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Sunday, 14 October 2012

14 अक्तूबर: दीक्षा दिवस पर विशेष - एस आर दारापुरी

आज दीक्षा दिवस है। इस दिन डॉ आंबेडकर ने 5 लाख अनुयायियों के साथ नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी और धम्म चक्र को पुनः प्रचालित किया था। यह महान अशोक के बाद दुनिया में पहली ऐतिहासिक घटना थी जब किसी एक व्यक्ति के आह्वान पर इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने धर्म परिवर्तन किया हो।
वास्तव में यह धर्म परिवर्तन नहीं था क्योंकि यह तो अछूतों की बौद्ध धम्म में वापसी थी। डॉ आंबेडकर ने अपनी खोज पूर्ण पुस्तक " अछूत कौन और कैसे" में तथ्यों सहित यह सिद्ध किया है कि अछूतों के पूर्वज बौद्ध धम्म के अनुयायी थे और बाद में उन्हें बौद्ध धम्म और गोमाँस भक्षण न छोड़ने के अछूत बना कर दण्डित किया गया था। डॉ आंबेडकर द्वारा धम्म परिवर्तन से पहले और बाद में भी हिन्दुओं और कुछ दलित नेताओं द्वारा इस का यह कह कर विरोध किया गया था कि इस से दलितों का कोई भला होने वाला नहीं है। इस सम्बन्ध में बी एस पी के नेता कांशी राम की भी यही धारणा थी। बाबा साहेब के धम्म परिवर्तन आन्दोलन के फलस्वरूप 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में बौद्धों (नव बौद्धों ) की आबादी लगभग 80 लाख थी जो भारत की कुल आबादी का 0.8 प्रतिशत थी। अब 2011 की जनगणना में इसके काफी बढ जाने की उम्मीद है। जो लोग बाबा साहेब के बौद्ध धम्म में दलितों की वापसी आन्दोलन का विरोध करते थे उस के उतर में निम्नलिखित लेख से स्पष्ट है कि जिन दलितों ने बौद्ध धम्म अपनाया है उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा बहुत तरक्की की है जो कि बाबा साहेब के आन्दोलन की सार्थकता को सिद्ध करता है


नव बौद्ध हिन्दू दलितों से बहुत आगे
डॉ.  एस आर दारापुरी

डॉ. बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर ने ३१ मई , १९३६ को दादर (बम्बई ) में "धर्म परिवर्तन क्यों? " विषय पर बोलते हुए अपने विस्तृत भाषण में कहा था , " मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहता हूँ कि मनुष्य धर्म के लिए नहीं बल्कि धर्म मनुष्य के लिए है. अगर मनुष्यता की प्राप्ति करनी है तो धर्म परिवर्तन करो. समानता और सम्मान चाहिए तो धर्म परिवर्तन करो. स्वतंत्रता से जीविका उपार्जन करना चाहते हो धर्म परिवर्तन करो . अपने परिवार और कौम को सुखी बनाना चाहते हो तो धर्म परिवर्तन करो." इसी तरह १४ अक्टूबर, १९५६ को धर्म परिवर्तन करने के बाद बाबा साहेब ने कहा था, " आज मेरा नया जन्म हुआ है."

आईए अब देखा जाये कि बाबा साहेब ने धर्म परिवर्तन के जिन उद्देश्यों और संभावनाओं का ज़िकर किया था, उन की पूर्ती किस हद तक हुयी है और हो रही है. सब से पहले यह देखना उचित होगा कि बौद्ध धर्म परिवर्तन कि गति कैसी है. सन २००१ की जन गणना के अनुसार भारत में बौद्धों की जनसँख्या लगभग ८० लाख है जो कि कुल जन संख्या का लगभग ०.८ प्रतिशत है. इस में परम्परागत बौद्धों की जन संख्या बहुत ही कम है और यह हिन्दू दलितों में से धर्म परिवर्तन करके बने नव बौद्ध ही हैं. इस में सब से अधिक बौद्ध महाराष्ट्र में ५८.३८ लाख, कर्नाटक में ४.०० लाख और उत्तर प्रदेश में ३.०२ लाख हैं. सन १९९१ से सन २००१ की अवधि में बौद्धों की जनसँख्या में २४.५४% की वृद्धि हुयी है. जो कि बाकी सभी धर्मों में हुयी वृद्धि से अधिक है. इस से स्पष्ट है कि बौद्धों की जन संख्या में भारी मात्रा में वृद्धि हुयी है.

अब अगर नव बौद्धों में आये गुणात्मक परिवर्तन की तुलना हिदू दलितों से की जाये तो यह सिद्ध होता है कि नवबौद्ध हिन्दू दलितों से बहुत क्षेत्रों में बहुत आगे बढ़ गए हैं जिस से बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन के उद्धेश्यों की पूर्ती होने की पुष्टि होती है. अगर सन २००१ की जन गणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर नव बौद्धों की तुलना हिन्दू दलितों से की जाये तो नव बौद्ध निम्नलिखित क्षेत्रो में हिन्दू दलितों से बहुत आगे पाए जाते हैं:-

१. लिंग अनुपात :- नव बौद्धों में स्त्रियों और पुरुषों का अनुपात ९५३ प्रति हज़ार है जबकि हिन्दू दलितों में यह अनुपात केवल ९३६ ही है. इस से यह सिद्ध होता है कि नव बौद्धों में महिलायों की स्थिति हिन्दू दलितों से बहुत अच्छी है. नव बौद्धों में महिलायों का उच्च अनुपात बौद्ध धर्म में महिलायों के समानता के दर्जे के अनुसार ही है जबकि हिन्दू दलितों में महिलायों का अनुपात हिन्दू धर्म में महिलायों के निम्न दर्जे के अनुसार है. नव बौद्धों में महिलायों का यह अनुपात हिन्दुओं के ९३१, मुसलमानों के ९३६, सिक्खों के ८९३ और जैनियों के ९४० से भी अधिक है.

२. बच्चों (०-६ वर्ष तक ) का लिंग अनुपात:- उपरोक्त जन गणना के अनुसार नव बौद्धों में ०-६ वर्ष तक के बच्चों का लड़कियों और लड़कों का लिंग अनुपात ९४२ है जब कि हिन्दू दलितों में यह अनुपात ९३५ है. यहाँ भी लड़के और लड़कियों का लिंग अनुपात धर्म में उन के स्थान के अनुसार ही है. नव बौद्धों में यह अनुपात हिन्दुओं के ९३१, मुसलामानों के ९३६, सिक्खों के ८९३ और जैनियों के ९४० से भी ऊँचा है.

३. शिक्षा दर :- नव बौद्धों में शिक्षा दर ७२.७ % है जबकि हिन्दू दलितों में यह दर सिर्फ ५४.७ % है. नव बौद्धों का शिक्षा दर हिन्दुओं के ६५.१ % , मुसलमानों के ५९.१ % और सिक्खों के ६९.७ % से भी अधिक है. इस से स्पष्ट तौर से यह सिद्ध होता है कि बौद्ध धर्म में ज्ञान और शिक्षा को अधिक महत्त्व देने के कारण ही नव बौद्धों ने शिक्षा के क्षेत्र में काफी तरक्की की है जो कि हिन्दू दलितों कि अपेक्षा बहुत अधिक है.

४. महिलायों का शिक्षा दर:- नव बौद्धों में महिलायों का शिक्षा दर ६१.७ % है जब कि हिन्दू दलितों में यह दर केवल ५४.७ % ही है. नव बौद्धों में महिलायों का शिक्षा दर हिन्दू महिलायों के ५२.३ %, और मुसलमानों के ५०.१ % से भी अधिक है. इस से यह सिद्ध होता है कि नव बौद्धों में महिलायों की शिक्षा कि ओर अधिक ध्यान दिया जाता है.

५. कार्य सहभागिता दर:- नव बौद्धों में कार्य सहभागिता दर ४०.६ % है जब कि हिन्दू दलितों में यह दर ४०.४ % है. नव बौद्धों का कार्य सहभागिता दर हिन्दुओं के ४०.४, मुसलमानों के ३१.३, ईसाईयों के ३९.७, सिखों के ३७.७ और जैनियों के ३२.७ % से भी अधिक है. इस से यह सिद्ध होता है कि नव बौद्ध बाकी सभी वर्गों के मुकाबले में नियमित नौकरी करने वालों की श्रेणी में सब से आगे हैं जो कि उनकी उच्च शिक्षा दर के कारण ही संभव हो सका है. इस कारण वे हिन्दू दलितों से आर्थिक तौर पर भी अधिक संपन्न हैं.

उपरोक्त तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट है कि नव बौद्धों में लिंग अनुपात, शिक्षा दर, महिलायों का शिक्षा दर और कार्य सहभागिता की दर न केवल हिन्दू दलितों बल्कि हिन्दुओं, मुसलमानों, सिक्खों और जैनियों से भी आगे है. इस का मुख्य कारण उन का धर्म परिवर्तन करके मानसिक गुलामी से मुक्त हो कर प्रगतिशील होना ही है.
इस के अतिरिक्त अलग अलग शोध कर्ताओं द्वारा किये गए अध्ययनों में यह पाया आया है कि दलितों के जिन जिन परिवारों और उप जातियों ने डॉ. आंबेडकर और बौद्ध धर्म को अपनाया है उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा अधिक तरक्की की है. उन्होंने ने पुराने गंदे पेशे छोड़ कर नए साफ सुथरे पेशे अपनाये हैं. उन में पढाई की ओर अधिक झुकाव पैदा हुआ है. वे भाग्यवाद से मुक्त हो कर अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं. वे जातिगत हीन भावना से मुक्त हो कर अधिक स्वाभिमानी हो गए हैं. वे धर्म के नाम पर होने वाले आर्थिक शोषण से भी मुक्त हुए हैं और उन्होंने अपनी आर्थिक हालत सुधारी है. उनकी महिलायों और बच्चों की हालत हिन्दू दलितों से बहुत अच्छी है.

उपरोक्त संक्षिप्त विवेचन से यह सिद्ध होता है कि बौद्ध धर्म ही वास्तव में दलितों के कल्याण और मुक्ति का मार्ग है . नव बौद्धों ने थोड़े से समय में हिन्दू दलितों के मुकाबले में बहु तरक्की की है, उन की नव बौद्धों के रूप में एक नयी पहिचान बनी है. वे पहिले की अपेक्षा अधिक स्वाभिमानी और प्रगतिशील बने है. उन का दुनिया और धर्म के बारे नजरिया अधिक तार्किक और विज्ञानवादी बना है. नव बौद्धों में धर्म परिवर्तन के माध्यम से आये परिवर्तन और उन द्वारा की गयी प्रगति से हिन्दू दलितों को प्रेरणा लेनी चाहिए. उन को हिन्दू धर्म की मानसिक गुलामी से मुक्त हो कर नव बौद्धों की तरह आगे बढ़ना चाहिए. वे एक नयी पहिचान प्राप्त कर जातपात के नरक से बाहर निकल कर समानता और स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं. इस के साथ ही नव बौद्धों को भी अच्छे बौद्ध बन कर हिन्दू दलितों के सामने अच्छी उदाहरण पेश करनी चाहिए ताकि बाबा साहेब का भारत को बौद्धमय बनाने का सपना जल्दी से जल्दी साकार हो सके.

साभारः
एस आर दारापुरी
https://www.facebook.com/srdarapuri/posts/10151293277366554

Friday, 24 August 2012

Lit-Again Paths

Ambedkar’s Buddhism is a radical, rational reading of the traditional for our times
                                                                                                                    -CHRISTOPHER QUEEN
Ambedkar at his Dhamma Deeksha, 1956


Young Bhim Ambedkar met the Buddha for the first time at a party in Bombay. As the only untouchable student at Elphinstone High School, Ambedkar caused a stir when he passed his matriculation exam in 1907. A graduation party was organised by Krishna Arjun ‘Dada’ Keluskar, author, activist and principal of nearby Wilson High School. Keluskar had seen Ambedkar reading alone in the Churni Road Garden and finally asked him who he was. The boy, born of Mahar parents in an army camp, explained that upper-caste students at Elphinstone bullied him and that he retreated to the park with a book. The teacher recognised the boy’s promise and began helping him with his studies.
CHRISTOPHER QUEEN
At the party, Keluskar gave him a copy of his Life of the Buddha, written in Marathi for the Baroda Sayajirao Oriental Series. Sayajirao provided Ambedkar financial aid, employment and finally full support to attend Columbia University, where Ambedkar earned his first doctorate and discovered that a society could be organised around the notions of liberty, equality and fraternity.
More than the influence of early mentors and institutions, it was the life and teachings of the Buddha, first presented in Keluskar’s slim volume, that made the most impact. After the party, he recalled years later, “I...was greatly impressed and moved by it.” In the following decades, as he launched the untouchable civil rights movement, represented his community in the negotiations with the British and the Congress, served as the first law minister and principal draftsman of the Constitution, Ambedkar never forgot the vision of personal striving and social transformation he first encountered in the person of the Buddha.
Who was the Buddha that impressed Ambedkar so much? Ambedkar reflected deeply on this, and declared in 1950 that Buddhism was the only religion that could meet the requirements of the modern world—wisdom, compassion, and social justice. And we know that in the last, illness-ridden five years of his life, he devoted his remaining energy to the study of Buddhism.
The fruit of Ambedkar’s final labours is The Buddha and His Dhamma, a daring interpretation of traditional teachings. Venerated by ex-untouchables and millions practising ‘Navayana’ Buddhism, it tells the story of the earthly Buddha and summarises his teachings. This manifesto brings out the social teachings that Ambedkar believed were suppressed by misunderstanding and distortion. Gautama’s welcoming all to his new religious community is there. But so is Ambedkar’s critique of four famous items in the traditional presentation of Buddhism.
Ambedkar doubted that a 29-year-old prince would have abandoned his duties after seeing a sick person, an old person, a corpse and a sadhu. The Four Noble Truths “are a great stumbling block”, attributing all human suffering to desire and craving. Are the poor to be blamed for craving food? Traditional notions of karma and rebirth clearly pose a contradiction of the core teaching of no-self (anatta) and another justification for the caste system, in which low-birth results from bad behaviour in a past life—again blaming victims of social exploitation. Finally, should not the clergy serve society, or should they only study and meditate? These questions “must be decided not so much in the interest of doctrinal consistency but in the interest of the future of Buddhism”.
Ambedkar’s Buddha is based on meticulous study of the Pali record as well as scores of modern commentaries he collected. And this Buddha is a path-giver (marga-data), not a rescuer (moksha-data); he is all-compassionate (maha-karunika); and he is opposed to superstition and speculation. He is awakened by definition—rational, practical, and rooted in present realities. But he is also engaged—committed to social change and justice, and, if necessary, non-violent social revolution. This is the Buddha that has inspired a new generation of socially engaged Buddhists across the world.
Was this the Buddha young Bhim met at his graduation party? Or has the Buddha of old found new voices in a dangerous new world?

(Christopher Queen teaches Buddhism and Social Change and World Religions at Harvard University.)


Source:
http://www.outlookindia.com/article.aspx?281946

Monday, 11 July 2011

अछूत : वे कौन थे और अछूत कैसे बन गए ? - डॉ बी आर अम्बेडकर

डॉ बाबासाहेब द्वारा लिखित यह पुस्तक  अछूतों की उत्पत्ति , उनकी दुर्दशा , उनके सामाजिक बहिष्कार जैसे तमाम पहलुओं की व्याख्या करती है | मूल रूप से यह अंग्रेजी में लिखी गयी | यह पुस्तक अंग्रेजी में तो इन्टरनेट पर उपलब्ध है, लेकिन पिछले कुछ सालों से ढूढने पर भी हिंदी में यह पुस्तक कही नहीं मिली थी | लेकिन अब इस पुस्तक को हिंदी ने इन दो ब्लोगों "अछूत कौन थे" (http://whowereuntouchables.blogspot.com) और "Bitter things, but Real Talk" (http://jaisudhir.blogspot.com) पर पढ़ा जा सकता है |
यहाँ पर भी यह पुस्तक अलग-अलग अध्यायों की लिंक्स के साथ प्रस्तुत है | आशा है प्रयास पसंद आएगा |

अछूत : कौन और कैसे बने ?  
-डॉ बी आर अम्बेडकर
प्रस्तावना
भाग 1: तुलनात्मक सर्वेक्षण
अध्याय 1: गैर हिन्दुओं में छुआछूत
अध्याय 2 : हिन्दुओं में छुआछूत
भाग 2: आदतन समस्या
अध्याय 3: अछूत गाँव के बाहर क्यों रहते हैं?
अध्याय 4: क्या अछूत छितरे व्यक्ति हैं?
अध्याय 5 : क्या ऐसे समानान्तर मामले हैं?
अध्याय 6: छितरे लोगों की अलग बस्तियां अन्यत्र कैसे विलुप्त हो गयीं ?
भाग 3: अछूतों की उत्त्पति का पुराना सिद्धांत
अध्याय 7: छुआछूत की उत्पत्ति का आधार - नस्ल का अंतर
अध्याय 8: छुआछूत की व्यवसायजन्य उत्पत्ति
भाग 4: अछूतों की उत्पत्ति का नया सिद्धांत
अध्याय 9 : बौद्धों का अपमान - छुआछूत का मूलाधार
अध्याय 10 : गोमांस भक्षण - छुआछूत का मूलाधार
भाग 5: नए सिद्धांत और कुछ कठिन सवाल
अध्याय 11 : क्या हिन्दू कभी गोमांस नहीं खाते थे?
अध्याय 12 : गैर ब्राह्मणों ने गोमांस खाना क्यों छोड़ा ?
अध्याय 13 : ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?
अध्याय 14 : गोमांस भक्षण से छितरे व्यक्ति अछूत कैसे बने ?
भाग 6: छुआछूत और इसकी उत्पत्ति की तिथि
अध्याय 15 : अपवित्र और अछूत
अध्याय 16 : छितरे लोग अछूत कब बने?


इस हिंदी पुस्तक को यथासमय व यथा शीघ्र PDF के रूप में भी कम्पाइल करने का प्रयास करेंगे जिससे इसे डाउनलोड करके सहेजा जा सके | आपके सहयोग के लिए धन्यवाद ! 



Wednesday, 24 November 2010

क्या अम्बेडकर दलितों के मसीहा ही थे ?




एक बात जो लगभग हमारे सहजबोध (कामन सेन्स) का हिस्सा बन गयी है - जो डा अम्बेडकर के बारे में कही जाती है, कि वह ‘दलितों के मसीहा’ थे। दिलचस्प है कि समूचे राजनीतिक स्पेक्ट्रम में यह बात स्वीकार्य है। अपने आप को उनका सच्चा वारिस घोषित करनेवालों के लिए भी यह बात सुनकर कोई बेआरामी नहीं होती।


क्या उनका यह चित्रण पूरी तौर पर सही है ? या उनको दलितों का मसीहा कह देने से उनके जीवन के तमाम पक्ष छूट जाते हैं और उनकी एकांगी किस्म की छवि बनती है।





अगर उनके इस चित्रण को सही मान लें तो उनके लगभग चालीस साला राजनीतिक-सामाजिक जीवन के कई अहम पहलुओं पर चुप्पी साधनी पड़ती है। और यही बात स्वीकारनी पड़ती है कि मनु के विधान की स्वीकार्यतावाले हमारे समाज में - जिसने शूद्रों-अतिशूद्रों-स्त्रिायों की विशाल आबादी को तमाम मानवीय हकों से वंचित किया था - उन्होंने अतिशूद्रों के अधिकारों के लिए कुछ संघर्ष किया एवम कुछ रिआयतें हासिल कीं।


फिर इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन हो जाता है कि क्या वे स्त्रिायों के अधिकारों के लिए संघर्षरत नहीं रहे या क्या किसानों-मजदूरों की समस्या की ओर उनकी दृष्टि नहीं गयी, क्या जनता के आर्थिक सवालों से वह बेख़बर रहे या क्या वह शूद्रों-अतिशूद्रों का नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर करनेवाली जाति/जातियों के खिलाफ थे या उस मानसिकता के खिलाफ थे जिसने इस स्थिति का निर्माण किया था ? शिक्षा संस्थानों का जाल बिछाने के पीछे तथा अख़बार-पत्रा-पत्रिकाओं को शुरू करने के पीछे उनका क्या मकसद था ? और सबसे बढ़ कर क्या उन्होंने उपनिवेशवादियों के खिलाफ जारी राजनीतिक आन्दोलन की सीमा को उजागर नहीं किया जिसके लिए उन्हें जोखिम उठाना पड़ा।



एक गुलाम मुल्क में उपनिवेशवादियों के खिलाफ राजनीतिक आन्दोलनों के साथ एक सुविधा रहती हैं कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समूचे जनसमुदाय का उन्हें समर्थन प्राप्त रहता है लेकिन बाबासाहेब की अपनी जद्दोजहद का अच्छा खासा हिस्सा समाज की अपनी बीमारियों, परम्पराओं, संस्थाओं के खिलाफ, उपनिवेशवादियों के आगमन से पहले से चली आ रही उस सामाजिक-धार्मिक निज़ाम के खिलाफ था। उनके सामने खड़ी चुनौती को आसानी से समझा जा सकता है जहां उन्हें उन लोगों को भी निशाने पर लेना पड़ रहा था जो खुद साम्राज्यवाद से उत्पीड़ित थे या उसके विरोध में संघर्ष के लिए तैयार थे मगर जो खुद भारतीय समाज की उस मंज़िलनुमा बनावट के खिलाफ खडे़ होने के लिए तैयार नहीं थे। अपने एक आलेख में डा अम्बेडकर ने उच्चनीचअनुक्रम, शुद्धता एवम प्रदूषण पर टिकी भारतीय समाज रचना की तुलना उस बहुमंजिली इमारत से की थी जिसमें एक मंज़िल से दूसरी पर जाने के तमाम दरवाजे़ बिल्कुल बन्द थे। वे लोग जो जातिप्रथा को श्रम का विभाजन कह कर महिमामण्डित करते थे, उन्हें करारा जवाब देते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि ‘जातिप्रथा श्रम का नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है।’


उनके जीवन एवम संघर्ष को सरसरी निगाह से देखने पर पता चलता है कि तमाम शोषितों-उत्पीड़ितों के हालात के प्रति उनका गहरा सरोकार एवम उसको बदल डालने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। और अहम बात जो उनके यहां नज़र आती है वह है राजनीतिक-आर्थिक संघर्षों में या सामाजिक-सांस्कृतिक हलचलों के बीच उनके यहां किसी ‘चीन की दीवार’ की अनुपस्थिति। ( क्या यह कहना अनुचित होगा कि उत्तरअम्बेडकर आन्दोलन में इस सिलसिले का बनाये नहीं रखा जा सका)



उनके जीवन के सबसे पहले ऐतिहासिक संघर्ष को ही देखें जब 1927 में महाड के चवदार तालाब पर सत्याग्रह करने वह पहुंचते हैं (19-20 मार्च 2008) जिसके बारे में मराठी में हम कहते हैं कि जब ‘उन्होंने पानी में आग लगा दी।’ मालूम हो कि महाराष्ट्र के कोकण नामक इलाके के महाड नामक क्षेत्रा के सार्वजनिक तालाब पर हजारों की संख्या में दलितों ने अन्य तमाम समानविचारी लोगों डाॅ बाबासाहेब आम्बेडकर के नेतृत्व में एक सत्याग्रह किया था। यूं तो कहने के लिए यह महज पानी पीने का हक था लेकिन इसकी विशिष्टता इसी में निहित थी कि सदियों से उच्चनीचअनुक्रम पर टिके, प्रदूषण एवम शुद्धता पर आधारित समाज केे उत्पीड़ित जनों ने अपने विद्रोह का एक संगठित हुंकार भरा था।



इस अवसर पर आयोजित सम्मेलन के प्रस्ताव गौर करनेलायक हैं। प्रस्तुत सम्मेलन में कई सारे महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये गये। जंगल की जमीन दलितों को खेती के लिये दी जाय, उन्हें सरकारी नौकरियां मिलें, सरकार न केवल शिक्षा को अनिवार्य करे बल्कि 20 साल के छोटे लड़कों तथा 15 साल से छोटी लड़कियों की शादी पर भी पाबन्दी लगाये आदि विभिन्न आर्थिक सामाजिक मसलों पर प्रस्ताव मंजूर हुए । सरकार से अपील की गयी वह शराबबन्दी लागू करे तथा मरे हुए जानवरों का मांस खाने पर पाबंदी लगा दे । सम्मेलन में उच्चवर्णीयों से भी आवाहन किया कि वे अछूतों को उनके नागरिक अधिकार दिलाने में सहायता करें, उन्हें नौकरियां दें, अपने मरे हुए जानवरों को खुद दफनायें।



सत्याग्रह के दूसरे चरण में उन्होंनेे शुचिता तथा प्रदूषण के आधार पर उनके अपमान को जायज ठहराने वाले पवित्र कहलानेवाले मनुस्मृति नामक ग्रंथ को भी आग के हवाले किया था। (25 दिसम्बर 1927)



सम्मेलन के अपने शुरूआती वक्तव्य में बाबासाहेब ने प्रस्तुत सत्याग्रह परिषद का उद्देश्य स्पष्ट किया ‘‘ अन्य लोगों की तरह हमभी इन्सान है इस बात को साबित करने के लिए हम तालाब पर जाएंगे अर्थात यह सभा समता संग्राम की शुरूआत करने के लिए ही बुलायी गयी है । आज की इस सभा और 5 मई 1789 को फ्रांसीसी लोगों की क्रांतिकारी राष्ट्रीय सभा में बहुत समानताएं हैं । .. इस राष्ट्रीय सभा ने राजारानी को सूली पर चढ़ाया था, सम्पन्न तबकों के लिए जीना मुश्किल कर दिया था, उनकी सम्पत्ति जब्त की थी । 15 साल से ज्यादा समय तक समूचे यूरोप में इसने अराजकता पैदा की थी ऐसा इस पर आरोप लगता है। मेरे खयाल से ऐसे लोगों को इस सभा का वास्तविक निहितार्थ समझ नहीं आया।.. इसी सभा ने ‘जन्मजात मानवी अधिकारों को घोषणापत्रा जारी किया था.. इसने महज फ्रान्स में ही क्रान्ति को अंजाम नहीं दिया बल्कि समूची दुनिया में एक क्रांति को जनम दिया ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा‘‘ उन्होंने अपील की थी इस सभा को फ्रेंच राष्ट्रीय सभा का लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिए..‘‘ हिन्दुओं में व्याप्त वर्णव्यवस्था ने किस तरह विषमता और विघटन के बीज बोये हैं इस पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘ समानता के व्यवहार के बिना प्राकृतिक गुणों का विकास नहीं हो पाता उसी तरह समानता के व्यवहार के बिना इन गुणों का सही इस्तेमाल भी नहीं हो पाता। एक तरफ से देखें तो हिन्दु समाज में व्याप्त असमानता व्यक्ति का विकास रोक कर समाज को भी कुंठित करती है और दूसरी तरफ यही असमानता व्यक्ति में संचित शक्ति का समाज के लिए उचित इस्तेमाल नहीं होने देती।…‘सभी मानवों की जनम के साथ बराबरी की घोषणा करता हुआ मानवी हकों का एक ऐलाननामा भी सभा में जारी हुआ।



सभा में चार प्रस्ताव पारित किये गये जिसमें जातिभेद के कायम होने के चलते स्थापित विषमता की भत्र्सना की गयी तथा यहभी मांग की गयी कि धर्माधिकारी पद पर लोगों की तरफ से नियुक्ति हो। इसमें से दूसरा प्रस्ताव मनुस्मृतिदहन का था जिसे सहस्त्राबुद्धे नामक एक ब्राहमण जाति के सामाजिक कार्यकर्ता ने प्रस्तुत किया था । प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘‘शूद्र जाति को अपमानित करनेवाली उसकी प्रगति को रोकनेवाली उसके आत्मबल को नष्ट कर उसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को मजबूती देनेवाली मनुस्मृति के श्लोकों को देखते हुए … ऐसे जनद्रोही और इन्सानविरोधी ग्रंथ को हम आज आग के हवाले कर रहे हैं।’’



इस सत्याग्रह के अवसर महिलाओं को दिया गया उनका स्वतंत्रा उद्बोधन काफी चर्चित रहा है। मनुस्मृति दहन के बाद रात में स्त्रिायांे को अलग सम्बोधित करते हुए डा अम्बेडकर ने जोर देकर कहा था:



‘‘ परिवार की दिक्कतें स्त्राी एवम पुरूष दोनों मिला कर ही सुलझाते है और उसी तरह समाज की, दुनिया की कठिनाइयों को भी स्त्रिायों एवम पुरूषों को दोनों को मिला कर ही सुलझानी चाहिए। स्त्रिायां ही इस काम को बखूबी कर सकती हैं, इस पर मुझे पूरा यकीन है। इसके आगे आप को भी सभाओं एवम सम्मेलनों में आना चाहिए।आप ने हम पुरूषों को जन्म दिया है। आप के पेट से जन्म लेना आखिर अपराध क्यों माना जाता है और ब्राह्मण स्त्री के पेट से जन्म लेना पुण्य क्यों समझा जाता है ? .. स्त्रिायां गृहलक्ष्मी बनें यही हमें क्यों सोचना चाहिए, इसके आगे की मंजिल उन्हें क्यों नहीं पार करनी चाहिए ? ... ज्ञान और विद्या की आवश्यकता सिर्फ पुरूषों के लिए नहीं है वह स्त्रिायों के लिए भी उतनीही जरूरी है। इसलिए आनेवाली पीढ़ी को सुधारना हो तो आप को चाहिए कि बेटों के साथ बेटियों को भी शिक्षा दें।स्त्रियों को राजनीतिक-सामाजिक सक्रियताओं में उतारने की, उन्हें अधिकारों से लैस करने की चिन्ता हमें उनके समूचे जीवन में दिखती है।



अगर हम 50 के दशक में नेहरू मंत्रिमण्डल से उनके इस्तीफे पर गौर करें तो क्या वजह समझ में आती है। जहां वे इस बात के प्रति क्षुब्ध है कि अनुसूचित जातियों एवम जनजातियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के प्रति सरकार पर्याप्त गम्भीरता का परिचय नहीं दे रही हैं वहीं वे इस बात को विशेष तौर पर रेखांकित करते हैं कि उनके इस निर्णय लेने के पीछे ‘हिन्दु कोड बिल’ को लेकर नज़र आती सरकार की आनाकानी का मसला अहम था।आखिर क्या था ‘हिन्दु कोड बिल’ ? दरअसल हिन्दु कोड बिल के जरिये आपसी सम्बन्ध विच्छेद एवम जायदाद के मामले में हिन्दु महिलाओं को अधिकार दिए जा रहे थे। सभी जानते हैं कि उसके पहले हिन्दुओं में बहुपत्नीप्रथा कायम थी, यहां तक कि तलाक या सम्पत्ति के मामले में उन्हें कोई अधिकार नहीं प्राप्त थे। हिन्दु कोड बिल को लेकर डा अम्बेडकर को जो जद्दोजहद करनी पड़ी वह अपने आप में एक रोचक इतिहास है। स्त्रिायों को अधिकारसम्पन्न कर ‘हिन्दु संस्कृति एव परम्परा को ध्वस्त करने’ की कोशिश करने के लिए कई बार उनके घर पर प्रदर्शन भी हुए। इस बिल को न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध था बल्कि कांग्रेस के अन्दर मौजूद रूढिवादी/सनातनी तत्वों ने भी उनके इस कदम की लगातार मुखालिफत की थी जिसमें अग्रणी थे बाबू राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल आदि।नेहरू मंत्रिमण्डल से इस्तीफा सौंपते हुए प्रस्तुत वक्तव्य में उन्होंने लिखा था:



‘हिन्दु कोड बिल एक तरह से इस मुल्क की विधायिका द्वारा हाथ में लिया गया समाज सुधार का सबसे बड़ा कदम था। अतीत में हिन्दोस्तां की विधायिका द्वारा पारित किसी भी कानून से या भविष्य में पारित किए जा सकनेवाले किसी भी कानून से इसकी तुलना नहीं की जा सकती। वर्ग और वर्ग के बीच की गैरबराबरी, लिंगों के बीच की गैरबराबरी - जो हिन्दु समाज की आत्मा है - को अक्षुण्ण बनाये रखना तथा आर्थिक समस्याओं को लेकर एक के बाद एक विधेयक पारित करते रहना, एक तरह से संविधान का माखौल उड़ाना है और गोबर के ढेर पर महल खड़े करने जैसा है। मेरे लिए हिन्दु कोड का यही महत्व रहा है। और अपने मतभेदों के बावजूद इसी वजह से मैं मंत्रिमण्डल का सदस्य बना रहा।’



डा अम्बेडकर के जीवन और संघर्षों की व्यापकता जानना हों तो तीस का दशक कई मायनों में अहम दिखता है जिसमें वह सामाजिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर भी नयी जमीन तोड़ते प्रतीत होते हैं वहीं वह राजनीतिक-आर्थिक मसले पर भी एक अलग रास्ता अख्तियार करते नज़र आते हैं।

साभार :
http://jantakapaksh.blogspot.com/2010/04/blog-post_13.html

Sunday, 20 June 2010

डॉ० भीमराव अम्बेडकर और दलित चिन्तन की प्रतिबद्धता: परिवर्ती अम्बेडकरवाद या दलित नव जागरण युग [आलेख] - डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव


इसमें कोई शक नहीं कि वर्ण-व्यवस्था के माध्यम से परम्परावादियों ने एक प्रकार की निर्णायक संस्कृति और मनोवैज्ञानिक जीत हासिल कर ली है। शायद इसकी प्रतिक्रिया के कारण ही दलित चेतना पूर्णत: उभार पर है। दलित आन्दोलन/ संस्कृति साहित्य के प्रणेता डॉ. अम्बेडकर ने ठीक ही लिखा है- "हिन्दू धर्म मेरी बुद्धि में जँचता नहीं, स्वाभिमान को भाता नहीं। जो धर्म तुम्हें शिक्षा प्राप्त नहीं करने देता, उस धर्म में तुम क्यों रहते हो? जिस धर्म में मनुष्यता नहीं, वह धर्म उद्दण्डता की सजावट है।" डॉ. अम्बेडकर ने महसूस किया इस छुआछूत के विनाश के लिए अनिवार्य है कि जाति का विनाश हो। साथ ही वर्ण व्यवस्था जिस पर जातियाँ आधारित हैं, का विनाश हो। चूँकि जाति हिन्दू धर्म का प्राण है, अत: जब तक हिन्दू धर्म इसके वर्तमान रूप में प्रचलित है तब तक जाति प्रथा रहना स्वाभाविक है। हमारे यहाँ जाति सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक जीवन का मूल स्त्रोत है अर्थात् जाति सामाजिक संस्कारों एवं रिश्तों की सीमा तय करती है।1

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-


युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डा. वीरेन्द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद’ की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डा. वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

दलित संवेदनाओं को अपने जीवनकाल में निरन्तर भोगते रहने के कारण डॉ. अम्बेडकर का अनुभव प्रगाढ़ था। इसलिए आपने अपने सम्बोधन में बड़ी दृढ़ता से कहा था कि "हिन्दू धर्म में दलितों की उन्नति सम्भव नहीं है। मैं हिन्दू धर्म में मरूँगा नहीं। हिन्दू धर्म विषमतावादी है। हिन्दू धर्म अछूतों का धर्म नहीं। उच्चता कर्म से नहीं जन्म से है। हिन्दू समाज व्यवस्था मुर्दे के समान है। हिन्दू देवताओं के दर्शन से कोई लाभ नहीं है।" सामाजिक एकता का सिध्दान्त उनको बौद्ध धर्म के अन्दर ही मिल गया। यही कारण था कि उन्होंने अपने कई अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। उनका यह कदम हमेशा विवादास्पद ही रहा है। किन्तु यदि हम उनके धर्म परिवर्तन के पीछे की वास्तविक भावना को समझें तो हमें प्रतीत होता है कि इस धर्म परिवर्तन के पीछे उनका यह विश्वास था जो उन्हें सामाजिक एकता के आदर्श की ओर ले गया। इसका एक दूसरा पक्ष भी है। संभवत: उनको बौद्ध धर्म की महत्ता का अहसास न होता यदि वे पश्चिम के उदारवादी दृष्टिकोण के सम्पर्क में न आते। उन्होंने कई विदेशी समाजों का गहन अध्ययन किया था और इन समाजों की जो विशेषता उनको विशेष रूप से प्रिय थी, वह थी सामाजिक एकता। उनको यह अहसास हुआ कि भारतीय धर्म-दर्शनों में बुद्ध-दर्शन ही एक ऐसा दर्शन है जो सामाजिक एकता का आदर्श प्राप्त कर सकता है। जहाँ टैगोर ने आध्यात्मिक मानवतावाद का सिद्धान्त प्रचारित किया, नेहरू ने समाजवादी दृष्टिकोण को समझने-समझाने का प्रयास किया, वहीं डॉ. अम्बेडकर ने जातीय सन्दर्भ में पश्चिमी उदारवादी दृष्टिकोण की महत्ता को समझाने का प्रयत्न किया। उनकी इस भूमिका को उचित स्थान दिया जाना चाहिए।2

हमारे तथाकथित हिन्दू समाज की सनातनी व्यवस्था में भारतीय दीन-दलित समाज अज्ञानांधकार में तड़फड़ाने के साथ चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में पिसने के साथ दरिद्रता की आग में जल रहा था। इसके पीछे कारण यह था कि हमारे सिद्धान्त सदियों से ईश्वरकृत, अपौरुषेय एवं प्रश्नों से परे माने जाते रहे, क्योंकि इन सिद्धान्तों की जड़ें हमारे जेहन में इतनी गहरी कर दी गयी थीं, साथ ही इनकी व्याख्या ऐसी की गई थी जिनका कोई अकाट्य प्रमाण नहीं था। ऐसे मृतवत, अस्पृश्य दलित समाज में भगवान बुद्ध के पश्चात कई शताब्दियों तक कोई एक अकेला ऐसा सामाजिक चिंतक भारत में नहीं अवतरित हुआ जिसने इन तथाकथित सिद्धान्तों का खण्डन किया हो। हजारों वर्षों से शोषित, पीड़ित, दलित, अछूतपन, शासक-पोषक, सवर्ण वर्गों के जघन्य एवं अमानवीय शोषण, दमन, अन्याय के विरुद्ध छोटे-मोटे संघर्ष को संगठित रूप देने का कार्य सर्वप्रथम अद्भुत प्रतिभा, सराहनीय निष्ठा, न्यायशीलता, स्पष्टवादिता के धनी बाबा साहब युगपुरुष डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने किया। आप ज्ञान के भण्डार और दलितों एवं शोषितों के मसीहा बनकर भारतीय समाज में अवतरित हुए। आपने दलितों एवं शोषितों को समाज में सर ऊँचा कर बराबरी के साथ चलना सिखाया। आप ऐसे समाज की केवल कल्पना ही कर सकते हैं, जब हमारे पुरखों में से कुछ को इन्सान जैसी शक्ल-सूरत होने के बावजूद, उन्हें सवर्ण समाज इन्सान नहीं समझता था। ऐसे समाज के प्रति बाबा साहब ने स्वअस्तित्व की सामर्थ्य, अस्मिता एवं क्रांन्ति की आग जलाई जिससे सामाजिक न्याय प्राप्ति के लिए अनेक दलित-शोषित कार्यकर्ता आत्मबलिदान के लिए उनके साथ खड़े हो गये।3 
परम्परावादी व्यवस्था (वैदिक संस्कृति) के कारण हजारों वर्षों से कुचले गये समाज के लोग आज ''दलित'' संज्ञा से जाने जाते हैं और उनके विरोध का प्रमुख कारण वर्ण-धर्म है। कर्म श्रेष्ठ न होने पर भी जाति के नाम से श्रेष्ठ कहलाने वाला व्यक्ति या समाज अपने आप में एक धोखा है। विश्व की सभ्यता और संस्कृति में ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिलेगा कि व्यक्ति को एक बार स्पर्श होने से छूने वाला व्यक्ति अपवित्र हो जाए। भारत में अस्पृश्यता के इस जादुई सिद्धान्त का कोई तार्किक जवाब किसी समाजशास्त्री के पास अभी तक उपलब्ध नहीं है। यह अनूठा और बेमिसाल सिद्धान्त पूर्णतया षडयन्त्र और बेईमानी के अलावा कुछ नहीं दिखता है। जीवन की इन दग्ध एवं करुण स्थितियों से उबरने के लिये दलित साहित्य के माध्यम से दलित अपनी अस्मिता को पहचानने का प्रयास कर रहा है- दलित कौन है, उसकी स्थिति क्या थी? उसकी इस स्थिति के लिये कौन उत्तरदायी है, उनकी संस्कृति क्या थी? उसके पूर्वज कौन थे? यह चिन्तन ही दलित साहित्य के प्रमुख विषय हैं। दलित समुदाय के बहुजन (करोड़ों) लोग आर्य हिन्दुओं से सामाजिक न्याय की आशा लगाये हुए हैं, परन्तु धर्मान्धता और असमानता के पक्षधर ये लोग समानता के चिन्तन को ताक में रख देते हैं। आज देश में करोड़ों निर्धन, अनपढ़, बेरोजगार दलित व्यक्ति अपनी अस्मिता की तलाश में भटक रहे हैं। गिरिराज किशोर के शब्दों में कहें तो भारतीय समाज, खासतौर से जातीय हिन्दू समाज, जिसके कारण देश में दालित्य पनपा और आज भी अपने विकृत रूप में मौजूद है, विचित्र और परस्पर विरोधी मानसिकताओं का पुंज बनकर रह गया है। यह सब हजारों वर्षों से चले आ रहे मानसिक और मनोवैज्ञानिक अवरोधों का प्रतिफल है। ये मानसिक ग्रन्थियाँ ही विभिन्न स्तरों पर अपने को सही साबित करती हुई दालित्य को बढ़ाती ही नहीं गईं अपितु उसे अस्पृश्यता और दमन का शिकार भी बनाती गईं। इसी का फल था कि दलितों को भी यह समझाया गया कि दालित्य कर्मफल है।4 
संसार में ऐसा कोई देश नहीं होगा जो मानव-मानव में इतना भेद रखता हो। परन्तु भारत का दलित, वह शोषित मानव है जो पैदा हुआ तब भी दलित है, जिन्दा रहेगा तब भी दलित है और मरेगा तब भी दलित है। अर्थात् आज भी दलित समाज स्मृतियुग की परम्परा में जी रहा है। कुछ मामलों में आज भी अछूत अन्य सवर्ण समाज के समक्ष बैठ नहीं सकता। उसके बच्चों के साथ बराबरी में बैठकर पढ़ नहीं सकता। चाय पीने के लिये अछूतों के लिये अलग कप, गिलास की व्यवस्था है। अछूतों के नाई द्वारा बाल नहीं बनाए जाते हैं। सामूहिक उत्सव में ढ़ोल नहीं बजाने दिया जाता। पंचायत में बराबरी से नहीं बैठने दिया जाता। जातिवादी मोहल्लों में अछूतों को मकान किराये पर नहीं दिये जाते। अछूतों को बारात ले जाते समय बैण्ड-बाजों पर रोक लगा दी जाती है। घोड़ी पर नहीं बैठने दिया जाता। अछूतों के लिये शमषान भूमि पृथक से है। अछूतों को मद्रास में कुछ स्थानों पर दिन में खरीद-फरोख्त की इजाजत नहीं है। ये समस्त उदाहरण सम्पूर्ण भारत के राज्यों में व्याप्त दलित वेदनाओं एवं सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। परन्तु सामाजिक परिवर्तन के इस दौर में स्थितियाँ दलितों के पक्ष में भी जा रही हैं। राजनीति ने वर्तमान दौर में दलितों को असीमित अधिकार दिए हैं और दलितों को इससे काफी राहत भी मिली है परन्तु कभी-कभी सनातनी व्यवस्था के शिकार कुछ दलित आज भी हो जाते हैं।
वर्तमान समय में दलितों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उनकी जातीय अस्मिता एवं आर्थिक स्थिति को लेकर है। क्योंकि जगतगुरू से लेकर छोटे धार्मिक मठाधीशों तक किसी को भी इस बात की चिन्ता नहीं है कि दलितों को निरन्तर शोषण एवं उत्पीड़न से कैसे बचाया जा सकता है। समाज में उन्हें सम्मानजनक स्थिति में कैसे लाया जा सकता है। कुछ परम्परावादी दलित चिंतक साहित्यकार, समानता और भ्रातृत्व पर आधारित बौद्ध एवं अम्बेडकरवादी सिद्धान्त की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जो भारतीय संविधान की आत्मा भी है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि जैसे-जैसे अंग्रेजी शासन काल में अछूतों और शूद्रों के लिए शिक्षा के द्वारा खुलते गये, ये लोग शिक्षित होते गये। जहाँ एक ओर विज्ञान की चहुमुँखी तरक्की ने दुनिया को अपनी मुठ्ठी में समेट लिया है, वहीं शूद्रों द्वारा हिन्दू धर्म ग्रन्थों को अधिकाधिक रूप में पढ़ा जाने लगा है। स्वतंत्र भारत में संवैधानिक संरक्षण और प्रदत्त सुविधाओं, अपने अधिकारों को समझने और उन्हें पाने के कारण से परम्परावादियों के अनेक बन्धन शिथिल होते गये। वर्तमान में भी जो सनातनी (वैदिक) साहित्य उपलब्ध है, उसमें अभिजात्य एवं सवर्णवादी प्रवृत्तियों के लक्षण सर्वाधिक व्याप्त हैं। उसमें शासक और शोषित दोनों ही भावनाएं सर्वत्र नजर आती हैं।
परिवर्ती अम्बेडकरवाद या दलित नव जागरण युग:
अम्बेडकरवाद की द्वितीय मुक्ति शृंखला का आरम्भ सन् 1975 के बाद प्रारम्भ होता है। 1975 के बाद दलित चेतना की जो धारा विकसित हुई, वह इसलिये विशिष्ट है कि उसने हिन्दी जगत में अपनी पृथक और विशिष्ट पहचान बनायी। यह प्रयास अभिनव एवं महत्वपूर्ण है, क्योंकि अभी तक ऐसा प्रयास किसी युग में नहीं किया गया था। एक पृथक धारा के रूप में हिन्दी दलित साहित्य इसी युग में अस्तित्व में आया। यही नहीं बल्कि उसे परिभाषित भी इसी काल में किया गया। यह धारा समग्र रूप में अम्बेडकर-दर्शन से विकसत हुई और यह दर्शन ही उसका मूलाधार बना। इसमें कोई दो राय नहीं कि अम्बेडकर-दर्शन में दलित-मुक्ति की अवधारणा की अभिव्यंजना ही वर्तमान हिन्दी दलित साहित्य की प्रतिबद्धता है। इसने नये सौन्दर्यशास्त्र की स्थापना की जो स्वतंत्रता, समता और बन्धुत्व के सिद्धान्तों पर आधारित है। इस धारा ने अपने सौन्दर्यशास्त्र से हिन्दी मुख्यधारा के साहित्य का मूल्यांकन कर उसे काफी हद तक दलितों के लिये अप्रासंगिक साबित किया है। इसने प्रेमचन्द्र, निराला एवं अन्य रचनाकारों तक का पूर्नमूल्यांकन किया और उनकी कई रचनात्मक स्थापनाओं पर प्रश्नचिह्व भी लगाये। वर्तमान हिन्दी दलित साहित्य इस अर्थ में भी विशिष्ट है कि साहित्य की सभी विधाओं में उसका विकास हो रहा है। यद्यपि फूले और अम्बेडकर ने संस्थागत प्रयत्नों के माध्यम से दलितों के पक्ष-पोषण की बात की लेकिन सन्-70 के दशक के बाद कई संस्थायें सामने आती हैं, जिन्होंने अपने प्रयासों से दलितों के उत्थान पर कार्य किया। इस सन्दर्भ में दलित साहित्य प्रकाशन संस्था, अम्बेडकर मिशन, दलित आर्गनाइजेशन, राष्ट्रीय दलित संघ, दलित राइटर्स फोरम, दलित साहित्य मंच, लोक कल्याण संस्थान आदि के माध्यम से दलितों की स्थिति सुधारने के सन्दर्भ में अनेक कार्य किये गये! इन दलित संस्थाओं ने जिन दो महत्वपूर्ण पक्षों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया उनमें एक है दलितों की सामाजिक स्थिति में सुधार और दूसरा दलितों के लिए आरक्षण की माँग। इस सन्दर्भ में भारतीय संविधान में संशोधन का भी प्रावधान किया गया और संस्थाओं में समाचार पत्रों, लेखों और गोष्ठियों का भी सहारा लिया जिसके माध्यम से दलितों को जागरूक और एकत्रित करने का कार्य किया गया। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इन संस्थाओं ने दलित चिंतन को राजनैतिक स्वरूप भी प्रदान किया और समाज में एक विशेष वर्ग का नये सिरे से ध्रुवीकरण किया। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि वर्तमान-सामाजिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में दलित विमर्श चिंतन का एक प्रमुख हिस्सा बन चुका है।5 मौजूदा दलित साहित्यकारों ने दलित लेखन को स्थपित करने के लिये कड़ा संघर्ष किया। यह उनके संघर्षों का ही परिणाम है कि हिन्दी जगत और मीडिया ने एक शताब्दी की लम्बी उपेक्षा के बाद दलित साहित्य को स्वीकार किया और उसे अपने पत्रों एवं पत्रिकाओं में थोड़ा-थोड़ा स्थान दिया। लेकिन यह भी तब सम्भव हुआ, जब सामाजिक परिवर्तन की राजनीति ने नयी दलित चेतना विकसित की और उसका प्रभाव सम्पूर्ण संविधान पर पड़ा। इसलिए यह हिन्दी जगत की राजनैतिक विवशता भी है। इस मत से कुछ विद्वत दलित चिंतकों की असहमति हो सकती है, परन्तु सत्ता के बनते-बिगड़ते समीकरण भी दलित साहित्य को प्रभावित करते हैं, इस बात से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है। कुछ हद तक यह युग दलित पत्रकारिता के लिये भी जाना जायेगा, क्योंकि दलित साहित्य के साथ-साथ दलित पत्रकारिता का भी सशक्त विकास इस युग में हुआ है। दलित पत्रकारों में डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर, मोहन दास नैमिशराय, डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन', के.पी. सिंह, प्रेम कपाड़िया, मणिमाला, ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहर सिंह, बी.आर. बुद्धिप्रिय, सुरेश कानडे, डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव इत्यादि पत्रकारों ने दलित पत्रकारिता को प्रखर दलित प्रश्नों से जोड़कर विचारोत्तेजक और क्रांन्तिकारी बनाया है। इसलिये दलित चेतना के इस वर्तमान युग को दलित 'नवजागरण' युग का नाम भी दिया जा सकता है। 

साभार: साहित्य शिल्पी @ http://www.sahityashilpi.com/2009/12/blog-post_2416.html 

Saturday, 12 June 2010

दमित आन्दोलन को दी नई दिशा: डा० अम्बेडकर [आलेख] - राम शिवमूर्ति यादव

[साभार: साहित्य शिल्पी http://www.sahityashilpi.com/2009/04/blog-post_6453.html ]

डा0 भीमराव अम्बेडकर एक ऐसे युगपुरूष थे जिन्होंने समाज में पिछड़ों, दलितों और शोषितों की मूकता को आवाज दी। बचपन से ही डा0 अम्बेडकर ने जातिवाद की आड़ में फैलाए जा रहे जहर को महसूस किया और उस जहर को समाज से उखाड़ फेंकने की सोची। एक ऐसे समय में जब दलितों को देखते ही लोग अपवित्र हो जाने के भय से रास्ता बदल लेते थे, डा0 अम्बेडकर ने उस दौरान बैरिस्टरी पास कर तमाम आयोगों के सामने दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। वे गाँधी जी के ‘हरिजन’ शब्द से नफरत करते थे क्योंकि दलितों की स्थिति सुधारे बिना धर्म की चाशनी में उन्हें ईश्वर के बन्दे कहकर मूल समस्याओं की ओर से ध्यान मोड़ने का गाँधी जी का यह नापाक नुस्खा उन्हें कभी नहीं भाया। उन्होंने गाँधी जी के इस कदम पर सवाल भी उठाया कि- "सिर्फ अछूत या शूद्र या अवर्ण ही हरिजन हुए, अन्य वर्णों के लोग हरिजन क्यों नहीं हुए? क्या अछूत हरिजन घोषित करने से अछूत नहीं रहेगा? क्या मैला नहीं उठायेगा? क्या झाड़ू नहीं लगाएगा? क्या अन्य वर्ण वाले उसे गले लगा लेंगे? क्या हिन्दू समाज उसे सवर्ण मान लेगा? क्या उसे सामाजिक समता का अधिकार मिल जायेगा? हरिजन तो सभी हैं, लेकिन गाँधी ने हरिजन को भी भंगी बना डाला। क्या किसी सवर्ण ने अछूतों को हरिजन माना? सभी ने भंगी, मेहतर माना। जिस प्रकार कोई राष्ट्र अपनी स्वाधीनता खोकर धन्यवाद नहीं दे सकता, कोई नारी अपना शील भंग होने पर धन्यवाद नहीं देती फिर अछूत कैसे केवल नाम के लिए हरिजन कहलाने पर गाँधी को धन्यवाद कर सकता है। यह सोचना फरेब है कि ओस की बूँदों से किसी की प्यास बुझ सकती है।’’

वस्तुत: डा० अम्बेडकर यह अच्छी तरह समझते थे कि जाति व्यवस्था ही भारत में सभी कुरीतियों की जड़ है एवं बिना इसके उन्मूलन के देश और समाज का सतत् विकास सम्भव नहीं। यही कारण था कि जहाँ दलितों के उद्धार का दम्भ भरने वाले तमाम लोगों का प्रथम एजेण्डा औपनिवेशिक साम्राज्यशाही के खिलाफ युद्ध रहा और उनकी मान्यता थी कि स्वतंत्रता पश्चात कानून बनाकर न केवल छुआछूत को खत्म किया जा सकता है अपितु दलितों को कानूनी तौर पर अधिकार देकर उन्हें आगे भी बढ़ाया जा सकता है पर डा0 अम्बेडकर इन सवर्ण नेताओं की बातों पर विश्वास नहीं करते थे वरन् दलितों का सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में तत्काल समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहते थे। उनके प्रयासों के परिणाम-स्वरूप ही वर्ष 1919 के अधिनियम में पहली बार दलित जातियों के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकारते हुये गवर्नर जनरल द्वारा केन्द्रीय धारा सभा के नामित 14 नान-आफिशियल सदस्यों में एक दलित के नाम का भी समावेश किया गया। इसी प्रकार सेन्ट्रल प्राविन्सेंज से प्रान्तीय सभाओं में भी चार दलितों को प्रतिनिधित्व दिया गया। इसे डा0 अम्बेडकर की प्रथम जीत माना जा सकता है।
साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-
श्री राम शिवमूर्ति यादव जी समाज शास्त्र में काशी विद्यापीठ वाराणसी से स्नातकोतर हैं तथा देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनकी रचनायें छपती रही हैं. बेव पर इनकी रचनायें साहित्य कुंज, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट, स्वर्गविभा, कथाव्यथा, वांग्मय पत्रिका पर उपलब्ध हैं. सामाजिक व्यवस्था एंव आरक्षण (१९९०) प्रकाशित हो चुकी है तथा लेखों का एक अन्य संग्रह प्रेस में है. भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा "ज्योतिवा फ़ुले फ़ेलोशिप सम्मान से सम्मानित तथा राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा "भार्ती ज्योति" से सम्मानित. सम्प्रति : उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थय शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिव्रति के पश्चात स्वतन्त्र लेखन व अध्ययन एंव समाज सेवा|

डा0 अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि व्यापक अर्थों में हिन्दुत्व की रक्षा तभी सम्भव है जब ब्राह्मणवाद का खात्मा कर दिया जाय, क्योंकि ब्राह्मणवाद की आड़ में ही लोकतांत्रकि मूल्यों-समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का गला घोंटा जा रहा है। अपने एक लेख ‘हिन्दू एण्ड वाण्ट आफ पब्लिक कांसस’ में डा0 अम्बेडकर लिखते हैं कि- ‘‘दूसरे देशों में जाति की व्यवस्था सामाजिक और आर्थिक कसौटियों पर टिकी हुई है। गुलामी और दमन को धार्मिक आधार नहीं प्रदान किया गया है, किन्तु हिन्दू धर्म में छुआछूत के रूप में उत्पन्न गुलामी को धार्मिक स्वीकृति प्राप्त है। ऐसे में गुलामी खत्म भी हो जाये तो छुआछूत नहीं खत्म होगा। यह तभी खत्म होगा जब समग्र हिन्दू सामाजिक व्यवस्था विशेषकर जाति व्यवस्था को भस्म कर दिया जाये। प्रत्येक संस्था को कोई-न-कोई धार्मिक स्वीकृति मिली हुई है और इस प्रकार वह एक पवित्र व्यवस्था बन जाती है। यह स्थापित व्यवस्था मात्र इसलिए चल रही है क्योंकि उसे सवर्ण अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त है। उनका सिद्धान्त सभी को समान न्याय का वितरण नहीं है अपितु स्थापित मान्यता के अनुसार न्याय वितरण है।’’ यही कारण था कि 1935 में नासिक में आयोजित एक सम्मलेन में डा0 अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को त्याग देने की घोषणा कर दी। अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि- ‘‘सभी धर्मों का निकट से अध्ययन करने के पश्चात हिन्दू धर्म में उनकी आस्था समाप्त हो गई। वह धर्म, जो अपने में आस्था रखने वाले दो व्यक्तियों में भेदभाव करे तथा अपने करोड़ों समर्थकों को कुत्ते और अपराधी से बद्तर समझे, अपने ही अनुयायियों को घृणित जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर करे, वह धर्म नहीं है। धर्म तो आध्यात्मिक शक्ति है जो व्यक्ति और काल से ऊपर उठकर निरन्तर भाव से सभी पर, सभी नस्लों और देशों में शाष्वत रूप से एक जैसा रमा रहे। धर्म नियमों पर नहीं, वरन् सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिये।’’ यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि डा0 अम्बेडकर ने आखिर बौद्ध धर्म ही क्यों चुना? वस्तुत: यह एक विवादित तथ्य भी रहा है कि क्या जीवन के लिए धर्म जरूरी है? डा0 अम्बेडकर ने धर्म को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा था। उनका मानना था कि धर्म का तात्त्विक आधार जो भी हो, नैतिक सिद्धान्त और सामाजिक व्यवहार ही उसकी सही नींव होते हैं। यद्यपि बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म में भी सम्भावनाओं को टटोला पर अन्तत: उन्होंने बौद्ध धर्म को ही अपनाया क्योंकि यह एक ऐसा धर्म है जो मानव को मानव के रूप में देखता है किसी जाति के खाँचे में नहीं। एक ऐसा धर्म जो धम्म अर्थात नैतिक आधारों पर अवलम्बित है न कि किन्हीं पौराणिक मान्यताओं और अन्धविश्वास पर। डा0 अम्बेडकर बौद्ध धर्म के ‘आत्मदीपोभव’ से काफी प्रभावित थे और दलितों व अछूतों की प्रगति के लिये इसे जरूरी समझते थे। डा0 अम्बेडकर इस तथ्य को भलीभांति जानते थे कि सवर्णों के वर्चस्व वाली इस व्यवस्था में कोई भी बात आसानी से नहीं स्वीकारी जाती वरन् उसके लिए काफी दबाव बनाना पड़ता है। स्वयं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने डा0 अम्बेडकर के निधन पश्चात उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि -‘‘डा0 अम्बेडकर हमारे संविधान निर्माताओं में से एक थे। इस बात में कोई संदेह नहीं कि संविधान को बनाने में उन्होंने जितना कष्ट उठाया और ध्यान दिया उतना किसी अन्य ने नहीं दिया। वे हिन्दू समाज के सभी दमनात्मक संकेतों के विरूद्ध विद्रोह के प्रतीक थे। बहुत मामलों में उनके जबरदस्त दबाव बनाने तथा मजबूत विरोध खड़ा करने से हम मजबूरन उन चीजों के प्रति जागरूक और सावधान हो जाते थे तथा सदियों से दमित वर्ग की उन्नति के लिये तैयार हो जाते थे।’’

यहाँ पर उपरोक्त सभी बातों को दर्शाने का तात्पर्य मात्र इतना है कि डा0 अम्बेडकर समाज की रूढ़िवादी विचारधारा एवं ब्राह्मणवाद को कभी भी स्वीकार नहीं कर पाये और उनके विचार पुंज भी कहीं ब्राह्मणवादी व्यवस्था का समर्थन करते नजर नहीं आते। यही कारण था कि डा0 अम्बेडकर के निधन पश्चात ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पक्षधर नेताओं, विचारकों, साहित्यकारों और इतिहासकारों ने जानबूझकर उन्हें इस कदर भुला दिया कि जैसे वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं थे। इसके विपरीत द्विजवादी नेतृत्व को बढ़ा-चढ़ाकर उभारा गया, जैसे वे ईश्वर के अवतार हों। यह द्विजवादियों की मानसिक बेईमानी ही कही जायेगी। कुछ लोगों ने तो डा0 अम्बेडकर के साहित्य को न्यायालय में घसीटकर उसे प्रतिबंधित कराने का प्रयास भी किया। इन सब के पीछे मानसिकता यही रही कि डा0 अम्बेडकर को भुला दिया जाय। मण्डल को दबाने के लिये कमण्डल (मंदिर) मुद्दा जरूरत से ज्यादा उछाल दो, जिससे कि ब्राह्मणवादियों का निहित स्वार्थ सुरक्षित रहे। यही नहीं स्वतन्त्रता पश्चात तमाम लोगों ने डा0 अम्बेडकर पर किताबें लिखकर, लेख लिखकर और विभिन्न विचार गोष्ठियों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि डा0 अम्बेडकर एक सामान्य व्यक्ति थे और अंग्रेजों ने उनको बरगलाकर गाँधी जी के विरूद्ध खड़ा करने का प्रयास किया था। यही नहीं संविधान निर्माण में भी उनकी भूमिका को महत्वहीन घोषित करने का प्रयास किया जाता रहा पर 1990 के दशक की राजनीति ने बहुत कुछ बदल दिया। राजनैतिक क्षितिज पर अनेक प्रभावशाली नेताओं के उभरने ने मानो दलितों में चेतना की ज्वाला पैदा कर दी हो।

निश्चितत: दलित वर्गों में पनपी इस जन चेतना से वक्त का पहिया तेजी से बदला और कल तक जो ब्राह्मणवादी शक्तियाँ अपनी निरपेक्षता का दावा करती थीं, अचानक वे समाज के सापेक्ष विकास क्रम को समझने लगीं। विभिन्न राज्यों में दलित चेतना के उभार ने इन्हें मजबूर कर दिया कि वे इनके वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने के लिए इनकी प्रेरणा के केन्द्र बिन्दु पर नजर डालें जो कि डा0 अम्बेडकर और उनके विचारों के रूप में हैं। अचानक कल तक ब्राह्मणवाद का दंभ भरने वाली शक्तियाँ डा0 अम्बेडकर से अपनी नजदीकियाँ साबित करने लगीं। यहाँ पर इस तथ्य को नहीं भुलाया जा सकता कि किस प्रकार बौद्ध धर्म से खतरा महसूस होने पर ब्राह्मणवादी शक्तियों ने बुद्ध को भगवान विष्णु का 24वाँ अवतार घोषित कर दिया और पशु-बलि पर रोक लगाकर गाय को पवित्र जीव घोषित कर दिया। अब शायद यही काम ये डा0 अम्बेडकर के साथ भी करना चाहते हैं। जब उनके लाख षडयंत्रों के बावजूद दलितों ने डा0 अम्बेडकर को पूजनीय मानना नहीं छोड़ा तो वे भी डा0 अम्बेडकर को हाइजैक करके अपने मंच पर लेते आए।

यह एक सच्चाई है कि डा0 अम्बेडकर आजीवन ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरूद्ध संघर्ष करते रहे एवं अपनों को इसके प्रति सचेत भी करते रहे। ऐसे में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषकों द्वारा डा0 अम्बेडकर को हाइजैक करके अपने मंचों पर स्थान देना व अपने समर्थन में उद्धृत करना दर्शाता है कि डा0 अम्बेडकर वाकई एक सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रहे हैं और उनके बिना सामाजिक और राष्ट्रीय चिन्तन की कल्पना नहीं की जा सकती। देर से ही सही, अन्तत: वर्णवादी व्यवस्था के पोषकों को भी डा0 अम्बेडकर की वर्तमान परिवेश में प्रासंगिकता को स्वीकार करना पड़ा, भले ही इसके लिए उन्हें अपने वर्णवादी मूल्यों से समझौता कर डा0 अम्बेडकर को हाइजैक करने की कोशिशें करनी पड़ी हों या उनके बयानों को बिना उसकी पृष्ठभूमि बताये अपने पक्ष में रखना पड़ा हो।

Tuesday, 18 May 2010

Ambedkar And Buddhism Pics




 A photo of Dr. Ambedkar during his years at Columbia, 1913-16




Dr. B. R. Ambedkar, in a class by himself


 Dressed much more typically in a Western suit


Portraits of him and his first wife, Ramabai, at Milind College, Aurangabad


A tribute to Dr. Ambedkar


"Savita Ambedkar," his second wife, in her old age; a painting by Bhimrao Murgod  



  Ambedkar with Sanchi stup


Ambedkar with Sanchi Stup


Ambedkar and Diksha Bhumi, Nagpur


Ambedkar in Diksha Bhumi, Nagpur



Toran of Diksha Bhumi




 

A poster of Dr. Ambedkar from the 1950's


A poster presenting Dr. Ambedkar as a Bodhisattva-like figure



"Buddha, Basava, Baba Saheb," a modern painting by Bhimrao Murgod



The Buddha and the Wheel of the Law hover over Dr. Ambedkar's head, in a modern religious print



    
A painting: Support from the Raja of Kolhapur, 1922



A painting: The satyagraha at the Mahad tank


 A painting: The struggle for entry to the Kali temple at Nasik, 1930 


A painting: The signing of the Poona Pact, 1932


Dr. Ambedkar on the lawn of the Rajya Sabha, a statue unveiled in 1967


Ambedkar Udyan, Lucknow


"Babasahib Ambedkar, japan color on wood, 2003"

Source: http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00routesdata/1900_1999/ambedkar/ambedkar.html (downloaded May 2010)

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