक्षण और सोमसुरा पान एवं रात्रिा में यज्ञों का कोलाहल सब ÷निशाचरता' है। प्रवंचक ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए परलोक और स्वर्ग नर्क आदि की कल्पना करके जन समाज को भयभीत और अंधा बना रखा है। यज्ञ और श्राद्ध ब्राह्मणों का व्यवसाय और उपजीविका मात्रा है। यज्ञ में बलि किया जीव यदि स्वर्ग जाता है, तो याज्ञिक लोग अपने माता पिता की बलि देकर उन्हें स्वर्ग क्यों नहीं भेज देते? स्वर्ग प्राप्ति कामना से उनका श्राद्धादि क्यों करते हैं? धरती पर ब्रह्मभोज करने से यदि स्वर्गलोक में पितरों की तृप्ति हो जाती है, तो फिर आंगन में ब्राह्मण को भोजन कराने से तीसरी मंजिल पर बैठे हुए भूखे पितामह को तृप्ति क्यों नहीं हो जाती? वस्तुतः ब्राह्मणों का स्वर्ग और परलोक निरा ढोंग है। यह संसार ही सार है। सांसारिक सुख की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहना मनुष्य मात्रा का कर्तव्य है। मानवीय सदाचार का पालन और ज्ञान की अभिवृद्धि ही कल्याणकर है। जब तक जियो, सुख पूर्वक जियो।
यावज्जीवेत्‌ सुखं जीवेत्‌ᄉ चार्वाक के इस अंतिमोक्त वाक्य का मजाक उड़ाते हुए हमने कई ब्राह्मण उपदेशकों को सभाओं में ÷ईट डिं्रक एंड बी मेरी' अर्थात्‌ ÷खाओ पियो और खुश होओ' की मिसाल देते हुए सुना है। लेकिन यह भी उनकी ज्यादती है। चार्वाक के वचन में यावज्जीवं सुखं जीवेत्‌ ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्‌ है, जिसका अर्थ ÷शराब कवाब और जिनाकारी' कदापि नहीं है जैसा कि ईट डिं्रक और बी मेरी का अर्थ होता है। महापंडित चार्वाक घी खाने और बलिष्ठ होकर सुख से रहने की सलाह देते हैं, मदिरा मांस मैथुन की पे्ररणा नहीं करते।
जातिवाद विरोधी आचार्य अश्वघोष
महापंडित एवं दार्शनिक आचार्य अश्वघोष दो हजार वर्ष पूर्व (ई.पू. 50 से ई.50 तक) हुए। उस समय बौद्ध धर्म का पतन और ब्राह्मणी प्रभुत्व का तीव्र गति से उत्थान हो रहा था। आचार्य ने समझ लिया था कि समाज पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए ही ब्राह्मण चार वर्ण और नाना जातियां बना रहे हैं। अतएव उन्होंने संस्कृत में एक ÷बज्रसूची उपनिषद' लिखा। इस सम्पूर्ण उपनिषद में उन्होंने केवल एक प्रश्न का विवेचन किया है। वह प्रश्न हैᄉ को वा ब्राह्मणश्चेति ? (ब्राह्मण कौन है?)
आचार्य प्रश्न करते हैं, यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ है, तो बताओ तुम किस चीज को ब्राह्मण कहते हो , क्या ÷आत्मा' ब्राह्मण है, या शरीर ब्राह्मण है? ब्राह्मण जन्म से होता है या ज्ञान से? आचरण से ब्राह्मण होता है या वेदों में पारंगत होने से? या वृत्ति और पौरोहित्य से ब्राह्मण होता है?
आचार्य तर्क करते हैं कि वेदों में आत्मा को ब्राह्मण नहीं कहा गया। आत्मा न ब्राह्मण है, न शूद्र। आत्मा न स्त्राी है, न पुरुष। आत्मा न हाथी है और न चींटी। शरीर न रहने पर आत्मा विभिन्न शरीरों में जन्म लेती है। अतः आत्मा ब्राह्मण नहीं है। तुम्हारे शास्त्राों के अनुसार आत्मा नित्य, शुद्ध और मुक्त स्वभाव है।
यदि कहो कि शरीर ब्राह्मण है, तो शरीर गंदा मल, मूत्रा, नाक, खखार, रक्त, पीप, मांस, मज्जा, वृक आदि 32 मलों का आकार है। तो ऐसा अपवित्रा शरीर ÷ब्राह्मण' कैसे हो सकता है? यदि इन मलों से संयुक्त शरीर को ब्राह्मण कहते हो, तो क्षत्रिाय, वैश्य और शूद्र एवं यवन, कम्बोज, यज्ञ, किरात आदि सभी का शरीर इन मलों के आकार होने से समान हैं। फिर तुम्हारे ÷ब्राह्मण' शरीर से विशेषता क्या रही? यदि कहो ब्राह्मण के घर जन्म लेने से शरीर ब्राह्मण है, तो फिर मृत्यु हो जाने पर जो उस शरीर का दाह करता या कराता है, वे दोनों ब्रह्महत्या के पाप से पातकी होते हैं। पर ऐसा तुम नहीं मानते। इससे सिद्ध हुआ कि न आत्मा ब्राह्मण है और न शरीर।
फिर यदि कहो कि जन्म लेना ब्राह्मण है, तो यह भी ठीक नहीं ठहरता। बहुत से ऋषि ऐसे हैं जो न ब्राह्मण के घर में जन्मे हैं, न ब्राह्मणी माता के उदर से। तुम्हारे शास्त्राों में लिखा है कि अचल मुनि का जन्म हथिनी के पेट से, केश पिंगल का उल्लू के पेट से, अगस्त मुनि का अगस्त के फूल से, कौशिक का घास से, कपिल का कपिला से, गौतम का गुल्म से, द्रोणाचार्य का घड़े से, तैत्तिरीय का तीतर के पेट से, श्रृंग ऋषि का हरिणी के पेट से, व्यास का घीवरी के पेट से, विश्वामित्रा का चांडालिनी के पेट से, वशिष्ठ का उर्वशी वेश्या के पेट से हुआ। तो भी ये सब श्रेष्ठ ब्राह्मण ऋषि माने गये।
यदि कहो कि ब्राह्मण के बीज से ब्राह्मण होता है, तो ब्राह्मण चारों वणोर्ं की स्त्रिायों से भोग करते हैं एवं ब्राह्मणियां भी सभी पुरुषों से रति करती देखी जाती हैं। ऐसी दशा में बीज की शुद्धि की बात भी ठीक नहीं ठहरती।
यदि कहो कि ज्ञान से ब्राह्मण होता है, तो अनेक शूद्र ज्ञान निधान और लोकवंद्य हुए हैं। मातंग ऋषि चांडाल के घर उत्पन्न होकर महाज्ञानी हुए, मस्करी पुत्रा गोशाल ज्ञान समुद्र थे। इत्यादि। किन्तु कोई भी ब्राह्मण नहीं माने गये। अतः ज्ञान से ब्राह्मण होता है, यह बात भी मिथ्या ठहरती है।
यदि कहो कि आचार से ब्राह्मण होता है, तो अगणित शूद्र बड़े आचारवान्‌, सत्यवादी, जितेन्द्रिय और विशुद्ध शाकाहारी और पवित्रा परायण हुए और हैं, अनेक वैश्य और चांडाल भी पवित्रा आचरण वाले हुए हैं, परंतु कोई भी ब्राह्मण नहीं हो सके। इसलिए यह बात भी ठीक नहीं है कि आचार से ब्राह्मण होता है।
यदि कहो कि वेदों में पारंगत होने से ब्राह्मण होता है, तो रावण चारों वेदों का पारंगत था, उसके साथी भी बड़े बड़े वेदज्ञ थे, परंतु सबको राक्षस ही कहा जाता है, ब्राह्मण नहीं कहा जाता। इसलिए यह बात भी मिथ्या है कि वेदों का पारंगत होने से कोई ब्राह्मण होता है।
यदि कहो कि ब्राह्मण की वृत्ति या पौरोहित्य करने से ब्राह्मण होता है, तो यह बात भी ठीक नहीं है, क्योंकि बहुत से क्षत्रिाय, वैश्य और शूद्र यजन याजन, पठन पाठन और दान प्रतिग्रह करते तथा पुरोहिताई आदि करते दिखाई देते हैं तथा ज्योतिषी होकर ग्रहों की शांति कराते हैं, परंतु कोई भी ब्राह्मण नहीं माने जाते।
अतः जन्मवाद और शरीरवाद की बात मिथ्या है। ब्राह्मण केवल गुणों और कर्मों से ही हो सकता है। किसी भी व्यक्ति में, चाहे वह किसी देश, किसी भी कुल या किसी भी जाति में जन्मा हो, यदि उसमें इस प्रकार के गुण और कर्म पाये जाते हों, तो वह ब्राह्मण कहा और माना जा सकता है। यथाᄉ
निर्ममो निरहारो निःसत्ते निष्प्रतिग्रहः।
राग द्वेष विनिर्मुक्तिः देवा ब्राह्मणं विदुः॥
सत्यं ब्रह्म तपो ब्रह्म ब्रह्म चेन्द्रिय निग्रहः ।
सर्वभूते दया ब्रह्मा एतद् ब्राह्मण लक्षणाम्‌॥
अर्थᄉ जो ममता रहित है, जो अहंकारी नहीं है, जो अपने साथ कुछ नहीं रखता, जो राग और द्वेष से विमुक्त है, उसे ही देवों या पूर्व पुरुषों ने ÷ब्राह्मण' माना है। सत्य ब्राह्मणत्व है, तप ब्राह्मणत्व है, इंद्रियों का निग्रह ब्राह्मणत्व है तथा समस्त प्राणियों पर दया ब्राह्मणत्व है। यही ब्राह्मण के लक्षण हो सकते हैं।
जन्मना जातिवाद का यह कैसा तर्कपूर्ण खंडन है!
हमें इस पचड़े में पड़ने की जरूरत नहीं कि बज्रसूची उपनिषद बाद का है, जबकि हिन्दू शास्त्राों के प्रमाणों पर आधारित है तथा यही प्रसंग हमें भविष्य पुराण में भी मिलता है। उसमें भी जन्मना ब्राह्मणवाद का मजाक उड़ाया गया है।
जातिवाद पर भगवान बुद्ध के विचार
आम तौर से लोगों की धारणा है कि जन्मना जातिवाद का खंडन भगवान बुद्ध ने भी किया है, इसीलिए जन्मवादी ब्राह्मण बौद्ध धर्म के विरोधी हो गये। अतएव, जातिवाद के प्रसंग में भगवान बुद्ध का भी जिक्र आवश्यक है।
एक बार बुद्ध के किसी शिष्य ने उनसे पूछा कि ''भगवन ! ब्राह्मण लोग कहते हैं कि वे ब्रह्मा के मुख से पैदा होने के कारण श्रेष्ठ और पूजनीय हैं, शूद्र ब्रह्मा के पैरों से उत्पन्न होने के कारण हीन और दास मात्रा है। शूद्र धर्माचार्य नहीं हो सकता।'' इस पर भगवान ने कहाᄉ ''ब्राह्मण कैसे कहते हैं कि वे ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए हैं? ब्राह्मणों की स्त्रिायां ऋतुमती होती हैं, गर्भवती होती हैं, प्रसूता होती हैं, प्रजनन करती हैं, बच्चे को स्तनपान करा कर पालती पोसती और उसका मल मूत्रा उठा कर उसे स्वच्छ रखती हैं। जिस प्रकार सब बच्चों का जन्म होता है उसी तरह ब्राह्मण भी उत्पन्न होता देखा जाता है। तब ब्राह्मण कैसे कहते हैं कि वे ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए हैं ?''
इस तर्क द्वारा भगवान्‌ बुद्ध ने ब्रह्मा के मुंह से पैदा होने वाले मिथ्या अहंकार का साफ खंडन कर दिया। फिर कहाᄉ ''ब्राह्मण शब्द का अर्थ यदि ब्रह्मसंस्थ, ब्रह्मभूत या ब्रह्मबिहारी है, तो फिर ब्राह्मण उसे ही कहा जा सकता है जिसमें ब्रह्म के समान गुण हों। क्या ब्रह्म में राग द्वेष है? क्या ब्रह्म में अहंकार है? क्या ब्रह्म में ममता है? क्या ब्रह्म भोग परायण है? क्या ब्रह्म में छूत पाक है? क्या ब्रह्म प्राणघाती हिंसक है? क्या ब्रह्म चोर है? क्या ब्रह्म व्यभिचारी है? क्या ब्रह्म झूठा है, चुगलखोर, कटुभाषी, बकवादी, लोभी, क्रोधी, पाखंडी, धूर्त, ठग और मिथ्या धारणा वाला है? ब्रह्म में यदि ऐसा कोई विकार नहीं है, तब वह व्यक्ति जो इन सभी विकारों से ग्रसित है, कैसे कह सकता है कि वह ब्रह्म के मुख से उत्पन्न, ब्रह्मसंस्थ, ब्रह्मभूत, ब्रह्मबिहारी, ब्रह्मविदू, ब्रह्मनिमित या ब्रह्म दायाद है?''
अर्थात्‌ जिनकी बुद्धि नष्ट हो गयी है, उन जड़ मुखों के पांच लक्षण होते हैं, एक कि हर बात में वेद को प्रमाण मानना, दूसरे कार्य को देख कर कर्ता या कारण का अनुमान करना, तीसरे नहाने को धर्म समझना, चौथे जातिवाद के अहंकार में डूबे रहना और पांचवे पापों के नाश के लिए देह को संताप या कष्ट देना।
जातिवाद विनाश से देश सुखी और समुन्नत
इस तरह जातिवाद की महिमा मिट जाने से जब देश की दबी पिछड़ी जातियों को सिर उठाने का मौका मिला, तो उनमें बड़े बड़े ज्ञानी, योगी, सिद्ध, महात्मा और विद्वान्‌ उत्पन्न होकर समाज में सम्मानित और पूजनीय हुए। बौद्ध त्रिापिटक शास्त्रा में विनय पिटक के प्रणेता आचार्य ÷उपालि' हुए, जो नाई जाति में जन्मे थे। बौद्धाचायोर्ं, स्थविरों, महास्थविरों में अधिकांश छोटी जातियों के लोग दिखायी देने लगे। सुप्रसिद्ध चौरासी सिद्धों में तो सिद्ध मीनपा ÷मल्लाह', सिद्ध कुल्हड़पा ÷कुम्हार' और सिद्ध सरहपाद ÷लोहार' थे। सिद्ध मीनपा ही मत्स्येन्द्रनाथ हैं, जिनके शिष्य गुरु गोरखनाथ हैं, जो प्रसिद्ध नाथ पंथ के आदिगुरु माने जाते हैं।
भगवान बुद्ध द्वारा की धार्मिक क्रांति के फलस्वरूप सात सौ वषोर्ं तक भारत में जातिवाद दब कर मानवतावाद का बोलबाला रहा। इतिहासवेत्ता जानते हैं कि ये ही सात सौ वर्ष भारतवर्ष का स्वर्णयुग है। इसी काल में भारत में अशोक और चंद्रगुप्त जैसे सम्राट हुए, जिनकी यूरोप और एशिया के महान्‌ सम्राटों से मैत्राी रही। यही वह काल है जब भारत में साहित्य और दर्शन एवं शिल्पकला, चित्राकला, स्थापत्यकला इत्यादि कलाओं की श्लाघनीय उन्नति हुई। किन्तु देश के अभ्युदय को जातिवाद रूपी अजगर निगल गया। अंतिम मौर्य सम्राट महाराज वृहद्रथ को मार कर उनके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्रा ने राज सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया और अपना शुंगवंशीय ब्राह्मण राज्य चलाया। इस ब्राह्मण राज्य में बौद्धों पर अमानुषी अत्याचार होने लगा। बौद्ध विहारों, बौद्ध विद्यालयों और बौद्ध मूर्तियों को नष्ट किया जाने लगा और बौद्ध भिक्षुओं, स्थविरों और महास्थविरों को इस तरह सताया और त्राास दिया जाने लगा कि बेचारे देश छोड़ कर विदेशों को भाग गये और देश में जन्मवादी ब्राह्मण राज्य का बड़े जोर शोर से आतंक छा गया।
मुसलमानों, ईसाइयों और सिक्खों में भी जाति भेद
शासन सत्ता हाथ में आ जाने से ब्राह्मणवाद का प्रचार तो हो गया परंतु देश स्वाधीन न रह सका। मुसलमानों के हमले शुरू हो गये। कुछ काल तक हमलावर हिन्द का सोना, रत्न, जवाहर और सुंदरी ललनाओं को ही लूट कर ले जाते रहे। बाद में जब उन्हें यहां की भीतरी कमजोरी जातिवादी छिन्न भिन्नता का पता चला, तो उन्हें देश पर हुकूमत करने का भी हौसला हुआ। फलतः यहां मुसलमानी सलतनत कायम हो गयी।
जातिवादी घमंड के नशे में चूर राजपूत तो हमलावरों को जीत न सके। कुछ ÷केसरिया बाना और जौहरव्रत' करके जातिवादी यज्ञकुंड में सपत्नीक आहूत हो गये और बाकी सब अधीनता स्वीकार करने को विवश हो गये। अगर किसी ने हमलावरों का सफल मुकाबला किया, तो जातिविहीन होकर सिक्ख गुरुओं या शूद्र कुलोत्पन्न छत्रापति शिवाजीराव भोसले ने। मुगल सम्राट अकबर ने जातिवादी कलह को मिटाने के लिए ईश्वरीय धर्म (दीनेइलाही) को चलाना चाहा, लेकिन न चल सका। अंत में साम्प्रदायिकता और जातिवाद की ऐसी विजय हुई कि मुसलमानों में भी शेख, सैयद, मुगल, पठान नामक चार वर्ण एवं धुना, जुलाहे, हज्जाम, कुंजड़े कस्साब, कसगर, मोमिन, मीरासी, मनिहार, रंगरेज, दर्जी, गद्दी, डफाली, नक्काल इत्यादि नाना जातियां बन गयीं। उधर सिक्खों में भी जाट, अहलुवालिया, खत्राी, खाती, मजहबी आदि जातियां बनीं और ईसाइयों में भी अछूत जातीय, उच्च जातीय ईसाई एवं यूरोपियन और यूरोशियन ईसाइयों में भी जाति भेद की दुर्गंध निकलती देखी जाती है

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साभार: तद्भव दलित विशेषांक http://tadbhav.com/dalit_issue/jatibad_ka_birodh.html#jatibad

चमचा युग (पिट्ठुओं का जमाना)


चमचा युग (पिट्ठुओं का जमाना) 
कांशीराम

चमचा युग इस लोकप्रिय पुस्तिका चमचा युग से भारतीय राजनीति में एक नये युग का सूत्रापात होता है जिसने दलितों की स्वतंत्रा राजनीति को जन्म दिया। इस लोकप्रिय पुस्तक के लेखक कांशीराम उच्चकोटि के वक्ता तथा संगठनकर्ता रहे। लेखन के अतिरिक्त कांशीराम ने दबे कुचले पीड़ित और शोषित लोगों को एकत्रा कर मजबूत संगठन बामसेफ, डी.एस.4 तथा ब.स.पा. बना कर सत्ता हासिल करने में सफलता पायी। कांशीराम के दिये गये भाषणों एवं साक्षात्कारों की अनेक पुस्तकें विभिन्न आयोजनों पर रैलियों मेलों में बिकती हैं। अनुवादक राम गोपाल आजाद ने समता प्रकाशन, लश्करीबाग, नागपुर से इसका प्रकाशन 1982 में किया। इस पुस्तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अध्याय ÷चमचा युग' प्रस्तुत है। 

यदि चिर परिचित मुहावरों में कहना हो तो हिन्दुओं के लिहाज से संयुक्त निर्वाचक मंडल एक सड़ा गला उपनगर ;ं तवजजमद इवतवनहीद्ध है, जिसमें हिन्दुओं को किसी अछूत को नामांकित करने का ऐसा अधिकार मिला हुआ है जिसमें उसे अछूतों को प्रतिनिधि तो नाम मात्रा के लिए बनायें लेकिन असलियत में उसे हिन्दुओं का औजार (पिट्ठू) बना सकें।
डॉ.बी.आर. आम्बेडकर
चमचा है क्या?
इस उद्धरण में डॉ. आम्बेडकर ने ÷हिन्दुओं का औजार' शब्द का इस्तेमाल किया है। अनुसूचित जातियों के अधिकारों के सिलसिले में डॉ. आम्बेडकर इस ÷औजार' शब्द का प्रयोग अक्सर करते रहे। औजार शब्द के अलावा अन्य मिलते जुलते शब्द जैसे ÷हिन्दुओं के दलाल' या ÷हिन्दुओं के पिट्ठू' आदि का भी वे प्रयोग करते रहे। स्वतंत्राता परवर्ती राजनैतिक अपरिहार्यताओं ने इन औजारों, दलालों तथा पिट्ठुओं को बहुत अधिक बढ़ावा दिया। बाब साहेब डॉ. आम्बेडकर के 1956 ई. में दुखद परिनिर्वाण के बाद यह प्रक्रिया इतनी तेज हुई कि आज ये औजार, दलाल और पिट्ठू न केवल राजनैतिक क्षेत्रा में बहुतायत में 
छाये हुए हैं बल्कि मानव जीवन की प्रत्येक गतिविधि और सम्बंधों के क्षेत्रा में भी व्याप्त हैं। शुरू शुरू में ये औजार, दलाल और पिट्ठू केवल डॉ. आम्बेडकर को तथा विवेकवान नजरों को ही दिखायी पड़ते थे और उनके पश्चात इनका पता बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा लगाया जा सकता था किन्तु आज ये औजार, दलाल और पिट्ठू लोग हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में इतने सामान्य उपादान बन गये हैं कि उन्हें किसी भी आम आदमी द्वारा जनता के बीच पहचाना जा सकता है। आम आदमी की अपनी एक शब्दावली होती है। उसकी शब्दावली में किसी औजार, दलाल और पिट्ठू को ÷चमचा' कहा जाता है और इस पुस्तक में मैंने आम आदमी के बोलचाल की शब्दावली का ही प्रयोग करने का निर्णय लिया है। मेरे ख्याल में जब हम आम आदमी के हित और लक्ष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो उसके बोलचाल की शब्दावली का इस्तेमाल करना ही उपयुक्त होगा।
चमचा एक देशी शब्द है जो ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो अपने आप क्रियाशील नहीं हो पाता है बल्कि उसे सक्रिय करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है। वह अन्य व्यक्ति चमचे को सदैव अपने व्यक्तिगत उपयोग और हित में अथवा अपनी जाति की भलाई में इस्तेमाल करता है जो स्वयं चमचे की जाति के लिए हमेशा नुकसानदेह होता है। इस पुस्तक में हम औजार, दलाल और पिट्ठू जैसे शब्दों से ज्यादा चमचा शब्द का प्रयोग करेंगे। भारतीय संदर्भ में और आम आदमी के लिए यह शब्द प्रयोग करना ज्यादा कारगर होगा क्योंकि यह अपने अर्थ के साथ अपने भाव की सम्प्रेषणीयता में भी अधिकतम प्रभावी है। चमचा, पिट्ठू, दलाल और औजारᄉ ये चारों शब्द लगभग समानार्थक हैं लेकिन इनके भाव में थोड़ा अंतर है। इसलिए उनका इस्तेमाल उनके अर्थ तथा भाव सम्प्रेषण की प्रभावशीलता पर निर्भर रहेगा।
किसी मिशनरी व्यक्ति को समझने की भूल नहीं करना चाहिए
कुछ लोगों द्वारा मिशनरी व्यक्तियों को चमचा समझने की भूल करना सम्भव है। यह एक भयंकर भूल हो सकती है। मिशनरी लोग और चमचे बिल्कुल विपरीत ध्रुव हैं। एक मिशनरी व्यक्ति जहां सबसे अधिक आज्ञाकारी होता है वहीं चमचा एक सर्वाधिक जी हुजूरी करने वाला चापलूस होता है। जो लोग आज्ञाकारिता और चापलूसी में अंतर नहीं कर सकते हैं उनके द्वारा किसी मिशनरी को भी चमचा समझने की भूल करने की सम्भावना है। किसी चमचे को उसके अपने ही समुदाय के विरुद्ध प्रयोग किया जाता है जबकि किसी मिशनरी को उसके अपने समुदाय की भलाई में प्रयोग किया जाता है। इससे भी बढ़ कर, किसी चमचे को अपने समुदाय के सच्चे और वास्तविक नेता को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जबकि किसी मिशनरी को उसके समुदाय के सच्चे और वास्तविक नेता के हाथों को मजबूत करने और उसकी सहायता के लिए प्रयोग किया जाता है। एक चमचा और एक मिशनरी कार्यकर्ता के बीच अंतर को रेखांकित करने के लिए और भी तमाम बिन्दुओं को गिनाया जा सकता है किन्तु यहां हमारी एकमात्रा रुचि इस बिन्दु पर जोर देने की है कि किसी मिशनरी को चमचा समझने की भूल न की जाय।
चमचा बनाने की आवश्यकता
कोई औजार, दलाल, पिट्ठू अथवा चमचा इसलिए बनाया जाता है ताकि उससे सच्चे और वास्तविक संघर्षकर्ता का विरोध कराया जा सके। चमचों की मांग तभी होती है जब सामने सच्चा और वास्तविक संघर्षकर्ता मौजूद हो। जब किसी लड़ने वाले की ओर से किसी प्रकार की कोई लड़ाई न हो, संघर्ष न हो और कोई खतरा न हो तो चमचों की मांग भी नहीं रहती है। जैसा कि हम देख चुके हैं कि लगभग पूरे भारत में बीसवीं शताब्दी की शुरुआत से ही दलित वर्ग छुआछूत और अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था। शुरुआत में उनकी उपेक्षा की गयी किन्तु बाद में जब दलित वगोर्ं का सच्चा नेतृत्व प्रबल और शक्तिसम्पन्न हो गया तो उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। इस मुकाम पर उच्च जातीय हिन्दुओं को दलित वगोर्ं के विरुद्ध चमचों को उभारने की जरूरत महसूस हुई।
गोलमेज सम्मेलनों के दौरान डॉ. आम्बेडकर दलित वगोर्ं के लिए सर्वाधिक विश्वासोत्पादक रूप से लड़े। उस समय तक गांधी जी और कांग्रेस का ऐसा ख्याल था कि दलित वगोर्ं के पास कोई ऐसा वास्तविक नेता नहीं है जो उनके लिए लड़ सके। सन्‌ 1930-31 के आसपास गोलमेज सम्मेलनों के दौरान गांधी जी और कांग्रेस के तमाम विरोधों के बावजूद दलितों को पृथक निर्वाचक मंडल प्रदान करते हुए प्रधानमंत्राी का साम्प्रदायिक निर्णय 17 अगस्त 1932 को घोषित कर दिया गया। 1930 से 1932 की इस अवधि के दौरान गांधी जी और कांग्रेस ने पहली बार चमचों की आवश्यकता अनुभव की।
अंधकार युग से प्रकाश युग
भारत के अछूत लोग अपने ही देश में सदियों तक जैसी दर्दनाक तकलीफों या कष्टों से गुजरे हैं उस तरह पूरी दुनिया में कोई भी दूसरे लोग नहीं गुजरे, विदेशों में भी नहीं। भारत के अछूतों की तुलना में गुलामों, नीग्रो तथा यहूदी लोगों के कष्ट और अपमान कुछ भी नहीं हैं। जब हम किसी मानव की दूसरे मानव के प्रति अमानवीयता के बारे में सोचते हैं तो अछूतों के खिलाफ हिन्दुओं के सनातनवाद का कहीं कोई सानी नहीं मिलता है। भारत के अछूत सदियों से दुनिया के सबसे गये गुजरे गुलाम बने रहे। ब्राह्मणवाद के अंदर ऐसे विषैले जीवाणु थे कि इसने निकृष्टतम किस्म के अन्याय के खिलाफ विद्रोह करने की इच्छा को ही मार डाला। इस प्रकार भारत के अछूतों ने शताब्दियों तक जैसा संत्राास झेला है उनके लिए उसे अंधकार युग ही कहा जा सकता है।
ब्रिटिश शासन के दौरान इन अछूतों को पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता का काफी लम्बे समय तक सम्पर्क प्राप्त हुआ। इसने उनके अंदर विद्रोह की भावना भड़का दी। इस प्रकार हम बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही अछूतों को लगभग पूरे भारत में छुआछूत तथा अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े होते पाते हैं। सन्‌ 1920 तक डॉ. आम्बेडकर उनके लिए नेता और मसीहा के रूप में उभर चुके थे। दस वर्षों के अंदर ही दलितों के ध्येय को उन्होंने 1930-32 के दौरान इंग्लैण्ड में सम्पन्न गोलमेज सम्मेलनों में उठाया। इन दो गोलमेज सम्मेलनों में वे अछूतों के लिए सफलतापूर्वक लड़े और उनके लिए विभिन्न अधिकारों, विशेषकर पृथक निर्वाचक मंडल के रूप में राजनैतिक अधिकारों को प्राप्त किया। पीछे मुड़ कर सिंहावलोकन करने पर हम सुरक्षित रूप से यह कह सकते हैं कि डॉ. आम्बेडकर भारत के अछूतों को अंधकार युग से प्रकाश युग की ओर ले जा रहे थे। किन्तु हाय! यह नहीं होना था, क्योंकि प्रकाश युग में पहुंचने के पूर्व ही वे अछूत चमचा युग में फिसल कर भटक गये।
चमचा युग में फिसलन
1931-32 की इस अवधि के दौरान गांधी जी और कांग्रेस ने डॉ. आम्बेडकर के प्रयासों को आंशिक रूप से ध्वस्त किया। डॉ. आम्बेडकर अछूतों को अंधकार युग से निकाल कर प्रकाश युग में ले जाने का संघर्ष कर रहे थे। किन्तु गांधी जी और कांग्रेस दूसरी ही साजिशें रच रहे थे। गांधी जी इस देश की व्यवस्था चातुर्वर्ण्य पर आधारित अपने धर्म के अनुसार चलाना चाहते थे। ऐसा करके उन्हें अछूतों को अंधकार युग में ही बनाये रखने का पक्का यकीन था ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार चातुर्वर्ण्य उन्हें सदियों तक बनाये रख सका।
इन साजिशों के वशीभूत होकर गांधी जी ने उनके लिए किसी प्रकार के संरक्षणों के विरुद्ध जम कर लड़ाई लड़ी। गोलमेज सम्मेलन में अंतिम स्थिति तक उन्होंने इंच इंच पर अड़ंगेबाजी की। अछूतों से अपनी शत्राुता के कारण वे इस हद तक चले गये कि उन्होंने अछूतों का विरोध करने में मुसलमानों का साथ लेने के लिए मुसलमानों की सभी मांगें स्वीकार कर लीं। किन्तु सौभाग्य से मुसलमानों ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इतने सबके बावजूद डॉ. आम्बेडकर उनके अधिकारों को, खास तौर पर पृथक निर्वाचक मंडल के रूप में उनके राजनैतिक अधिकारों को प्राप्त करने में सफल रहे।
गांधी जी के लिए तो यह अत्यधिक कठिन और असहनीय बात थी। जब उनकी सारी दलीलें नाकाम हो गयीं तो उन्होंने दबाव नीति का सहारा लिया और आमरण अनशन की धमकी दे डाली। ब्रिटिश प्रधानमंत्राी ने उन्हें अत्यंत विश्वासोत्पादक पत्रा लिखा किन्तु गांधी जी ने 20 सितम्बर 1932 को अपना अनशन शुरू कर दिया। गांधी जी के आमरण अनशन के दबावपूर्ण प्रभाव को डॉ. आम्बेडकर के उस वक्तव्य के निम्न उद्धरण से सर्वोत्तम रूप से स्पष्ट किया जा सकता है जो उन्होंने 19 सितम्बर 1932 को जारी किया थाᄉ''यह ध्यान देना और भी अधिक महत्वपूर्ण है कि महात्मा प्रतिक्रियावादी और अनियंत्राणीय शक्तियों को मुक्त कर रहे हैं और इस प्रकार हिन्दू समुदाय तथा दलित वगोर्ं के बीच घृणा की भावना को बढ़ावा दे रहे हैं जिससे उन दोनों के बीच मौजूद खाईं और भी चौड़ी हो रही है। जब मैंने गोलमेज सम्मेलन में मि. गांधी का विरोध किया था तो मेरे खिलाफ पूरे देश में बड़ा होहल्ला मचाया गया था और तथाकथित राष्ट्रीय प्रेस में मुझे राष्ट्रीय उद्देष्श्य के विरुद्ध देशद्रोही के रूप में चित्रिात करने, मेरे पक्ष की ओर से आने वाले पत्रााचार को दबाने तथा सभाओं और सम्मेलनों (जिनमें से कई तो कभी सम्पन्न ही नहीं हुए) की अतिशयोक्तिपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित कर मेरी पार्टी के खिलाफ प्रचार को बल देने का षड़यंत्रा चल रहा था। दलितों की कतारों में विभाजन पैदा करने के लिए चांदी की गोलियों ;ैपसअमत ठनससमजेद्ध का बेरोकटोक इस्तेमाल किया जा रहा था। कुछ झगड़ों की परिणति तो हिंसा में भी हुई।''
''यदि महात्मा इस सबकी व्यापक स्तर पर पुनरावृत्ति नहीं चाहते हैं तो भगवान के वास्ते उन्हें अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए और विनाशकारी परिणामों को टालना चाहिए। मेरा विश्वास है कि महात्मा ऐसा नहीं चाहते होंगे। लेकिन यदि वे स्वयं को विरत नहीं करते हैं तो उनकी तमाम सदिच्छाओं के बावजूद इन परिणामों का आगे आना वैसे ही निश्चित और अवश्यंभावी है जैसे कि दिन के बाद रात आती है।''
डॉ. आम्बेडकर के बयान का उपरोक्त अंश डॉ. आम्बेडकर के उस पशोपेश की झलक देता है जिसमें वे उस समय उलझे हुए थे। डॉ. आम्बेडकर से गांधी जी का तर्क था कि ''मेरा जीवन आपके हाथों में है क्या आप मेरे जीवन को बचायेंगे?'' यह अपने अनशन के द्वारा पैदा की गयी परिस्थिति से स्वयं को निकालने की गांधी जी की बेहद बेसब्री को दर्शाता है। डॉ. आम्बेडकर तथा गांधी जी के ऐसे पशोपेश में होने के कारण दोनों ही इस स्थिति से निकलने के लिए उत्सुक थे। और इस प्रकार ÷हिन्दुओं की नापसंदगी और अछूतों की नाराजगी के बीच पूना समझौते को दोनों पक्षों द्वारा मान्यता दी गयी और उसे भारत सरकार अधिनियम में अंगीकृत कर लिया गया।'
पूना पैक्ट ने अछूतों से पृथक मताधिकार अथवा पृथक निर्वाचक मंडल छीन लिया और उन पर संयुक्त निर्वाचक मंडल थोप दिया। इसके प्रभाव को स्वयं बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ने अद्भुत रूप से स्पष्ट किया हैᄉ''संयुक्त निर्वाचक मंडल और सुरक्षित सीटों की व्यवस्था, जो एतत्पश्चात पूना पैक्ट की शतोर्ं के अनुसार लागू होगी, के अंतर्गत स्थिति और भी बदतर हो जायेगी। यह कोरी कल्पना भर नहीं है। पिछले चुनाव (1946) ने निर्णायक रूप से यह साबित कर दिया है कि अनुसूचित जातियों को संयुक्त निर्वाचक मंडल में पूर्णरूपेण मताधिकार वंचित किया जा सकता है।''
अवश्यम्भावी होने वाला हो ही गया, पूना पैक्ट ने अनुसूचित जातियों को मताधिकार वंचित कर दिया और उसके द्वारा चमचा युग में धकेल दिया।
चमचा युग कितना पुराना है?
24 सितम्बर 1932 को पूना पैक्ट दलित वगोर्ं पर थोप दिया गया और उसी के साथ चमचा युग का सूत्रापात हो गया। जब हिन्दुओं को महज थोड़ी सी शक्ति सत्ता छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा तो उन्होंने सुरक्षा की दूसरी पंक्ति अख्तियार कर ली। उन्होंने इस बात का ख्याल फिर भी रखा कि दलितों के उ+पर से उनका नियंत्राण समाप्त न होने पाये। और इस नियंत्राण को उन्होंने संयुक्त निर्वाचक मंडल के जरिये हासिल कर लिया। संयुक्त निर्वाचक मंडल द्वारा अछूतों के प्रतिनिधि सिर्फ नाममात्रा के प्रतिनिधि बन कर रह गये न कि सच्चे प्रतिनिधि। क्योंकि कोई भी अछूत जो हिन्दुओं का प्रतिनिधि और उनका चमचा बनने के लिए सहमत न हो तो वह संयुक्त निर्वाचन के तहत चुनाव जीतने में सफल ही नहीं हो सकता है, जिसमें अछूत मतदाता 1:5 के अनुपात में या कहीं कहीं तो 1:10 के अनुपात में संख्यात्मक रूप से पीछे धकेल दिये गये हैं।
यही कारण था कि गांधी जी संयुक्त निर्वाचक मंडल के अंतर्गत एक सच्चे और वास्तविक प्रतिनिधि के बदले में दो चमचे देने के लिए सहमत हो गये। किन्तु चमचों की बड़ी से बड़ी संख्या एक भी सच्चे और वास्तविक प्रतिनिधि का विकल्प नहीं बन सकती है। दलित वगोर्ं ने चाहे पसंद किया हो या न किया हो किन्तु 24 सितम्बर 1932 को पूना पैक्ट ने उन्हें चमचा युग में धकेल दिया। यह चमचा युग 24 सितम्बर 1982 को पचास वर्ष का हो जायेगा, जिस दिन डी एस 4 स्वयं पूना में पूना पैक्ट का धिक्कार या भर्त्सना करेगी।
चमचा युग कब तक रहेगा?
हमारे सामने यह दूसरा प्रश्न है जिसका न सिर्फ उत्तर देना है बल्कि जिससे हमें जूझना भी है। सर्वप्रथम तो हमको यह समझना है कि पचास वर्षों में विभिन्न प्रकार के चमचे कैसे विकसित हो गये। आज भारत पर शासन कर रहे उच्च जातीय हिन्दुओं को चमचे पैदा करने की जरूरत तभी महसूस हुई जब उनके सामने दलित वगोर्ं के सच्चे और वास्तविक नेतृत्व के उभरने का खतरा उपस्थित हो गया। आज जब दलित शोषित जातियों का कोई सच्चा नेतृत्व नहीं है तो चमचों की मांग घट गयी है। किसी भी सूरत में चमचों की आज पहले जैसी पूछ नहीं है। किन्तु बामसेफ और डी एस 4 के रूप में सच्चे और वास्तविक नेतृत्व उभरने के साथ ही चमचे पुनः महत्व पा सकते हैं। ऐसी स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक उत्पीड़क और उत्पीड़ित के बीच संघर्ष बना रहेगा। मेरे अनुमान में चमचा युग के सुनिश्चित एवं पूर्ण अंत करने के लिए दस वर्ष से अधिक का समय नहीं लगेगा।
चमचों की विविध किस्में
''पूना पैक्ट की धारा (5) ने प्राथमिक चुनाव की प्रणाली को दस वर्ष तक सीमित कर दिया है जिसका अर्थ है कि 1947 ई. के पश्चात होने वाला कोई भी चुनाव संयुक्त निर्वाचक मंडल और सुरक्षित सीटों की एकमेव प्रणाली के अंतर्गत ही होगा।
संयुक्त निर्वाचक मंडल और सुरक्षित सीटों की प्रणाली के अंतर्गत स्थिति और भी बदतर हो जाऐगी, जो एतत्पश्चात पूना पैक्ट की शतोर्ं के अनुसार लागू होगी। यह कोरी कल्पना मात्रा नहीं है। पिछले चुनाव ने (1946) निर्णायक रूप से यह सिद्ध कर दिया है कि अनुसूचित जातियों को संयुक्त निर्वाचक मंडल से पूर्णरूपेण मताधिकारच्युत किया जा सकता है।'' डॉ.बी.आर. आम्बेडकर
डॉ. आम्बेडकर की आशंका सच निकली। संयुक्त निर्वाचक मंडल और आरक्षित सीटों की व्यवस्था ने अनुसूचित जातियों के स्वतंत्रा आंदोलन को ध्वस्त कर दिया। अनुसूचित जातियों को पूर्णतः मताधिकारच्युत कर दिया गया और लोकतंत्रा में मताधिकारच्युत किये गये लोगों की हालत की हम सहज ही कल्पना कर सकते हैं। डॉ. आम्बेडकर जैसी बौद्धिक क्षमता और कद का व्यक्ति दो बार, एक बार 1952 के आम चुनाव में बम्बई से, और दूसरी बार 1954 के उप चुनाव में भंडारा से, संसदीय चुनाव जीतने में असफल रहा। इन दोनों ही चुनावों में वे उच्च जातीय हिन्दुओं की कांग्रेस के टिकट पर खड़े अल्पज्ञात और अनजाने से प्रत्याशियों से पराजित हो गये।
सौभाग्य से उस समय स्थिति को सुधारने और सम्हालने के लिए डॉ. आम्बेडकर मौजूद थे। बदली हुई रणनीति और दांवपेच के परिणामस्वरूप अनुसूचित जाति के लोग 1957 ई. के आम चुनाव के दौरान अपनी पकड़ पुनः मजबूत कर सकते थे। किन्तु हाय रे बदकिस्मती। इस रणनीति को उसकी तार्किक परिणति तक ले जाने के लिए उसके बाद डा. आम्बेडकर ही हमारे बीच नहीं रहे। उनके महापरिनिर्वाण के अलावा नये नये किस्म के चमचों के उभरने से स्थिति और गड़बड़ा गयी। डॉ. आम्बेडकर को अपने समय में सिर्फ कांग्रेस के और अनुसूचित जातियों के चमचों से जूझना पड़ा। किन्तु आम्बेडकर परवर्ती वर्षों में कांग्रेस के अलावा दूसरी पार्टियों ने भी न सिर्फ अनुसूचित जातियों के बीच से बल्कि दूसरी जातियों के बीच से भी चमचे पैदा करने की जरूरत महसूस की। और इस तरह विविध किस्म के चमचों का व्यापक पैमाने पर प्रादुर्भाव हुआ।
(अ) जाति और समुदायवार चमचे
भारत के दलित शोषित लोग, जो देश की कुल जनसंख्या का लगभग 85 प्रतिशत हैं, एक नेतृत्वविहीन समूह है। वास्तव में उनमें नेतृत्वविहीनता उत्पन्न करने में उच्च जातीय हिन्दू सफल रहे। ऐसी स्थिति इन जातियों और समुदायों में चमचे पैदा करने के लिए सर्वाधिक अनुकूल है। जाति और समुदायवार इन चमचों को निम्न श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता हैᄉ
(1) अनुसूचित जातियां अनिच्छुक ;त्मसनबजंदजद्ध चमचे
बीसवीं शताब्दी के दौरान अनुसूचित जातियों का सम्पूर्ण संघर्ष इस बात का स्पष्ट संकेत करता है कि वे उज्ज्वल युग में प्रवेश करने का प्रयास कर रहे थे किन्तु उन्हें गांधी जी और कांग्रेस ने चमचा युग में धकेल दिया। वे अभी भी दबाव में रहते हुए कष्ट उठा रहे हैं। उन्होंने हालांकि मौजूदा स्थिति से समझौता नहीं किया है किन्तु वे इसके बाहर निकल पाने में अक्षम हैं। इसीलिए उन्हें अनिच्छुक चमचों के रूप में अभिहीत किया जा सकता है।

(2) अनुसूचित जनजातियां : नवदीक्षित ; प्दपजपंजमकद्ध चमचे
अनुसूचित जनजातियां भारत के संवैधानिक और आधुनिक विकास के दौरान संघर्ष करने के लिए नहीं जानी जाती हैं। 1940 ई. के दौरान अनुसूचित जातियों के साथ उन्होंने भी मान्यता और अधिकारों को प्राप्त करना प्रारम्भ किया। भारतीय संविधान के अनुसार 26 जनवरी, 1950 के पश्चात उन्हें भी वही पहचान और अधिकार मिल गये जो अनुसूचित जातियों के हैं। उन्हें यह सब अनुसूचित जातियों के संघर्ष के परिणामस्वरूप हासिल हो गया, जिसने दलित शोषित भारतीयों के पक्ष में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जनमत तैयार किया। इनका आज तक भारत के केन्द्रीय मंत्रिामंडल में कभी प्रतिनिधित्व नहीं हुआ। फिर भी ऐसा लगता है कि उन्हें जो कुछ भी मिल जाय बस उसी से संतुष्ट हैं। जो सबसे बुरी बात है वह यह है कि वे अभी भी इस भ्रम में हैं कि उनके उत्पीड़क और शोषक ही उनके हितैषी और खैरख्वाह हैं। इसलिए उन्हें नवदीक्षित चमचों का नाम दिया जा सकता है, क्योंकि उन्हें चमचा युग में सीधे सीधे प्रविष्ट करा दिया गया।
(3) अन्य पिछड़ी जातियां : महत्वाकांक्षी ;।ेचपतपदहद्ध चमचे
एक लम्बी जद्दोजेहद और संघर्ष के बाद अनुसूचित जातियों को, जनजातियों समेत, मान्यता और अधिकार मिले। इन सबके परिणामस्वरूप उनमें से कुछ ने अपनी हालत इतनी सुधार ली कि वैसा करना उनकी शक्ति और सामर्थ्य से भी बाहर था। उनकी प्रगति, शिक्षा, सरकारी सेवा और राजनीति के क्षेत्राों में स्पष्ट है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों की ऐसी प्रगति ने अन्य पिछड़ी जातियों के अंदर तीव्र अभिलाषाएं जगा दीं। अब तक इन अभिलाषाओं को पूरा करने में वे विफल ही रहे।
हाल के वषोर्ं में वे सभी दरवाजों पर दस्तक दिये जा रहे हैं किन्तु उनके लिए कोई भी दरवाजा नहीं खुला। अभी हरियाणा के जून 1982 में हुए चुनावों को हमें निकटता से देखने का अवसर मिला। अन्य पिछड़ी जातियों के छोटे नेताओं ने टिकटों के लिए सभी दरवाजे खटखटाये किन्तु अंत में हमने यही पाया कि कुल 90 सीटों में से वे मात्रा एक टिकट कांग्रेस से और एक टिकट लोकदल से प्राप्त कर सके। आज हरियाणा विधानसभा में 90 सदस्यों में अन्य पिछड़ी जातियों का सिर्फ एक सदस्य है। कुछ स्थानों को छोड़ कर, खासकर दक्षिण में, हम उन्हें टिकट प्राप्त करने के लिए दर दर भटकते हुए और अलग अलग स्तरों पर जद्दोजेहद करते हुए किन्तु जायज हक पाने में विफल होते हुए पाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे हरियाणा में। दरअसल उनमें से अधिकांश तो वह सब पाने की अभिलाषा और लालसा करते हैं जिसे अनुसूचित जातियां/जनजातियां पहले ही हासिल कर चुकी हैं। पिछड़े वर्ग की 3700 से भी अधिक जातियों में से लगभग 1000 जातियां न केवल ऐसी लालसा कर रही हैं बल्कि अनुसूचित जाति/जनजाति की सूची में स्वयं को शामिल कराने के लिए संघर्ष कर रही हैं। इस प्रकार कुल मिला कर ओ.बी.सी. (अन्य पिछड़े वगोर्ं) का व्यवहार बर्ताव हमें इसी विश्वास पर ले जाता है कि वे तीव्र स्पृहा वाले महत्वाकांक्षी चमचे हैं।
(4) अल्पसंख्यक : मजबूर ;भ्मसचसमेद्ध चमचे
1971 की जनगणना के अनुसार धार्मिक अल्पसंख्यक भारत की कुल जनसंख्या का 17 प्रतिशत हैं। वे अंग्रेजों के भारत से जाने के पहले 15 अगस्त 1947 तक अपनी जनसंख्या के अनुसार अपनी भागीदारी हासिल करते रहे। उसके बाद वे पूरी तरह भारत की शासक जातियों की मेहरबानी और रहमोकरम पर निर्भर हैं। साम्प्रदायिक दंगों की बहुतायत ने मुसलमानों को पंजों के बल खड़ा कर रखा है। ईसाई लोग असहाय बने घिसट रहे हैं। सिक्ख सम्मानजनक अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं और बौद्ध लोग तो उठ खड़े होने में भी विफल हो चुके हैं। यह सब यही साबित करता है कि भारत में अल्पसंख्यक लाचार मजबूर चमचे हैं।
(ब) पार्टीवार चमचे
''कांग्रेस का दूसरा दुष्कृत्य है कांग्रेसी अछूतों को दलीय अनुशासन में जकड़ना। वे कांग्रेस कार्यकारिणी के चंगुल में नियंत्रिात हैं। वे ऐसा कोई प्रश्न नहीं पूछ सकते जो इसे (कांग्रेस) पसंद न हो। वे ऐसा कोई प्रस्ताव भी पेश नहीं कर सकते जिसकी यह (कांग्रेस) अनुमति न दे। वे ऐसा कोई विधेयक नहीं ला सकते जिस पर इसे (कांग्रेस) आपत्ति हो। अपनी इच्छा और विवेक से वे वोट नहीं दे सकते और अपनी भावनाओं को वे अभिव्यक्त तक नहीं कर सकते। वे यहां मूक जानवरों की भांति हांके जाते हैं। विधायिका में उनके प्रतिनिधित्व को प्राप्त कराने का एक उद्देश्य अछूत लोगों को अपनी परेशानियां और शिकायतें उठाने योग्य बनाना तथा उनके साथ होने वाली ज्यादतियों को दूर कराने के लिए सक्षम बनाना था। कांग्रेस ने ऐसा होना सफलतापूर्वक तथा प्रभावी रूप से रोक दिया है।
''इस दुखद और लम्बी कहानी के पटाक्षेप के लिए कांग्रेस ने पूना पैक्ट का रस तो स्वयं चूस लिया और बचा खुचा छिलका छूंछ अछूतों के मुंह पर फेंक दिया।'' ᄉडॉ.बी.आर. आम्बेडकर
अनुसूचित जातीय सांसदों/विधायकों की बेबसी का ऐसा वर्णन डॉ. आम्बेडकर ने अपनी विख्यात पुस्तक ÷कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया?' में बखूबी किया है। ऐसा हाल 1945 में था। उसके बाद के वषोर्ं में व्यापक पैमाने पर और भी बदतर स्थिति के हम साक्षी हैं। उस समय उच्च जातीय हिन्दुओं की सिर्फ एक ही पार्टी थी जो ऐसा व्यवहार करती थी और अनुसूचित जातियों में चमचे उत्पन्न करती थी। लेकिन आज तो राष्ट्रीय स्तर की ऐसी सात और प्रांतीय स्तर की अनेक पार्टियां हैं जो न सिर्फ अनुसूचित जातियों में बल्कि भारत की सभी पीड़ित शोषित जातियों में चमचे पैदा करती हैं। आज उच्च जाति की ये सभी पार्टियां रस पी पी कर बचे खुचे छिलके पच्चासी प्रतिशत पीड़ित शोषित समुदायों के मुंह पर फेंक रही हैं।
इस प्रकार इन पार्टीवार चमचों ने हमारी स्थिति को और भी खराब बना डाला है। जो लोग इस समस्या से जूझने के इच्छुक हैं वे अपने सामने मौजूद बृहत्तर समस्या के इस पहलू को नजर अंदाज नहीं कर सकते हैं।
(स) अबोध या अज्ञानी चमचे ;प्हदवतंदज ब्ींउबीेंद्ध
पीड़ित भारतीय, विशेषकर दलित वर्ग लगभग पूरे भारत में अन्याय के खिलाफ संघर्ष करते रहे। अधिकतर संघर्ष स्थानीय और क्षेत्राीय बने रहे। यदि देश के आकार और जनसंख्या को दिमाग में रखें तो हम कह सकते हैं कि वे संघर्ष लगभग अलग थलग से चलाये जाते रहे, इतने अलग थलग कि वे गुटीय संघर्ष जैसे दिखते हैं। इन गुटीय या समूह संघषोर्ं में लोग सिर्फ अपने गुट के संघर्ष के बारे में जानते थे जबकि अन्य स्थानों पर अपने ही भाइयों द्वारा चलाये गये अन्य संघषोर्ं के बारे में वे अनभिज्ञ ही बने रहे। दलितों की इस अक्षमता की इस तथ्य से अच्छी तरह कल्पना की जा सकती है कि दलित वगोर्ं का बहुत बड़ा हिस्सा उन्हीं दलित वगोर्ं के हित में चलाये गये डॉ. आम्बेडकर के आजीवन संघर्ष से पूर्णतः अनभिज्ञ बना रहा। आज भी अनुसूचित जाति के पचास प्रतिशत लोग डॉ. आम्बेडकर के जीवन और कायोर्ं से बिल्कुल अपरिचित हैं।
अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वगोर्ं के ऐसे व्यापक अज्ञान का उच्च जातीय हिन्दुओं द्वारा भरपूर शोषण किया गया। उनके अज्ञान तथा अन्य कमजोरियों का फायदा उठा कर उच्च जातीय हिन्दू बड़ी आसानी से उनके बीच चमचे पैदा कर सकते थे। इस किस्म के चमचों को अज्ञानी चमचों की संज्ञा दी जा सकती है। ये अज्ञानी चमचे डॉ. आम्बेडकर के जीवनकाल में उनके लिए बहुत बड़ा सिरदर्द थे। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ÷कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया?' में डॉ. आम्बेडकर ने इसके कुछ उदाहरण दिये हैं। अज्ञानी अछूतों का ऐसा ही एक उदाहरण नीचे दिया जा रहा हैᄉ
14-4-45 के फ्री प्रेस जर्नल (एक अखबार) के अनुसार, राय बहादुर मेहरचंद खन्ना नामक एक व्यक्ति ने पेशावर में 12 अप्रैल 1945 को दलित वर्ग संघ के तत्वावधान में हुई अछूतों की सभा में यह कहा, बताया जाता है;
''महात्मा गांधी आपके सर्वश्रेष्ठ मित्रा हैं जिन्होंने आपके लिए आमरण अनशन तक का आश्रय लिया और पूना समझौता किया जिसके अंतर्गत आपको मताधिकार सम्पन्न बनाया गया तथा लोकल बोडोर्ं और विधायिका में प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। मैं जानता हूं कि आप में से कुछ लोग डॉ. आम्बेडकर के पीछे भाग रहे हैं जो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की उत्पत्ति मात्रा है और अंग्रेजी हुकूमत के हाथों को मजबूत करने के लिए आपका इस्तेमाल करता है ताकि भारत विभाजित हो जाय और सत्ता पर अंग्रेज लोग बरकरार बने रहें। मैं आपसे आपके ही हित में अपील करता हूं कि आप स्वयंभू नेताओं और अपने सच्चे मित्राों के फर्क को पहचानें।''
दलित वगोर्ं के ऐसे अज्ञान के कारण उच्च जातीय हिन्दू उन्हें बड़ी आसानी से बहका सकते थे। वे बड़े विश्वसनीय तरीके से उन्हें समझा सकते थे कि उनके अधिकारों को हड़पने वाला और कोई नहीं बल्कि उनका मसीहा ही है। और इस तरह दलित वगोर्ं के बहुत बड़े जनसमुदाय को बहकाया जा सकता था और उन्हीं में से अज्ञानी चमचे बनाये जा सकते थे।
(द) ज्ञानी चमचे या आम्बेडकरवादी चमचे ;म्दसपहीजमदमक व्त् ।उइमकांतपजम ब्ींउबीेंद्ध
अभी हमने अज्ञानी जनसमुदाय और उनमें से चमचे कैसे बनाये जा सकते थे इस पर गौर किया। किन्तु चमचा युग का सबसे अधिक त्राासदीपूर्ण भाग प्रबुद्ध चमचे अथवा आम्बेडकरवादी चमचे हैं। स्वयं डॉ. आम्बेडकर ने इंगित किया था कि अछूतों के संघर्ष में एक ओर स्वयं उनकी भूमिका और दूसरी ओर गांधी जी की भूमिका के बारे में अज्ञानी जनता को कैसे बहका दिया गया था। हम अज्ञानी जनसाधारण के आचरण व्यवहार को तो फिर भी समझ सकते हैं किन्तु प्रबुद्ध लोगों के आचरण का क्या किया जाय, खासकर स्वयं बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर द्वारा ज्ञानी ध्यानी बनाये गये लोगों के आचरण का। इन प्रबुद्ध लोगों को तो गांधी जी और डॉ. आम्बेडकर द्वारा निभायी गयी भिन्न भिन्न भूमिकाओं के बारे में जरूर ही जानना चाहिए।
हम यह जान कर दंग रह गये कि इन प्रबुद्ध चमचों ने लगभग एक वर्ष पहले से 24 सितम्बर 1982 को पूना पैक्ट की स्वर्ण जयंती मनाने के लिए पूना में एक समिति का गठन किया। एक वर्ष पूर्व अग्रिम रूप से बनायी गयी प्रारम्भिक समिति में भारतीय रिपब्लिकन पार्टी (आर. पी. आई.) के महामंत्राी, दलित पैंथर्स के पदाधिकारी और डॉ. आम्बेडकर की प्रबुद्ध बिरादरी के कुछ वरिष्ठ अधिकारी सम्मिलित थे। अब, गांधी जी और डॉ. आम्बेडकर की पूना पैक्ट किये जाने तक की भूमिकाओं को, पेशावर के अपने अज्ञानी भाइयों से भिन्न रूप से, अच्छी तरह जानने समझने के बाद तो पूना के प्रबुद्ध लोगों को पूना समझौते की स्वर्ण जयंती मनाने का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए था। किन्तु वे आम्बेडकरवादी चमचे न सिर्फ स्वर्ण जंयती के बारे में सोच रहे थे बल्कि करीब एक साल पहले से उसकी तैयारी में बड़े जोशोखरोश से जुटे हुए थे। और इससे भी गयी गुजरी बात तो यह हुई कि जिन्होेंने श्री आर.आर.भोले के नेतृत्व में बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर की सलाह पर 1946 में पूना पैक्ट की भर्त्सना निन्दा की थी वे भी स्वर्ण जयंती मनाने के अवसर के लिए स्वयं को तैयार कर रहे थे।
सिर्फ इसी बात को ध्यान में रख कर नहीं बल्कि उनके सर्वतोमुखी आचरण और विगत कई वषोर्ं से चंद टुकड़ों के लिए पिट्ठूगीरी में लिप्त रहने को ध्यान में रख कर भी हमने इस किस्म के चमचों को प्रबुद्ध (ज्ञानी) चमचों अथवा आम्बेडकरवादी चमचों का नाम देना तय किया है। उनकी पिट्ठूगीरी के परिणामस्वरूप होने वाले दुष्प्रभावों को हमने पृथक अध्याय में वर्णित किया है।
(ई) चमचों के चमचे
वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिाक ढांचे की राजनैतिक अपरिहार्यताओं ने भारत की शासक जातियों को भारतीय पीड़ित शोषित समुदायों के बीच चमचे पैदा करने के लिए बाध्य कर दिया। इस प्रकार राजनैतिक गतिविधियों के विभिन्न स्तरों पर हम चमचों की बहुतायत देखते हैं।
इन राजनैतिक चमचों की कीमत इस बात से आंकी जाती है कि उनकी अपनी जाति या समुदाय में कितनी पैठ है। बड़े और उ+ंचे स्तर पर सक्रिय चमचे बड़े मामलों की व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकते हैं। इसीलिए उन्हें शासक जातियों की वफादारी से और पूरी सेवा करने के लिए स्वयं अपने चमचे बनाने की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के शिक्षित नौकरीयाफ्ता लोगों की निरंतर बढ़ती संख्या ऐसे चमचे पैदा करने के लिए उपजाउ+ जमीन प्रदान करती है। शिक्षित नौकरीयाफ्ता लोगों के इस वर्ग में से चालाक व्यक्ति राजनैतिक चमचों से नाजायज पक्षपात और फायदा लेने के लिए उनकी पिट्ठूगीरी करने पर तत्पर रहते हैं। समय गुजरने के साथ साथ ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। ऐसे पिट्ठुओं के वर्ग को चमचों का चमचा कहा जा सकता है।
(ऐ) चमचे विदेशों में
चूंकि भारत में पीड़ित भारतीयों का कोई स्वतंत्रा आंदोलन नहीं है इसलिए विगत वर्षों के दुलारे और चहेते चमचे नीचे पड़े हुए हैं। भारत में चमचों के इस निचले ग्राफ ने 1980 में हुए संसदीय और विधानसभा चुनावों के बाद निम्नतम बिन्दु को छू लिया। भारत में चहेते चमचों के इस निम्नस्तर को विदेशों में रहने वाले कई अवसरवादी अछूतों ने चमचों की कमी होना समझा।
इस खाली जगह को भरने के लिए ही जैसे तमाम स्वार्थी और मौकापरस्त अछूत भारत की ओर दौड़ पड़े। अमेरिका से ऐसे ही एक काबिल महाशय स्वयं को शासक पार्टी के एक चमचे के रूप में फिट कराने के लिए दिल्ली मंें और उसके इर्दगिर्द घृणित प्रयास करते देखे गये। भारत में अपने लम्बे प्रवास के दौरान उनका मोहभंग हो गया और वे न्यूयार्क की कांग्रेस (इ) का सदस्य बनने के लिए वापस अमेरिका लौट गये। ऐसे लगभग सभी स्वार्थी अछूतों को मोहभंग के बाद अपने विदेशी मुल्कों की ओर वापस लौट जाना पड़ा। मैंने ऐसे असफल प्रयासों को उल्लेख करने के लिए केवल इसलिए चुना है ताकि यह स्मरण कराया जा सके कि सौंपी गयी भूमिका निभाने के लिए तत्पर कुछ चमचे विदेशों में भी छिपे हुए हैं। जब और जैसे ही भारतीय पीड़ितों का स्वतंत्रा आंदोलन भारत में मजबूत होगा तब वे पुनः खुले रूप में बाहर आ जायेंगे।

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साभार तद्भव दलित विशेषांक http://tadbhav.com/dalit_issue/chamcha_yug.html#chamcha

झूठी आजादी - गुरु प्रसाद मदन


झूठी आजादी 
गुरु प्रसाद मदन

15 अगस्त 1947 को भारत की धरती से अंग्रेजों का राज्य समाप्त हो गया। गोरे अपने इंग्लैण्ड वापस चले गये। देश पर अपने ही देशवासियों का शासन हो गया। चारों ओर आजादी का जश्न मनाया गया। जगह जगह रोशनियां की गयीं। स्थान स्थान पर मिठाइयां बांटी गयीं। छोटे बड़े जलसे किये गये। कहने का तात्पर्य खुशियां ही खुशियां। यह सब किस लिए? इसलिए कि अब भारतवासी परतंत्राता की बेड़ियों से मुक्त हो गये, लोग आजाद हो गये। सदियों बाद उन्हें आजादी मिली। किन्तु ऐसा लगता है कि यह सब सपना काफूर हो गया। क्योंकि गांव में, कस्बों में, शहरों में लोग यह कहते मिलते हैं कि इससे तो अंग्रेज ही अच्छे थे।
लोग समझते थे कि शोषक सरकार (विदेशी सरकार) चली गयी। अब तो चारों ओर आजादी ही आजादी है, और लोग सुखी होंगे। धनधान्य से सम्पन्न होंगे। बेकारी मिटेगी। गरीबी हटेगी एवं विषमता दूर होगी। भेदभाव की खाईं पटेगी, समानता आयेगी, सामाजिक समानता मिलेगीᄉ इस परिकल्पना से देश का आम आदमी खुशी से झूम उठा था।
किन्तु 15 अगस्त 1947 की पहली खुशी क्या लोगों के चेहरों पर दिखायी पड़ती है? प्रतिवर्ष जब भी 15 अगस्त आता है तो क्या देश के लोगों में वही खुशी की लहर दौड़ती दिखती है? क्यों लोग उतने ही उत्साह से इस आजादी के जश्न को मनाते हुए हमें दिखाई नहीं पड़ते हैं? क्या बड़े बड़े जलसे होते दिखते हैं? सच्चे हृदय से यदि उन प्रश्नों के उत्तर खोजे जाये तो हमें उनका उत्तर न में ही मिलता है तो फिर प्रश्न उठता है किᄉ
आखिर ऐसा क्यों ? क्यों लोग इस आजादी के उत्सव से दूर होते जा रहे हैं? लोगों में वह लगन और उत्साह क्यों नहीं उमड़ता हुआ दिखाई पड़ता है?
तब हमें लोगों के बीच जाकर खोजना पड़ता है कि उनके आजादी के सपने कहां तक पूरे हुए?
आसमान से टूटा खजूर में अटका

आजादी मिली है? हां मिली है। किनको? जिनको जरूरत थी उनको या जिन्हें अंग्रेजों के समय में भी आजादी हासिल थी उन्हें? आजादी क्या उन्हें मिली, जो गुलाम था तन से, गुलाम था मन से और गुलाम था धन से? या आजादी उन्हें मिली जो सशक्त था, बलशाली था, धन से ऐश्वर्यशाली था, केवल मानसिक तौर पर कभी उसके स्व को धक्का लगता था एवं वह वर्ग सोचता था कि वह मानसिक तौर पर स्वतंत्रा नहीं था। क्योंकि उसके उ+पर अंग्रेजी शासक था और वह उसे भी तोड़ने के लिए तिलमिला उठता था। यद्यपि ऐसा वर्ग अंग्रेजी शासन से साठगांठ करके दीन, हीन, कृषक जनसमुदाय का भरपूर आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक रूप से शोषण करता था।
जब आजादी की लहर उठी तो उसमें देश के हर वर्ग का व्यक्ति जूझने लगा। बहुजन समुदाय गरीब था, शोषित था, और पीड़ित था। वह मानसिक दासता से मुक्ति चाहता था। वह मुक्ति चाहता था आर्थिक असमानता से। वह मुक्ति चाहता था सामाजिक विषमता से। वह मुक्ति चाहता था धार्मिक शोषण की जंजीरों से। इसलिए वह मरे मन से नहीं, अपितु उत्साहित मन से इस स्वतंत्राता संग्राम में कूद पड़ा और परिणाम यह रहा कि अंग्रेज, जन आक्रोश से समक्ष अंततः हिल उठा। शोषक समझ गया कि अब अधिक दिन भारत को गुलाम नहीं बनाये रक्खा जा सकता। यद्यपि आजादी की इस निर्णायक लड़ाई में भारतीय समाज का शोषक वर्ग बराबर अंग्रेजों का साथ देता रहा। फिर भी वह उनकी आशा का दीप नहीं बना रह सका। अपने गोरे प्रभुओं के पैर नहीं जमा सका। क्योंकि जन जन की आंधी चल उठी थी।
मासूम बच्चों से लेकर बूढ़ों तक ने ललकार लगायी। सधवा से लेकर विधवा तक ने अपने खून की आहुति दी। इस महायज्ञ में बहनों ने भी होम किया। पत्नियों ने पतियों का बलिदान दिया। माताओं ने पुत्राों को हंसते हंसते बलिदान कर दिया। सबका त्याग, तपस्या, लगन और सबसे बड़ी बात, आजादी से सांस लेने की ललक ने, वह तूफान खड़ा किया, जिनके समक्ष अंग्रेजी शासन का झंडा हिल गया, और देश आजाद हो गया। खुशी, चारों ओर खुशी। अंग्रेजी शासन के आकाश से गिरने वाली स्वतंत्राता कहां आकर रुक गयी? यह एक अहम प्रश्न सबके मन में उठता है। क्या आजादी भारत के जन जन के मन को आंदोलित कर सकी? वह तो उन्हीं लोगों के बीच आकर रह गयी, जो अंग्रजी शासन में भी पूरे नहीं तो आधे हुकमरा थे। भारत का बहुजन आजादी को न तो उस समय जान पाया, जब वह मिली थी, न वह आज ही उसको समझ सका है। वह तो आज भी शोषण का शिकार है। बलात्कार, अत्याचार, मार ही उसके हिस्से में आयी है। इस स्थिति को देख कर कोई भी यह कह सकता है कि अभी आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक दासता का ही बोलबाला है। बहुजन अब भी गरीबी व भुखमरी का शिकार है। भारत का अल्प जन ही आजादी का सुख भोग रहा है। गरीब और गरीब हो रहा है और अमीर और भी अमीर। बरबस यह ध्वनि गूंज उठती है कि आजादी मिली तो सही किन्तु वह चंद लोगों को जो पहले से सुखी थे, सम्पन्न लोगों में आकर अटक गयी है। आसमान से गिर कर खजूर में अटक गयी है। यह सर्वमान्य आजादी तो नहीं है।
कहां है वह भारत?
इस देश की समृद्धि, वैभव के सम्बंध में कुछ तो नहीं कहना चाहिए किन्तु इतना ही काफी होगा कि यह देश सोने की चिड़िया कहलाता था। इसका क्या तात्पर्य है? क्या इस देश के पक्षी सोने के अंडे देते थे। इस देश की चिड़ियां सचमुच सोने की होती थीं या हैं? क्या सही अर्थों में इस देश की चिड़ियों का रंग ही सुनहरा था या है? नहीं। ऐसी बात नहीं कि भारत की चिड़ियां सोने के अंडे देती रही हों, और अब सोने के अंडे देने बंद कर दिये हों। इसका अर्थ है कि जिस समय भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था उस समय देश सुख समृद्धि के शिखर पर चढ़ा था। चारों ओर सुख ही सुख था। खुशियाली ही खुशियाली थी। देशवासी सुसंस्कृत, बलशाली, सुंदर, वैभवशाली, थे। किन्तु यह बरकरार नहीं रह सका। इनके जीवित उदाहरण पुरातात्विक खोजों से स्पष्ट होता है। मोहनजोदड़ों, भूहदंडों, लोथल आदि स्थल हैं, जो आर्यों के आक्रमण के पूर्व की समृद्धि के गीत आज भी खंडहरों से निकल कर गा रहे हैं। तत्कालीन शौर्यगाथाएं, देवासुर संग्रामों में असुरों के बड़े बड़े नगर राज्यों एवं उनके विशालप्रस्तर दुर्गों के वर्णन से स्पष्ट होती है। ऋग्वेदादि की रचनाओं के वर्णन प्रचुरता से पाये जाते हैं।
इस प्रकार धनधान्य एवं समृद्धि से भरा यह देश इतने गर्त में कैसे गिरा? क्या एकाएक यह निर्धन हो गया? दैवी विपदाएं आयीं? क्या विदेशी आक्रमण से यह सब नष्ट हो जाएगा? भारत की इस वैभवशालीनता, पर पहला हमला, बर्बर और जंगली शिकारी जाति घुमंती दस्तों का हुआ, जो कि अपने जानवरों के साथ नित्य नये घास के मैदानों की तलााश में इधर उधर झुंड में घूमते रहते थे। क्योंकि इनके अपने पशुओं के लिए चारे व भोजन की समस्या उठती रहती थी। किसी प्रकार यह घुमंतु दस्ता भारत के पश्चिमी उत्तरी दर्रों से जैसे ही घुसा और देखा कि इस देश की धरती इतनी धन्य धान्य से परिपूर्ण है उनका मन यहां पर ललचाया। सुख समृद्धि के सागर में हलचल मची। ज्वार भांटे आये। तूफान उठा। और उन आक्रमणकारी शिकारी झुंडों ने यहां के निवासियों को अपने छल बल भरे आक्रमणों से, न केवल परास्त किया, वरन उनके समृद्ध नगरों पर अधिकार करके उन्हें बेघर कर दिया। भटकने वाले आवासित हो गये और बसे हुए शांति प्रियजन निर्वासित होकर छितर गये। वह आदि भारत, जिसकी उन्नत सभ्यता आज जमीन खोद कर देखी जा रही है, कहां है? उसके बाद जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता रहा, उसके निर्माण में गरीबों, शोषितों, बहुजनों का योग था! उनकी श्रम साध्यता का प्रतीक था। वह भारत भी आज दिखायी नहीं पड़ता है। विज्ञान की प्रगति के गुणगान किये जाते हैं। शोषण की आग में जलने वालों की पीड़ाओं को नजर अंदाज करके भारत का शोषक वर्ग जश्न मनाता है। मानवता की, उस बड़े समाज की, जिसका खून पसीना अब भी बह बह कर उनके अभाव की नदी को प्रवाहित कर रहा है। क्या दशा है? क्या यही वह देश है जा जगतगुरु कहलाता था? क्या यह वही भारत है जिसके धार्मिक मिसनरी विशेष कर, बौद्ध भिक्षु हिमालय को लांघ कर, रेगिस्तान को फांद कर, अपने यश गौरव का झंडा फहराने, विश्व को मानवता का सबक पढ़ाने गये थे।
आज तो हम परोन्मुखी नजर आते हैं। अपने ही देश में अपने भाइयों को सता कर, उनका शोषण कर, अपने ऐश आराम को संकुचित से संकुचित रूप में उपभोग करने में संलग्न हैं।
बरबस हमारा मन कह उठता है कहां है वह भारत? जो सम्पन्न था समृद्ध था। कहां है वह देश जिसके गौरव चिह्न आज अन्य देशों में प्रकट हो रहे हैं? क्या हम अपने उस बिगत भारत को पुनः गौरवान्वित रूप में बना सकेंगे?

अंग्रेजों की जगह पर ?
भारत की दुर्दशा की कहानी का जो भी राज रहा उसमें विदेशियों की लूट काफी महत्वपूर्ण रही है। प्राचीन भारत की संस्कृति, समृद्धि का विशद वर्णन उन आक्रमणकारियों के ग्रंथों में भी मिलता है। इनमें प्रथमतः मध्य एशिया से आने वाली घुमंत्‌ जाति के टुकड़ों के आक्रमण है, जिनके झुुंडों ने एक साथ ही भारत में प्रवेश नहीं किया, अपितु कई वगोर्ं में बंट कर कई बार झुंड के रूप में आये। और इन बर्बर जाति के लुटेरों ने तो भारत की सरजमी को भरपूर रौंदा, लूटा, खसोटा साथ ही यहां की वैभवशाली शांतप्रिय जनता को छल बल नाना प्रयत्नों से ठगा और उनका राज्य भी छीना। इन लुटेरों ने यहां वास ही नहीं कर लिया वरन विजित बना कर यहां के मूल आदिवासियों को दास, दस्यु, राक्षस, असुर आदि नाना नामों से सम्बोधित किया और अपना प्रभुत्व कायम करके साम्राज्य स्थापित किया। इन आक्रमणकारियों के पूर्व की वैभवशाली संस्कृति सिन्धु घाटी की संस्कृति के नाम से जानी जाती है, जिसकी वैभवशालीनता का मुकाबला 18वीं, 19वीं शताब्दी का योरोप भी नहीं कर पा रहा था।
अपना शासन कायम कर लेने पर जिस सामाजिक एवं शासन पद्धति का प्रणयन इन आक्रमणकारियों ने किया वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इन विजेताओं ने एक ऐसी समाज व्यवस्था, जो विषमतामूलक थी, का निर्माण किया। शासन पद्धति ऐसी निर्मित की, कि जनता का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भी सहयोग नहीं रखा गया। और सम्पूर्ण जनता गुलाम बना कर रखी गयी।
भारत की दुर्दशा का अंत यहीं पर नहीं हुआ। इन आक्रमणकारियों को निमंत्रिात भी पहले आक्रमणकारियों के ही समाज के लोगों ने किया। इन नयी लुटेरी जातियों ने अपना साम्राज्य कायम किया, किन्तु शासन के बडे+ बड़े ओहदों पर उन्हीं को रखा जिनको इन्होंने हराया था। परिणामतः दो लुटेरी इकाइयों ने मिल कर भारत की आम जनता को पीसना व चूसना जारी रखा। धीरे धीरे तीसरे प्रकार के आक्रमणकारी भारत में आये थे जो व्यापारी बन कर आये और शनैः शनैः इन्होंने सम्पूर्ण भारत पर एकछत्रा राज्य कायम कर लिया। इस जाति का मुख्य केन्द्र तो इंग्लैण्ड रहा ही, साथ ही साथ इस कौम ने भी उन्हीं पहले वाले लुटेरों से साठगांठ कर ली। अंग्रेजों ने भारत को दो तरफ से लूटना प्रारम्भ किया। आर्थिक स्तर पर और सांस्कृतिक स्तर पर। भारत की सांस्कृतिक विरासत को धीरे धीरे समाप्त कर अंग्रेजी संस्कृति को स्थापित किया और भारत को लूट लूट कर इंग्लैण्ड भेज भेज कर खोखला कर दिया। देश भीतर भीतर गरीब होता चला गया। फलतः लोगों ने बगावत की और अंग्रेजों को भारत छोड़ कर अपने देश वापस चला जाना पड़ा, जनता ने खुली बगावत की। किन्तु यहां भी उन्हीं पहले वाले शासक समुदाय के हाथों राजे महाराजे महसूस करते रहे कि अंगे्रज उनका मालिक है। जनता दो प्रकार के शासकों से चूर हो रही थी। एक तो अंग्रेज शासक की गुलामी तले दूसरे देश के काले अंग्रेज शासक जो शासन पर थे, की गुलामी की जंजीरों के तले।
जब सम्पूर्ण भारत अंग्रेजी शासन के खिलाफ कमर कस कर सड़कों पर उतर आया तो उसने सोचा था कि दोनों प्रकार के अंग्रेजों से मुक्ति मिलेगी और सच्चे अथोर्ं में जनता की शासन में भागीदारी होगी। अंग्रेजी नौकर यह शह गये। नेतृत्व परिवर्तन हो गया। अब विलायत केन्द्र न होकर दिल्ली केन्द्र हो गया। उस शासन की कुर्सी पर अंग्रेज न होकर काले अंग्रेज रहे। इस परिवर्तन से देश को क्या मिला? भारत की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आम आदमी को सही आजादी नहीं मिली। पहले ही की तरह पूंजीवादी, शासनवादी, वर्णवादी शासन की उन्हीं कुर्सियों पर वही कायम रहे जो अंग्रेजों के समय रहे। अब तो और निरकुंश होकर निर्द्वन्द्व होकर शासन पर गये और पहले से उनकी सत्ता पूरब की ओर बढ़ गयी। धन दौलत एकत्रा करने की भूख बढ़ गयी। परिणामतः भ्रष्टाचार, कुनबापरस्ती, जातिवाद, वर्णवाद, पूंजीवाद, शोषणवाद का जहर समाज में फैल गया और देश को मरणासन्न बना दिया।
इस प्रकार भारत से अंग्रेज चले गये। उनकी गोरी चमड़ी वाले दिल्ली, लखनऊ, बम्बई, कलकत्ता आदि पर नहीं रहे, किन्तु शोषण की उनकी व्यवस्था उसी प्रकार बराबर रोज बरोज चली आ रही है। सत्ता परिवर्तन तो हुआ, राज्य परिवर्तन नहीं हुआ। सच्चे अथोर्ं में शासन जो जनता के हाथों में आना चाहिए था वह नहीं आया। अपितु उनके हाथ और बंध गये। अंग्रेज चले गये, उनकी राजपद्धति कायम रही।
रोग से मुक्ति नहीं
आजादी के दीवानों ने यह समझ कर कि गुलामी ही हमारी तनज्जुली का कारण थी, स्वराज्य स्थापना की थी, और अथक त्याग, अदम्य उत्साह एवं लगन के साथ इस गुलामी को दूर फेंक देना चाहते थे। साथ ही आजादी लोगों को मिले यह संकल्प लेकर अमिट बलिदान किया। सभी स्त्राी पुरुष पथ पर चले। अंग्रेजों के खिलाफ एक आक्रोश की लहर सारे देश में फैली और जनता जनार्दन एक नींद से जाग कर साथ देने के लिए आगे आये।
क्या अमीर क्या गरीब, क्या शहरवासी व गांववासी नये स्वराज्य की कल्पना मात्रा से ही उत्साहित थे। अंग्रेजों के खिलाफ एक निर्णायक युद्ध हुआ। दोनों मागोर्ं से लोगों ने युद्ध संचालित किया। कुछ क्रांतिकारी मार्ग की ओर अग्रसर थे। कुछ शांतिमय मार्ग के अनुयायी थे। अंग्रेजों ने भारत की जनता की भावना को समझा और जब उन्होंने यह समझ लिया कि भारतवासियों को अब गुलाम नहीं बनाये रक्खा जा सकता हैᄉ आजादी की भूख भारतवासियों को प्राणों से प्रिय हो गयी है, तब उन्होंने भारत से चले जाना ही उचित समझा और देश के शासन की बागडोर भारतीयों के हाथों में सौंप दी।
वह दिन भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिन था। रात से ही चारों ओर स्वराज्य रूपी खुशी के बादल उठ रहे थे। प्रसन्नचित्त लोग सड़कों पर नाच रहे थे। उल्लास का संचार था। जीवंत प्रवाह था। हर हृदय में आनंद ही आनंद, हर व्यक्ति आजादी की लहर में डूब उतरा रहा था।
गुलामी की जंजीर टूटी। स्वतंत्राता आयी। किन्तु यह भावना कुछ दिन बाद काफूर नजर आयी। लोगों का इस आजादी से विश्वास टूटता नजर आया। ग्रामवासी हो या शहरवासी हो, कुछ लोगों को छोड़ कर, आम आदमी यह सोचने लगा इस आजादी से तो गुलामी भली थी। आखिर वह व्यक्ति ऐसा क्यों सोचने लगा? उत्तर स्पष्ट है कि जिस आजादी की कल्पना उसने की थी वह नहीं आयी। आजादी जन जन तक नहीं पहुंची।
आजादी का वैभव एक ओर चंद लोगों में सिमट कर रह गया। आम जनता को आजादी का एक झोंका भी नहीं लगा। इसीलिए उनका विश्वास टूट चला। उसके धैर्य का बांध बंधा नहीं रह सका, और वह जनवाणी में फूट चला कि आजादी आसमान से टूटी तो किन्तु खजूर में अब अटक गयी। स्वराज नहीं स्वराज्य आया। विदेशी गया। परदेशी राज की जगह स्वदेशी राज कायम हो गया। किन्तु सच्चे अथोर्ं में स्वराज नहीं आया। समाज का भ्रम दूर हो गया। उसकी आंखें खुलीं तो वह देखता ही रह गया। इलाज हुआ। रोग बरकरार रहा। स्थिति यह आयी कि रोगी चलने की तैयारी करने लगा किन्तु रोग उसे दबाता रहा। आदमी जिसे दवा समझता रहा, उसके मौत की घंटी बन कर आयी। रोग अच्छा हो रहा है ऐसा वह समझता रहा किन्तु अब समझा कि जिसे रोग मुक्ति समझ रहा था, वह उसका दिवास्वप्न था, भ्रम था, रोगमुक्ति नहीं हुई किन्तु उसकी जीवन से मुक्ति अवश्य हो रही है। यह धारणा जन जन में भर रही है क्यों? इसलिए कि वह खजूर में अटका स्वराज उन तक नहीं पहुंच सका है?
दलितों के साथ धोखा
आजादी के पूर्व भारतीय दलितों ने सपना देखा था कि उन्हें भी आजादी मिलेगी। वे लोग भी दासता की जंजीरों से छुटकारा पा जाएंगे। किन्तु लगभग 4 दशकों की स्वतंत्राता के बाद भी। भारत के ऐतिहासिक पृष्ठों को पलट कर देखने पर यही मिलता है कि दलितों के साथ किये गये वायदे केवल उन्हें भुलावे में ही रखने के लिए किये थे। उनकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ होता रहा। सवणोर्ं शोषकों द्वारा उनके संवैधानिक अधिकारों के साथ बलात्कार होता रहा। और वे अत्याचारीगण ही सबसे अधिक शोर करते रहते हैं कि दलितों के लिए महानतम कार्य किये जा रहे हैं। देश विदेश में इतना व्यापक प्रचार किया गया कि दलितों के लिए यह किया जा रहा है, वह किया जा रहा है। इतना रुपया खर्च किया जायेगा। इस प्रचार रूपी जहर का प्रभाव शांत वातावरण में काफी गहराई तक होता गया, जिसने भारतीय समाज की खोखली दीवारों तक को हिला कर रख दिया। सरकारी या अर्ध सरकारी तंत्राों द्वारा इतना कुत्सित प्रचार किया गया कि अनुसूचित जाति/जनजाति पिछडे+ वर्ग के हित के लिए सरकार अमुक कार्य कर रही है, अमुक धनराशि खर्च कर रही है, अमुक व्यापार हेतु इतना खर्च कर रही है, उनके आवास हेतु अमुक योजना लागू की जा रही है। यद्यपि ऐसी योजनाएं केवल कागज तक ही सीमित रह जाती हैं, कभी भी कार्यरूप में परिणित नहीं होती हैं। किन्तु इस प्रचार से विद्वेषकारी भाव, समाज में पैदा होता चला गया। इसकी प्रतिक्रिया में आरक्षण विरोधी आंदोलन, सम्पूर्ण देश में प्रारम्भ किये जाने का षड्यंत्रा किया गया परिणामस्वरूप, सम्पूर्ण भारत गम्भीरता से गुजर रहा है। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। इसी प्रकार सरकार के दोनों कार्य दिखावटी रहे। कार्य तो कुछ किया नहीं गया सिर्फ पोस्टरबाजी, रेडियोबाजी एवं जोर जोर से झूठा प्रचार किया गया कि दलितों के लिए बहुत कुछ किया गया है और किया जा रहा है। जबकि असलियत यह है कि दलितों के हितों के लिए न के बराबर कार्य किया गया।
गांवों, शहरों, यत्रा, तत्रा सभी जगह दलित पिछड़े वर्ग की इतनी दयनीय स्थित है जो सोच के बाहर है। कोई बाहरी व्यक्ति सोच भी नहीं सकता कि इतने निचले स्तर का जीवन यापन करने का कानून व सामाजिक कानून तथा धार्मिक कानून अपने ही धर्मावलम्बी भाइयों/बंधुओं के साथ बरता जाने की शास्त्राीय मान्यता है। इनकी दशा आज भी गुलामी में बदतर है, पशुओं से बदतर जीवन इन दलितों का है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय में अखिल भारतीय घोषित कर्मचारी संघ बनाम भारत सरकार के वाद का निर्णय करते हुए माननीय जस्टिल कृष्णा अय्यर ने अपने निर्णय को जिन पंक्तियों से प्रारम्भ किया है वह एक हृदय विदारक सच्ची तस्वीर है। माननीय जस्टिस अपने निर्णय को प्रारम्भ करते हुए कहते हैं किᄉ श्ज्ीम ंइवसपजपवद वि ेसंअमतल ीें हवदम वद वित सवदह जपउमण् त्वउम ंइवसपेीमक ेसंअमतलए ।उमतपबं ंइवसपेीमक पजए ंदक ूम कपक पजए इनज वदसल जीम ूवतके ूमतम ंइवसपेीमक दवज जीम जीपदहण्च्च्
अर्थात ''दासता को समाप्त हुए युग बीत गया। रोम ने दासता समाप्त की, अमेरिका ने इसे समाप्त किया, हमने भी किया, किन्तु हमने केवल दासता शब्द मात्रा ही समाप्त किया, दासता नाम की चीज को नहीं।''
नौकरियों में आरक्षण रहते हुए किस प्रकार इन दलितों को भर्ती किया गया इसका खुलासा करते हुए माननीय जस्टिस अय्यर ने पुनः कहा कि निम्न तालिका से स्पष्ट होता है कि इन दलित एवं पिछड़े वर्ग की स्थिति, प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी की नौकरियों में सूक्ष्मदर्शीय यंत्रा के द्वारा देखी जाने वाली स्थित है। साथ ही क्लास तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी में भी इनकी स्थिति नगण्य है। सरकारी नौकरियों में इन दलितों को प्रथम श्रेणी एवं द्वितीय तथा तृतीय, चतुर्थ श्रेणी में किस प्रकार भरती किया उसका विवरण निम्न प्रकार हैᄉ
अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजाति का नौकरियों में भरा गया प्रतिशत

वर्ष प्रथम श्रेणी द्वितीय श्रेणी तृतीय श्रेणी चतुर्थ श्रेणी
1 2 3 4 5
एस.सी. एस.टी. एस.सी. एस.टी. एस.सी एस.टी. एस.सी. एस.टी.
1.1.70- 2.26. 0.40 3.84 0.37 9.27 1.47 18.09 3.59
1.1.71- 2.58 0.41 4.06 0.43 9.89 1.70 18.37 3.65
1.1.72- 2.99 0.50 5.13 0.44 9.77 1.72 18.61 3.82
1.1.73- 3.14 0.50 4.52 0.49 10.05 1.95 18.37 3.92
1.1.74- 3.25 0.57 4.49 0.49 10.33 2.13 18.53 3.84
1.1.75- 3.43 0.62 4.90 0.59 10.71 2.27 18.64 3.99
1.1.76- 3.46 0.68 4.51 0.74 11.31 2.51 18.75 3.93
4.1.77- 4.16 0.77 8.07 0.77 11.84 2.78 19.07 4.35
1.1.78- 4.05 0.85 6.44 0.88 12.22 2.86 19.13 4.60
1.1.79- 4.75 0.94 7.33 1.03 12.55 3.11 19.32 5.12
उपर्युक्त तालिका माननीय सर्वोच्च न्यायालय में माननीय न्यायमूर्ति जस्टिस अय्यर ने अपने उपरोक्त मुकदमे को निर्णति करते हुए प्रस्तुत की है इससे स्पष्ट रूप से जाहिर होता है कि जो भी सीटें अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित हो गयी थीं, उन्हें ईमानदारी से नहीं भरा गया और उसकी जगहें अन्य आरक्षित लोगों से भरी गयीं। उ+परी तालिका के देखने से पता चलता है कि सन्‌ 1970 में जो प्रतिशत इन वगोर्ं का था उसमें 10 वषोर्ं के बाद भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। जो 19170 में अनुसूचित जाति के लोगों का प्रतिशत 2.26 और 0.40 था वह 1979 में 4.75, 0.94 रहा। कहां है वह रिजर्वेशन? कहां है राष्ट्र के सभी नागरिकों को उन्नति का समान अवसर प्रदान करने वालों की जमात? क्या इतने बड़े अन्याय के विरुद्ध आंदोलन करने की उनकी भीतरी आवाज नहीं उठती? क्या उनके अंदर का मानवीय हृदय मर गया? क्या उनमें संवेदना समाप्त हो गयी? यदि नहीं तो वे लोग कहां रह रहे हैं? इससे यही स्पष्ट है कि लोगों की नीयत साफ नहीं है। उनके मस्तिष्क अभी भी संकीर्ण हैं।
सरकारी नौकरियों के आरक्षण की स्पष्ट तस्वीर देखी है। अब शिक्षा के क्षेत्रा में देखें कि कितना न्याय इन जातियों के साथ किया गया। हम केवल गांधी जी के देश गुजरात के अहमदाबाद स्थित बी.जे. मेडिकल कालेज के आंकड़े उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करना चाहते हैं जो निम्नलिखित हैंᄉ
(1) सन्‌ 1974 से 1979 तक स्नातकोत्तर चिकित्सा में
क्रम सं. अनु. जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के कितने सवर्ण प्रतिशत सवर्ण प्रतिशत अनुजा. जन
827 57 770 92 प्रतिशत 8 प्रतिशत
(2) चिकित्सा प्राध्यापक, सहयोगी प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक
प्राध्यापकों की कुल संख्या एस.सी.एस.टी. सवर्ण सवर्ण प्रतिशत एस.सी./एस.टी.प्रतिशत
737 22 715 98 प्रतिशत 2 प्रतिशत
इन उदाहरणों के उपरांत उत्तर प्रदेश के इंजीनियरिंग विभाग का एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूंगा उससे भी स्पष्ट होगा कि कितना न्याय इस दलित वर्ग के साथ किया गयाᄉ
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा प्रकाशित सूचना के अनुसार सिंचाई विभाग में 1.1.80 तक अभियंता अधिकारियों का प्रतिनिधित्व निम्न प्रकार हैᄉ
अनुसूचित जातियों एवं अनु. जन जाति अधिकारियों
का प्रतिनिधित्व
ैब् ैज्
आरक्षित वास्तविक प्रतिशत
पद नियुक्ति आरक्षित वास्तविक प्रतिशत
क्र.सं. श्रेणी कुल संख्या पद नियुक्ति
(1) प्रथम 662 119 6 0.9 13 ᄉ ᄉ
(2) द्वितीय 2468 445 39 16 49 3 102
योग कुल 3 30 564 45 ᄉ 62 3 ᄉ
द्वितीय तालिका
सिंचाई विभाग में महवार नियुक्ति का विवरण
क्रम सं. पद पदों की संख्या ैब्ध्ैज् प्रतिनिधित्व
1 प्रमुख अभियंता 1 शून्य
2 प्रमुख अभियंता 22 शून्य
3 अधिशाषी अभियंता 136 शून्य
4 अधिशाषी अभियंता 24 शून्य
अᄉप्रशासनिक पद
बᄉअधिशाषी अभियंता 608 दृदृ 21 कृषक अधिषाशी
पद अभियन्ता 120 प्रभारी सहायक अभियंता
5 सहायक अभियंता 2339 27 1.15 प्रतिशत
योग 3130 48 1.53 प्रतिशत

अधोलिखित आंकड़े लगभग सही है।
विभिन्न प्रदेशों में पूर्ण किये गये आरक्षित स्थानों का प्रतिशत
ैजंजम ब्सें प् ब्सें प्प् ब्सें प्प्प् ब्सें प्ट
आंध्र 3-80 3-00 8-00 12-00
गुजरात 1-48 3-47 8-75 70-70 हरियाणा 3.50 3-20 8-40 27-50
कर्नाटक 4-70 4-60 7-60 17-20 केरल 2-34 3-76 6-17 13-40 मध्य प्रदेश 0-93 1-97 7-00 12-30 महाराष्ट्र 4-60 5-90 12-70 24-70 उड़ीसा 1-00 5-96 7-70 17-80 पंजाब 7-21 12-30 12-13 37-00 राजस्थान 8-60 10-86 11-20 21-80 तमिलनाडु 4-00 3-31 11-00 ᄉ
उत्तर प्रदेश 4-10 3-40 3-40 16-40 बंगाल 1-35 2-00 3-07 11-70
कर्मचारियों की संख्या (अ.जा.अ.ज.जा. पिछड़ी जाति अ. से. की
ओबरा विद्युत गृह संख्या प्रतिशत सहित)
वर्गों का कार्यरत अनुसूचित जाति अनुसूचित ज. जा. पिछडे+ वर्ग अन्य वर्ग
वर्गीकरण संख्या सं. प्र. सं. प्र. सं. प्र. सं. प्र.
प्रथम 99 4 4-04 6 6-06 7 7-07 82 82-83
द्वितीय 022 21 6-52 30 9-31 26 8-07 255 23-50
तृतीय 3640 246 6-76 30-93 1125 30-92 351 9-92 1902 48-53
चतुर्थ 2189 423 19-32 16-07 930 42-48 190 8-62 632 70-47
टोटल 6-50 694 11-13 19 0-31 2019 33-98 584 9-49 27-92 45-09

नेतृत्व किसका?
समाज के लोगों के सामने यह प्रश्न बार बार उठता है कि आखिर इस मुक्ति का आंदोलन के नेतृत्व कौन करेगा। प्रश्न इतना ही नहीं है कि नेतृत्व कौन करेगा? बल्कि प्रश्न सच्चे नेतृत्व का है?
1. नेतृत्व उनके द्वारा जो स्वयं शोषक समाज के हैं।
2. नेतृत्व उनके द्वारा जो स्वतः शोषित/गुलाम समाज के हैं।
यहीं एक प्रश्न और उठता है कि आखिर सच्चा नेतृत्व कौन दे सकेगा या जो अब तक इस प्रकार के आंदोलन को नेतृत्व देते रहे हैं, उनमें कौन सबको नेतृत्व देते रहे?
नेतृत्व निम्न प्रकारᄉ
1. शोषक समाज का
2. शोषित समाज का
3. शोषक जो शोषितों का हितचिन्तक
4. शोषित जो शोषितों का हितचिन्तक
5. शोषितों का अहित चाहता हो।
समाज में दो प्रकार के लोग हैंᄉ
1. समृद्ध 2. जिनके पास कुछ भी नहीं है।
पहले वर्ग के पास उन्नति के सभी साधन हैं। भौतिक साधन भी हैं। आर्थिक समृद्धि भी उन्हीं के पास है। दुनिया की तमाम सारी उत्पादकता के स्रोत पर उन्हीं का एकाधिकार है। आधिपत्य है। उनको यह भी भय नहीं है कि वे कभी इन वैभवशाली, समृद्धिश्षाली व्यवस्था से विपरीत भी किये जा सकते हैं? इसलिए कि ऐसे समाज ने एक ही ओर से नहीं अपितु चतुर्दिक ऐसी घेराबंदी कर रखी है कि वह सुरक्षित रहता है समृद्धिशाली बना रहता है। नहीं अपितु और समृद्धिशाली होता चला आ रहा है। उस समाज ने इस प्रकार की योजनाएं क्रियान्वित कर रखी हैं जिनसे शोषण से पीड़ित व्यक्ति प्रकाश की एक किरण न देख सके और किसी भी प्रकार का विद्रोह न कर सके।
लेकिन उनकी यह समृद्धि तभी तक है जब तक समाज का दूसरा वर्ग जिसके पास कुछ भी नहीं है, बरकरार है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब तक वंचित समाज है तब तक इस समृद्धिशाली समाज का अस्तित्व बना रहेगा। जगह जगह इन्हीं शोषित वंचितों को अधिकारयुक्त करने के आंदोलन चल रहे हैं या यूं कहा जाये कि चलाये जा रहे हैं। प्रश्न इतना ही महत्वपूर्ण नहीं है कि यह आंदोलन चलाये जा रहे हैं अपितु प्रश्न तो सच्चे नेतृत्व का है? गलत दिशा पर ले चलने वाला कमांडर अपनी सेना को दुर्दिन भोगने के लिए भटका सकता है।
शोषितों, वंचितों के आंदोलन का नेतृत्व यदि शोषक समाज से आया वर्ग करता है तो वह सुधारात्मक होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है, जब भी कभी इन वंचितों में अपनी गुलामी से छुटकारा पाने की अकुलाहट हुई, तभी शोषक वर्ग से कोई न कोई व्यक्ति इनमें सुधार पैदा करने की बात का आंदोलन चला देता रहा है। ये समाज सुधारक कहला रहे हैं। हमें इनसे कोई ऐतराज नहीं है। अपितु हमारे अध्ययन का क्षेत्रा तो इस कसौटी पर है कि क्या ऐसे समाज सुधारकों के आंदोलन से दलित शोषक वंचितों के आत्मसम्मान प्राप्ति के आंदोलन में कुछ लाभदायक हो सका? यदि हम बारीकी से देखें तो उत्तर सकारात्मक नहीं मिलता है। नकारात्मक ही पाते हैं। हां, सकारात्मक उत्तर उस समाज के लोगों के लिए मिलता है जो स्वतः शोषण करने में उद्धत रहा है। दूसरी तरफ बड़ी ही खूबी के साथ वंचितों की मुक्ति को लेकर अपनी जिज्ञासा भी दब गयी और इन्हीं समाज सुधारकों के भूलभुलैयों में भटक गये। इसके क्या कारण थे? कारण स्पष्ट हैं कि ऐसे समाज सुधारकों के पास शोषक समाज का उन्मुक्त, 1. संगठित समर्थन, 2. प्रचार प्रचार की अधिकता 3. साधन की प्रचुरता थी।
एक दूसरे प्रकार का नेतृत्व हैᄉशोषक समाज का नेतृत्व। शोषण करने वाला समाज सोचता है जिसका वह शोषण करता चला आ रहा है उसके हित के लिए कुछ किया जाये, और करता तो वह कुछ भी नहीं है अपितु समाज में इतना झूठा शोरगुल व प्रचार करता है कि वह उस शोषित समाज के लिए यह कर रहा है, वह कर रहा है। वह केवल फर्जी व नुमाइशी ही होता है। क्रियात्मक कुछ भी नहीं होता है। ऐसे नेतृत्व के लोग, शोषितों में क्रांति के बीज अंकुरित न हो जाय, इसकी पूर्णरूपेण व्यवस्था करते रहे। उनको शोषक वर्ग हित साधन की चिन्ता रहती है। ये केवल मुंहजबानी दयालुता दिखलाता है जिसे हम लिप्स्टिक सम्पर्क कह सकते हैं।
एक ऐसा भी नेतृत्व वर्ग है जो शासक समाज का है, और शोषकों के हितचिन्तन का प्रभावी कार्यक्रम रखता है और साथ ही साथ शोषितों का अहित चाहता है। इन लोगों के हाथों नेतृत्व कभी भी सकारात्मकᄉ वंचितों के पक्ष में नहीं होगा। वह तो शोषण करने वालों के हित में होगा।
चौथे प्रकार के नेतृत्व का प्रश्न सीधे शोषित दलित वंचित समाज से जुड़ा हुआ है। वह होता तो शोषित समाज से ही है किन्तु उसका वैचारिक धरातल अपना कुछ भी नही होता है। वह तो मात्रा नुमाइशी ढांचा होता है। इसके पीछे दूसरों की सोची हुई उसकी योजनान्वित, योजना होती है। यह तो मात्रा माउथ स्पीकर होता है। पहले से टेप किये विचार ही वह प्रचारित करता है। हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि वह शोषक समाज का पिछलग्गू होता है, और शोषित समाज को गुमराह करने के लिए होता है। यद्यपि वह अपना समाज हित अहित नहीं समझ पाता है। शोषणकर्ताओं के हाथों की कठपुतली मात्रा होता है। आज प्रत्येक पार्टी ने कुछ ऐसा ही कठपुतली नेतृत्व पैदा कर रखा है। ये शोषितों को उसी शोषणी व्यवस्था में फंसाये रखने के लिए चारे का काम करते हैं। ये चमचा कहलाते हैं।
पांचवे प्रकार का नेतृत्व, शोषित समाज से सम्बंधित, यह भुक्तभोगी होता है। वह सच्चे अथोर्ं में शोषण की तकलीफों को स्वतः झेलता होता है। गुलामी के कष्टों को, अभाव की कड़क को, तिरस्कार की कटुता व कैसे लेपन का भुक्तभोगी है। यही नेतृत्व दलितों के हित का होगा तो क्या यह पूर्ण नेतृत्व है, कहा जा सकता है?
छठा और अंतिम वर्ग उनका है जो भुक्तभोगी तो हैं ही साथ ही साथ समस्त शोषित समाज की आजादी की भावना रखते हैं। योजनाएं रखते हैं। चिन्तन रखते हैं, क्रियाशील हैं। और उनके मार्ग का एक ही आदर्श बिन्दु होता है शोषणमुक्त समाज, वर्ण विहीन वर्ग विहीन समाज की स्थापना। यही नेतृत्व उभर रहा है। दलितों, शोषितों, वंचितों के मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व सही माने में यही वर्ग करेगा। 85 प्रतिशत जनता अपना भला बुरा समझने लगी है। उनको जगाने का काम प्रारम्भ हो गया है। इस नेतृत्व वर्ग का स्पष्ट कथन ही नहीं प्रयास चल रहा है कि सच्चे मायने में समता स्वतंत्राता समानता एवं भातृत्व की नींव पर आधारित समाज का निर्माण हो, तभी देश उन्नति कर सकेगा। और यह तभी सम्भव है जबकि सही आजादी के पाने के इस आंदोलन की अगुवाई सही वर्ग के हाथों में होगी।
असली आजादी कोई रोक नहीं सकता
विषमता की गुलामी की जंजीर तोड़ फेंकने के लिए समाज उठ खड़ा हो गया है। विश्व के कोने कोने में विषमता की जंजीरों को तोड़ देने के लिए मन मचल उठा है। चंचल हो उठा है। स्वतंत्राता प्र्राप्ति की भावना तरुणाई पर आ रही है। इसी मुक्ति भावना ने ही संसार के बड़े बड़े साम्राज्य की सीमाएं तोड़ कर धराशाई कर दीं। उनके फौलादी हाथों ने साम्राज्यवादी किले की बड़ी बड़ी दीवारों की एक एक ईंट गिरा कर रख दी है, फूटी साम्राज्यवादी दीवालें दिखाई पड़ रही हैं। उन पर अनवरत आजादी के हथौड़े पड़ रहे हैं। लाखों लोग जूझ रहे हैं। उनका उत्साह उछालें मार रहा है। भावनाएं उद्धत हैं। संकल्प सुदृढ़ है। कार्य अनवरत गति से चल रहा है। चक्षुओं में स्वतंत्राता की प्रकाश किरणें दिख रही हैं। इसलिए बिना थके हारे वे स्वतंत्राता के युद्ध में युद्धरत हैं।
बडे+ बड़े साम्राज्यों को धराशायी इन्हीं वंचितों की फौलादी शक्ति ने किया। कभी न डूबने वाले सूरज वाला अंग्रेजी साम्राज्य धूलधूसिरित हो गया है। छोटे बड़े राज्य समाप्त हो गये हैं जो बचे हैं वह जन आंदोलनों से टूट रहे हैं। जमींदार समाप्त हो रहे हैं और स्वतंत्राता का प्रवाह आगे बढ़ता ही जा रहा है।
वंचित शोषित मजदूर अपने अधिकार समझने लगा है। अभी तक यह अपना कर्तव्य ही समझता था। वह समझता था कि मालिकों की सेवा ही उनका धर्म है ! अपने को मिटा कर मालिक को समृद्धिशाली बनाना उसकी नियति है। यह निराशा के गर्त में डूब गया था। भारत की किरण उसे दिख नहीं रही थी। हाड़ मांस गला कर अपना सब कुछ निछावर करके निर्माण कर रहा था। वह भी अपने लिए नहीं अपितु अपने स्वामी वर्ग के लिए। इसे वह पवित्रा कर्तव्य मान बैठा था। ईश्वरवाद, भाग्यवाद वर्णवाद, वर्गवाद, पूंजीवाद, राज्यवाद, सभी के कष्ट पाना उसने अपने जीवन का अंग मान कर अंगीकृत ही नहीं अपितु अपने रोम रोम में समाहित कर लिया था। अपने को पूर्णतया भूल चुका था। विस्मृति के गर्त में गिरा चुका था।
विश्व के उसी वर्ग में जीवन प्रवाह की धारा बह चली है। उसके सामने से अंधकार का आवरण हटता नजर आ रहा है। भारत में यह प्रवाह गतिमान हो चला है।
अत्तदीपो भव
अपनी आजादी लाने के लिए दूसरों की ओर ताकना छोड़ देना पड़ेगा। जो लोग यह समझते हैं कि सच्ची आजादी कहीं उ+पर से टूट कर धरती पर आयेगी, और वे उसका सुख भोग करेंगे, यह पूर्णतया भ्रम है। जो लोग इस प्रकार का दिखावा कर रहे हैं कि वे दलितों के लिए सच्ची आजादी दिलाने का प्रयत्न कर रहे हैं वे मूलतः शोषक समाज के ही हैं। वे सच्चे हृदय से नहीं चाहते हैं कि शोषित समुदाय सच्चे अथोर्र्ं में आजाद हो जावे। शोषणमुक्त हो जाये। वे तो चाहते हैं कि शोषितों की जमात किसी भी प्रकार कम न हो, ताकि उनको अपनी दादागिरी, नेतागिरी व मालिकीगिरी दिखाने का अवसर मिलता रहे।
किन्तु आज का दलित शोषित समाज उनकी करतूतों को समझ रहा है और बहुत ही तेजी के साथ अपने कंधे पर रखे गुलामी के जुये को फेक देने के लिए प्रयासरत ही नहीं हैं अपितु तड़प रहा है।
दलितों को भी यह समझना चाहिए कि उनकी अशिक्षा, अविद्या, गरीबी के बंधन को दूसरा कोई तोड़ने वाला नहीं है। दलित समाज को स्वतः अपने पुरुषार्थ का भरोसा करके उठना होगा। संगठित होकर गुलाम बनाये रखने वाली समस्त शक्तियों को चकनाचूर करना पड़ेगा। तभी तो वह सच्ची आजादी प्राप्त कर सकता है।
कब तक सरकारी सहायता की नाव पर बैठ कर दुखों के सागर को पार करने की ख्वाहिश रखते, क्या दुखों के महान सागर को पार नहीं किया जा सकता है? ऐसी धारणा हृदय में भी नहीं लानी चाहिए। सागर की अतल गहराइयों को चीर सुख के धरातल पर ले जाने वाले जहाज का निर्माण दलितों को स्वतः करना होगा। तभी वे अपने इस दुख के विशालतम सागर को विजित कर सकते हैं।
पराये पुरुषार्थ की आशा को छोड़ कर, अपनी कमर कस कर, आने वाली मार्ग की बाधाओं की परवाह किये बिना आगे दलितों का कारवां बढ़ चला है।
चतुर्दिक शोर हो रहा है कि दलितों के उत्थान में सम्पूर्ण सरकारी तंत्रा से लेकर नेता तंत्रा तक इनकी ही भालाई व उत्थान के लिए उद्धत और प्रयत्नशील है। सरकार, सरकारी तंत्रा, विभिन्न राजनैतिक पार्टियां व उनमें शीर्षस्थ, मूर्धन्य नेतृत्व वर्ग की एक ही चिन्ता है कि दलितों का उत्थान कैसे हो? तात्पर्य है कि सभी दलित उत्थान के लिए बेचारे पतले होते जा रहे हैं। यह चिन्ता इस सीमा तक सता रही है कि उन्हें हर समय दलित ही दलित दिखाई पड़ते हैं? चाहे आर्थिक मसला हो चाहे सामाजिक मसला जहां कहीं भी दलितों ने थोड़ी करवट बदली, सम्पूर्ण राष्ट्र को इनकी चिन्ता सताने लगती है। ऐसा भ्रम अखबार वाले भी फैलाने से नहीं चूकते हैं। आखिर ये हैं कौन? लिखने वाले कौन हैं? चिल्लपों मचाने वाले कौन हैं? तथा व्यापक प्रचार करने वाले कौन हैं? अखबारों के मालिक कौन हैं? ये वे ही सभी लोग हैं जो शोषकों की जमात से सम्बद्ध ही नहीं उसी शोषक खून से पले हैं। उनकी अभिरुचि क्यों कर दलित आजादी की ओर हो सकती है? उत्तर है स्वार्थ सिद्धि।
जब कभी कोई दलित या दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा आडम्बरी वर्णव्यवस्था से मुक्ति पाने हेतु तथाकथित ईश्वर व वर्णव्यवस्था की गुलामी का जुवां तोड़ कर स्वतंत्रा खड़ा हो जाना चाहता है तो जबरन धर्मांतरण व साम्प्रदायिकता का ढोंग कह कर दबाने का प्रयत्न ही नहीं किया जाता है, बल्कि एड़ी चोटी का पसीना एक कर दिया जाता है। ये छिपे दुश्मन बहुत ही खतरनाक हैं, दलितों की आजादी के।
समाज के लिए अति आवश्यक हो गया है कि दूसरों की आस व सांस का सहारा छोड़ कर, तंद्रा को तोड़ कर, प्रभाव को त्याग कर, एक ही मार्ग अपनाना होगा और वह है डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर का मार्गᄉ ÷अत्तदीपो भव' का मार्गᄉ अर्थात अपना दीपक आप बनो। 
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साभार: तद्भव दलित विशेषांक http://tadbhav.com/dalit_issue/jhuti_azadi.html#jhuti 

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